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विशेष टिप्पणी : विकास की बातों में विनाश के बीज कैसे!
शिवकुमार विवेक
| Dec 21, 2012, 04:34AM IST
रेवाड़ी के स्कूलों में लगाए गए ड्रॉप बॉक्सों से जो सच निकला है, वह रोंगटे खड़े करने वाला है। कोई भी संवेदनशील समाज इससे चौंकेगा। नहीं चौंकने का मतलब अपने ही भविष्य की अनदेखी करना होगा, जिसके नतीजे हमारी भावी पीढ़ियों को भुगतने पड़ेंगे।
रेवाड़ी के स्कूलों में लड़कियों की समस्याएं जानने के लिए वहां की एसएसपी भारती अरोड़ा ने ड्रॉप बाक्स लगवाए थे। छह सरकारी स्कूलों में लगाए गए इन बॉक्सों में हर स्कूल की 20 से 25 लड़कियों ने कहा कि उनका यौन शोषण होता है। स्कूलों में यौन शोषण? एकदम नई बात नहीं है क्योंकि शिक्षक समुदाय की काली भेड़ें ऐसी करतूतों को अंजाम देती रही हैं। बिगड़े घरों के बच्चे भी कभी-कभार इस कृत्य में शामिल पाए गए हैं। लेकिन रेवाड़ी ने इससे अलग और ज्यादा खतरनाक आपराधिक वृत्ति और सामाजिक विचलन का संकेत दिया है।
हरियाणा का समाज यौन-अपराधों के लिए काफी निंदित हो चुका है। इस लोक प्रवाद ने समाज को सोचने के लिए कितना मजबूर किया, यह समझना-आंकना अभी कठिन है लेकिन पुलिस-प्रशासन की कार्रवाइयों को हम देख-जांच सकते हैं। दोनों ने फौरी तौर पर कुछ कार्रवाइयां की हैं पर यह बीमारी इतनी गंभीर है कि इसे मरहम पट्टी व गोली-काढ़े से ठीक नहीं किया जा सकता। इसकी जड़ में हमारे समाज का ढांचा और तौर-तरीके ही जिम्मेदार है। इन्हें कौन बदलेगा? हम समृद्धि का सुख भोगना चाहते हैं और संस्कारों व जिम्मेदारियों से मुंह चुरा रहे हैं। ऐसे में समाधान कैसे होगा।
जहां तक सरकार की बात है तो उसे यह समझने की काफी पहले ही जरूरत थी कि एकतरफा विकास का ढिंढोरा ज्यादा दिन नहीं पीटा जा सकता। समाज को भी विकास के साथ नहीं दौड़ाया जाए। दोनों का तालमेल टूटने से मूल्यों की जो अराजकता आती है, वह आ रही है। अब माता-पिता, परिवार और समाज को ही स्थिति संभालनी होगी। लेकिन यह प्रयास भी कारगर तभी होंगे जब प्रशासन इनसे जुड़े जो उसके चरित्र में नहीं होता। दुष्कर्म की घटनाओं में बढ़ोतरी पर भी पुलिस को सामाजिक रिश्ते मजबूत करने के लिए कहा गया था, वह क्या कर पाई। मामलों के सुर्खियों से हटते ही ज्यादातर जगह कार्रवाई ठंडी पड़ गई क्योंकि वह घटनाओं को रोकने के प्रशासन के तात्कालिक उपायों को लागू करा रही थी।
इनकी जड़ें हिल जाएं और पनपने के रास्ते रुक जाएं, यह एजेंडा उसे नहीं दिया गया। यह एजेंडा सरकार का है ही नहीं। इसमें समाज को आर्थिक के साथ सामाजिक स्तर पर भी ऊंचा उठाने के उपाय शामिल होंगे। ऐसा नहीं हुआ तो विकास के दावे भी ज्यादा नहीं चलेंगे। हमें यह समझना होगा कि एक टूटते और लडख़ड़ाते समाज में प्रति व्यक्ति आय बढ़ने के पैमाने लंबी खुशफहमी नहीं दे सकते।






