वेदना सारी हृदय की इक गजल बन जाएगी
Source: bhaskar news | Last Updated 04:52(06/02/12)
रोहतक: बात गजल- लेखन की हो या गजल गायन की दोनों ही क्षेत्रों में रेवाड़ी के विपिन सुनेजा नए प्रयोग करते रहते हैं। विपिन सुनेजा एक सरकारी स्कूल में अंग्रेजी के शिक्षक हैं। उनके तीन एकल काव्य संग्रह मालकौंस, पीड़ा का स्वयंवर व बालगीत संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इसके अलावा सुनेजा की दो विवेचनात्मक कृतियां कन्टेम्प्रेरी इंग्लिश ग्रामर व बात गजल की आ चुकी है।
संगीत के क्षेत्र में वे राम रंजनी, राम रसिका, हेलो बचपन में गायन व संगीत निर्देशन भी कर चुके हैं। उनके सभी संग्रह और संगीत एलबम नवीनता लिए हुए हैं। उनकी गजलों पर अब तक कुरुक्षेत्र विवि, के तीन शोधार्थी शोध कर चुके हैं।
दो वर्ष पूर्व उनकी पुस्तक बात गजल की देशभर में चर्चित रही। सुनेजा को कई पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। इनमें हंस कविता पुरस्कार, साहित्य कला संगम, चेतन काव्य पुरस्कार, अब्र सीमाबी पुरस्कार, प्रज्ञा शिक्षक सम्मान, साहित्य मणि सम्मान, श्रेष्ठ कवि पुरस्कार, राव लालजी न्यास, ग्रामीण रत्न शामिल हैं। पेश है विपिन सुनेजा से प्रदीप नारायण की विशेष बातचीत-
गजलों के प्रति आपकी रुचि कब से है ?
उर्दू के मशहूर शायर नैरंग सरहदी की प्रेरणा से मैंने बचपन में ही गजल गाना शुरू कर दिया था। इसके बाद से मैंने लिखना शुरू कर दिया।
गजल का संगीत से क्या संबंध है ?
गजल का संगीत से सीधा संबंध है। गजल में कोमल भावनाओं की अभिव्यक्ति होती है। संगीत में ढलने के बाद ये कोमल भावनाएं और भी उभर कर आती हैं।
हिन्दी और उर्दू गजल के बीच क्या अंतर हैं ?
क्चमेरा मानना है हिंदी की अपेक्षा उर्दू गजल अधिक लोकप्रिय है। इसकी लोकप्रियता का कारण है उसका गाया जाना। बड़े-बड़े प्रसिद्ध गायकों ने उनकी उर्दू गजलों को गाकर उनकी शायरी को अमर कर दिया है। वैसे उर्दू गजल के शद भी कोमल और काव्यात्मक होते हैं। बड़े गायक हिंदी गजल को गाना पंसद नहीं करते। आजकल जो हिंदी गजलें लिखी जा रही है उन्हें गजल की बजाय तेवरी कहा जाना चाहिए क्योंकि उनके तेवर बड़े सख्त हैं।
आप किस भाषा की गजल पसंद करते हैं ?
क्चमैं हिंदी गजलें लिखने और गाने का शौकीन हूं। इस दौरान मैं यह ध्यान रखता हूं कि गजल संगीतात्मक हो। साथ ही धुन बनाते समय इस बात का भी विशेष ध्यान रखता हूं कि उसमें वे सभी भाव मुखरित हों, जो गजल को रुचिकर बना सकें।
वर्तमान में गजल का रूप क्या है ?
क्चवर्तमान में गजल पूर्ण रूप से भारतीय है। फारसी गजल तो ईरान से भारत आई थी, लेकिन उर्दू गजल का जन्म तो भारत में ही हुआ है। चार सौ वर्षो तक भारत में पलने-बढ़ने के बाद आज की गजल विश्व के कोने-कोने में पहुंच चुकी है। भारत में उर्दू गजल के कम जानकार हैं। बावजूद इसके भी इसकी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है।
गजल गायकी में क्या परिवर्तन आए हैं ?
समय के साथ-साथ गजल के स्वरूप में परिवर्तन भी हुए हैं। गालिब और जौक कठिन उर्दू में लिखते थे, शकील बदायूनी और शमीम जयपुरी ने आसान उर्दू में लिखा, बशीर भद्र और निदा फाजली ने हिंदी के शदों के साथ भारतीय प्रतीकोंे का भी प्रयोग किया। बेगम अख्तर शास्त्रीय शैली में गाती थीं। तलत महमूद सुगम शैली में गाने लगे और जगजीत सिंह ने पश्चिमी वाद्य-यंत्रों की सहायता से उसे आधुनिक बना दिया। लेकिन यह सब परिवर्तन गजल के बाrय स्वरूप में हुए हैं। गजल का आंतरिक स्वरूप अब भी वैसा है।
आपका प्रिय राग कौन सा है ?
छंद में लिखकर इसे तू राग में स्वरबद्ध कर, वेदना सारी हृदय की इक गजल बन जाएगी। यह शेर मेरे पहले गजल संग्रह मालकौंस का है। यही मेरा प्रिय राग है।
हिंदी गजलों की लोकप्रियता के लिए क्या किया जाना चाहिए?
मेरा मानना है कि हिंदी गजल को तभी लोकप्रिय बनाया जा सकता है, जब उसमें कोमल शदों का प्रयोग किया जाए।