जैसे ही मुझे जगत के निधन की सूचना मिली तो मैं दो घंटे खामोश ही बैठा रहा। इस दौरान चंद्रावल से लेकर आज तक का सफर मेरी आंखों के सामने पसर गया। यह कहना है रूंडा (नसीब सिंह कुंडू) का। तब और आज में एक फर्क यह भी था किरूंडा और खूंडा लोगों को इसलिए पसंद आए क्योंकि ऐसे पात्र हमारी जिंदगी का हिस्सा थे।
आज भी बिन ब्याहे रूंडे-खूंडे हर गांव में मिलते हैं लेकिन अब रांडे भी इनमें शामिल हो लिए। हमारे समय में शादी के लिए एक आध रूंडा-खूंडा ही मचलता था लेकिन अब तो गांव के गांव रांडों से भरे पड़े हैं। गर्भ में ही यूं लड़की मारते रहे तो फिर चंद्रावल जैसी फिल्मों के लिए हिरोइन ढूढंने के लिए पसीना बहाना पड़ेगा।
चंद्रावल के बाद हम स्टार बन गए। मलाल यह है कि जो किरदार हमने निभाया वैसे हजारों लड़कों को आज भी दुल्हनें नसीब नहीं होतीं। गांवों में लड़िकयां आज भी दूसरे दर्जे को जीती हैं। अफसोस इस बात का भी है हम हरियाणा के बिन ब्याहे लड़के अब शादी के लिए दूसरे प्रांतों से अपने लिए दूल्हनें लाने लगे हैं पर हमारे प्रदेश में लड़कियांे की कमी को कब तक उधार से पूरा करते रहेंगे.. प्रस्तुति : धर्मेद्र कंवारी (भिवानी)