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ग्रामीण पशुपालकों को सिखाई सेल्फ मार्केटिंग
Dainik Bhaskar News Network | Jun 02, 2012, 05:33AM IST

शुक्रवार को विश्वविद्यालय के विस्तार शिक्षा निदेशक डॉ. राज सिंह खोखर ने कहा कि पशुधन एवं पशुपालन हमारे प्रांत में सबसे ज्यादा रोजगार और आजीविका प्रदान करता है। यह राज्य की अर्थव्यवस्था में निरंतर और समान विकास के लिए एक व्यापक आधार भी है।
मुर्रा भैंस प्रदेश से हर साल बड़ी संख्या में निर्यात होती हैं। उन्होंने कहा कि बढ़ती जनसंख्या के मद्देनजर 2020 तक दूध की मांग 166 मिलियन टन और 2030 तक यह मांग 220 मिलियन टन होने का अनुमान है। इस मांग को पूरा करने के लिए हमें औसतन दूध का उत्पादन पांच मिलियन टन प्रति वर्ष की दर से बढ़ाना होगा। 15 वर्षो में दूध उत्पादन वृद्धि 3.2 मिलियन टन प्रति वर्ष रही है। भविष्य में हमें उच्च गुणवत्ता वाले पशुधन की आवश्यकता है। अधिक और रोग मुक्त दूध उत्पादन जरूरी है।
विश्वविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. अनिल कुमार परुथी ने पशुपालकों को स्वच्छ दुग्ध उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया। एलपीटीए विभाग के अध्यक्ष डॉ. आरएस डाबर ने कहा कि विश्व में बदलती परिस्थितियों तथा वातावरण के कारण पशु उत्पादों की मांग बढ़ रही है।
किसान घर ही दूध, दही या अन्य उत्पाद खुद बेचे तो वह दोगुना लाभ कमा सकता है। कार्यक्रम में शामिल पशुपालकों को प्रमाण पत्र भी दिए गए। डॉ. जगबीर रावत ने कहा कि इस कार्यक्रम का उद्देश्य पशुओं से अधिक आय कमाना है। दूध से आय लेने से पहले खर्च पर ध्यान देना जरूरी है।
किसान शुरू का दो या तीन लीटर दूध अपने लिए रख सकते हैं। इसमें फैट तीन फीसदी तक होती है। बाद के दूध में फैट 10 फीसदी तक होती है। इससे बाजार में दूध के भाव ज्यादा मिलेंगे। कार्यक्रम में डॉ. केके यादव ने भी विचार रखे।





