शिमला में दारा सिंह ने पहलवानों को सिखाए थे कुश्ती के गुर!

शिमला।पहलवान हूं, सब कुछ खाता पीता भी हूं। लेकिन मुझे आज तक पता नहीं कि चाय का स्वाद कैसा होता है। बचपन से ही मक्खन, लस्सी और दूध पीता आया हूं, कभी चाय पीने का मन नहीं किया। रुस्तम-ए-हिंद के नाम से मशहूर पहलवान व अभिनेता दारा सिंह भले ही अब इस दुनिया में न हों लेकिन शिमला से उनका नाता हमेशा ही जुड़ा रहेगा। आज से ठीक 19 साल पहले 1994 में दारा सिंह पहली बार शिमला आए थे।
ये भरपाई मुश्किल
उद्योग निदेशक जेसी राणा ने शिमला का उपायुक्त बनने के बाद फिर दारा सिंह को कुश्ती प्रतियोगिता के आयोजन के लिए शिमला आमंत्रित किया। इस बार दारा सिंह खुद नहीं आ सके। उन्होंने बताया कि अब उनके घुटनों में दर्द होने लगा है और वह किसी और को शिमला भेज देंगे। निदेशक कहते हैं कि दारा सिंह के लिए उनके दिल में जो जगह है, उसे भरना मुश्किल है। दारा सिंह हमेशा ही उनके लिए प्रेरणा का स्रोत बने रहेंगे।
फ्री स्टाइल कुश्ती के लिए आए थे
1994 में रिज मैदान पर प्रदेश की पहली फ्री स्टाइल कुश्ती प्रतियोगिता करवाई गई थी। आयोजक बनकर दारा सिंह ने न सिर्फ उस वक्त पहलवानों को कुश्ती के गुर सिखाए बल्कि सादा जीवन जीने का भी संदेश दिया। इस समय उद्योग विभाग के निदेशक जेसी राणा उस समय एडीएम थे। उन्होंने ही दारा सिंह को शिमला आने के लिए आमंत्रित किया था। राणा कहते हैं कि जब भी कोई दारा सिंह से ऑटोग्राफ मांगता था तो वह किसी को निराश नहीं करते थे। चाय न पीने की बात भी उन्होंने निदेशक को बताई। कई बार दोनों ने साथ बैठकर खाना खाया और जीवन के अनुभव साझा किए। दारा सिंह चार दिन तक शिमला में रहे और यहां की वादियों का लुत्फ उठाया। बकौल जेसी राणा, दारा सिंह ऐसे इंसान थे तो हमेशा सादा जीवन जीते थे।
1994 में फिर शिमला आए
1994 में दारा सिंह फिर शिमला आए। इस बार वह शाही सिनेमा के मालिक और अपने प्रिय मित्र स्व. सुशील कुमार की बड़ी बेटी शैलजा शर्मा की शादी में शरीक होने पहुंचे। इस दौरान भी वह काफी दिन शिमला में रहे और शादी समारोह में एक परिवार के सदस्य की तरह सहयोग किया। उनके बेटे साहिल कहते हैं कि उनकी दारा से बातचीत जारी रही। उन्हें दारा सिंह की बातें हमेशा याद रहेंगी।






