कलेक्टर के मामले में अगर हो गई अनहोनी, तो बिगड़ सकता है माहौल

रायपुर.सुकमा कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन की रिहाई पर सरकार और नक्सलियों के प्रतिनिधियों के बीच सुबह चार घंटे हुई चर्चा के बाद गुरुवार रात को भी करीब एक घंटे तक पहुना में बातचीत हुई। कई मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच गतिरोध कायम है। प्रशासन और नक्सलियों के वार्ताकारों के लिए कहीं बड़ी चिंता कलेक्टर का स्वास्थ्य है, जो एक्यूट अस्थमा के मरीज हैं। सुरक्षा की दृष्टि से नक्सली हर 12 से 24 घंटे के अंदर अपनी जगह बदल रहे हैं।
पहाड़ और जंगल वाले इलाकों में लगातार पैदल चलना, सांप या जहरीले कीड़े एलेक्स के लिए नक्सलियों की गोलियों से बड़ा खतरा हैं। नक्सलियों के पक्ष में सरकार से बातचीत कर रहे दोनों वार्ताकार प्रो. हरगोपाल और ब्रह्मदेव शर्मा भी इस बात को लेकर चिंतित हैं। अपने करीबी लोगों से बातचीत के दौरान भी उन्होंने इस बात का जिक्र किया है।
कलेक्टर की गर्भवती पत्नी आशा की तबियत भी एक बड़ा मुद्दा है। क्योंकि इस बीच अगर कोई अनहोनी हो गई, तो यह बात पूरे माहौल को बिगाड़ सकती है। राज्य शासन के प्रतिनिधियों से बंद कमरे में हुई बातचीत के बाद हरगोपाल और शर्मा दोपहर को सुकमा के लिए रवाना होने वाले थे। कई बार कोशिश के बावजूद नक्सलियों की तरफ से कोई संदेश नहीं आया।
रात साढ़े नौ बजे तक दोनों वार्ताकार अलग-अलग चैनलों से संदेश भेजने की कोशिश में लगे थे। संकेत हैं कि कल तक अगर संदेश मिला तो दोनों वार्ताकार शनिवार सुबह 7.30 बजे सरकारी हेलिकॉप्टर से सुकमा के लिए रवाना हो जाएंगे। वहां से उनके ताड़मेटला या उसके आगे के किसी स्थान तक जाने का इंतजाम किया गया है।
नक्सलियों का संदेश मिलने के बाद ही तय होगा कि नक्सलियों की वार्ताकारों से कब और कहां पर मुलाकात होगी। यह साफ नहीं है कि नक्सलियों की तरफ से वहां कौन बात करेगा। माना जा रहा है कि रमन्ना के अलावा कुछ और आला नेता इसमें शामिल हो सकते हैं। नक्सली नेताओं से बातचीत के बाद ही तस्वीर कुछ साफ होगी।
नक्सलियों के वार्ताकार इस बात से भी असंतुष्ट हैं कि छत्तीसगढ़ सरकार ने सीधे बातचीत करने की बजाय रिटायर्ड आईएएस अफसरों को इस काम में लगा दिया। मलकानगिरी के कलेक्टर विनील कृष्णा के अपहरण के मामले में भी नक्सलियों ने प्रो. हरगोपाल को ही वार्ताकार बनाया था। पूरे मामले में वार्ताकारों ने सीधे ओडिशा सरकार से बातचीत की थी।
हरगोपाल और बीडी शर्मा के करीबी लोगों को उम्मीद थी कि यहां भी छत्तीसगढ़ सरकार ऐसा करेगी। एलेक्स पॉल मेनन की रिहाई के लिए नक्सलियों द्वारा रखी गई पांच मांगें भी वार्ता के लिए मुसीबत बनी हुई हैं, क्योंकि इन मांगों पर समझौता होना या उनको स्वीकार किया जाना कठिन है। ठीक उलट ओडिशा में नक्सलियों की 14 मांगों में हार्डकोर नक्सलियों की रिहाई के अलावा विकास से जुड़े मुद्दे भी शामिल थे। विकास संबंधी मांगों पर नवीन पटनायक सरकार को तैयार करना आसान था।
नक्सलियों की पर्दे के पीछे की रणनीति
कलेक्टर को अगवा करने के मामले में नक्सलियों की रणनीति ज्यादा से ज्यादा दिनों तक मामले को खींचना है। रिहाई होने तक पूरे इलाके में फोर्स नहीं होगी। पुलिस को शक है कि इन हालात का लाभ लेकर नक्सली ज्यादा से ज्यादा इलाकों में अपनी घुसपैठ बढ़ाएंगे। नए इलाकों में वे बारूदी सुरंगों को बिछाने, मोर्चे तैयार करने का काम कर सकते हैं। हथियारों और गोलियों की सप्लाई भी इस दौरान तेज हो सकती है। आंध्रप्रदेश और उसके बाद ओडिशा में भी नक्सलियों ने ऐसा ही किया था। नक्सलियों ने 22 सौ से ज्यादा रंगरूटों की भर्ती की है, जिनका प्रशिक्षण पूरा हो चुका है। नक्सली इन नए लड़ाकों को संवेदनशील इलाकों में पहुंचा सकते हैं।
पुलिस इंतजार में
बातचीत के माध्यम से कलेक्टर की रिहाई की कोशिशों के बीच पुलिस पूरे घटनाक्रम पर नजर रखे हुए है। नक्सलियों के मूवमेंट पर आ रही सारी सूचनाओं को इकट्ठा किया जा रहा है, पर सीधी कार्रवाई नहीं की जा रही। ताड़मेटला समेत ऐसे अन्य इलाकों से फोर्स को हटा लिया गया है, जहां नक्सलियों के होने की बात आ रही है। पुलिस नक्सलियों को किसी तरह का मौका नहीं देना चाहती। रिहाई के मुद्दे पर सरकार के कदम का इंतजार किया जा रहा है। आला अफसरों को डर है कि अगर हार्डकोर नक्सलियों को छोड़ने जैसा फैसला हुआ तो फोर्स के मनोबल पर असर पड़ सकता है।
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