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स्पेशल रिपोर्ट: दुर्लभ धातुओं पर चीन के नियंत्रण ने कई देशों की चिंता बढ़ाई

dainikbhaskar.com | Feb 17, 2013, 11:02AM IST
स्पेशल रिपोर्ट: दुर्लभ धातुओं पर चीन के नियंत्रण ने कई देशों की चिंता बढ़ाई

 


कॉल ऑफ डच्यूटी- ब्लैक ऑपरेशंस- 2 नामक वीडियो गेम में वर्ष 2025 में दुर्लभ धातुओं की सप्लाई पर नियंत्रण के लिए अमेरिका और चीन के बीच युद्ध की कल्पना की गई है। गेम की शुरुआत में एक पात्र स्मार्ट फोन पर दुर्लभ खनिजों के महत्व पर लंबा-चौड़ा भाषण देता है। वह पूछता है, इन पर किसका कब्जा है। फिर खुद जवाब देता है, चीन का। ज्यादा वक्त नहीं बीता है जब वीडियो गेम के वास्तविकता में बदलने की स्थिति बन रही थी। 
 
 
 
 
विरल खनिज तत्वों के सबसे बड़े उत्पादक चीन ने 2010 में इनके निर्यात में भारी कटौती का एलान कर दुनिया में दहशत फैला दी थी। दुर्लभ खनिज एक खरब डॉलर की हाई टेक मैन्यूफैक्चरिंग इंडस्ट्री का बुनियादी कच्च माल हैं। कंप्यूटर स्क्रीन, लाइट बल्ब बनाने वाली कंपनियों के हाथ-पांव फूल गए 
थे। अमेरिकी हथियार निर्माता चिंता में डूब गए कि अब्राम्स टैंकों, टोमाहाक मिसाइलों का उत्पादन खटाई में पड़ जाएगा। लेकिन, कुछ नहीं हुआ। दुर्लभ खनिज (रेयर अर्थ) जमीन पर ही आ गिरे। चीन के निर्यात रोकने के बावजूद कमी महसूस नहीं की गई। विश्व में आर्थिक मंदी के कारण पिछले साल से कीमतों में नाटकीय गिरावट आई है। इस बीच अमेरिकी और जापानी कंपनियों ने दुर्लभ खनिजों के उपयोग में कटौती के रास्ते ढूंढ लिए हैं। कंप्यूटर और कार की जान दुर्लभ खनिज वास्तव में दुर्लभ नहीं हैं। वे धरती में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। पर उन्हें चट्टानों के आसपास से निकालने की प्रक्रिया बेहद कठिन है। दुनिया में इनका सालाना कारोबार लगभग दो अरब डॉलर है। अमेरिका में इतनी तो च्युइंग गम बिकती है। लेकिन उपयोग के हिसाब से वे बेजोड़ हैं। 
 
 
कुछ रुपयों के नियोडिमियम के बगैर कंप्यूटर की हार्ड डिस्क नहीं चलेगी। डिस्प्रोमियम के बिना कार आगे नहीं बढ़ेगी। दरअसल, रेयर अर्थ को रिफाइन करने की प्रक्रिया पेचीदा और पर्यावरण के लिए नुकसानदेह है। 1960 से 1980 तक माउंटेन पास, कैलिफोर्निया की एकमात्र खदान विश्व में दुर्लभ खनिज तत्वों की प्रमुख सप्लायर थी। कीमत स्थिर रहने और पर्यावरण नियमों के कारण लागत बढ़ने से अमेरिका में उत्पादन गिर गया। 
 
 
1980 में चीन ने इस क्षेत्र में प्रवेश किया। 2002 में अमेरिकी खदान पर ताला लग गया। चीन अब ग्लोबल सप्लाई का 95 प्रतिशत उत्पादन करता है। नाटकीय उछाल इधर, मुनाफा कम होने और पर्यावरण से जुड़े खतरों को देखते हुए चीन ने 2006 से उत्पादन घटाना शुरू किया। 2010 में बीजिंग ने निर्यात 40 फीसदी कम कर दिया। चीन ने नाटकीय रूप से दो माह के लिए जापान को दुर्लभ खनिजों की सप्लाई रोक दी थी। इस कदम को पूर्व चीन सागर में एक द्वीप के स्वामित्व को लेकर दोनों देशों के बीच चल रहे विवाद से जोड़कर देखा गया है। चीनी 
दुर्लभ खनिजों का सबसे बड़ा खरीदार जापान है। 
 
 
 
इस बीच धातु बाजारों में तूफान आ गया। दुर्लभ खनिजों के दाम 300 से 1000 प्रतिशत बढ़ गए। दूसरे रास्ते की खोज चीन के तेवरों को देखते हुए अमेरिका, जापान ने बेशकीमती खनिजों की खोज के वैकल्पिक प्रयास तेज कर दिए। 
 
 
उद्यमी और इनवेस्टर पैसा लगाने आगे आने लगे हैं। कोलोरेडो स्थित मोली कार्प ने माउंटेन पास की बंद खदान को फिर खोलने के लिए २७ अरब रुपए लगाए हैं। अमेरिका की तुलना में जापान की अर्थव्यवस्था चीनी रेयर अर्थ पर ज्यादा निर्भर है। 
 
 
जापान बड़े पैमाने पर विशिष्ट मैग्नेट और कल-पुरजे बनाता है जिनमें दुर्लभ खनिजों का उपयोग होता है। अपनी हाई टेक मैन्यूफैक्चरिंग इंडस्ट्री को खतरे से चिंतित जापान ने चीन से बाहर खनिजों के नए स्रोतों की तलाश, वैकल्पिक सामग्री विकसित करने और रिसाइकिलिंग के लिए जापानी कंपनियों को ५४ अरकब रुपए की सब्सिडी दी है।
 
 
 इन प्रयासों के नतीजे सामने आने लगे हैं। भारत और कजाखस्तान में दुर्लभ खनिजों के स्रोत खोज लिए गए हैं। सुमितोमो, टोयोटा सहित जापानी कंपनियां जल्द ही देश की रेयर अर्थ की जरूरत का 35 प्रतिशत पूरा करने लगेंगी। इन खनिजों के दूसरे विकल्पों का उपयोग होने लगा है। सीरियम खनिज का सबसे ज्यादा उपयोग उद्योगों में पालिश करने के लिए होता है। इसके बदले एल्यूमिना का इस्तेमाल करने से मांग में 15 प्रतिशत कटौती हो गई है। 
 
 
 
वाहन निर्माता निसान ने बिजली की मोटरों के लिए नए मैग्नेट तैयार किए हैं। इनमें डिस्प्रोसियम का 40 फीसदी कम इस्तेमाल होता है। रिसाइकिलिंग के प्रयास भी तेज हुए हैं। मैगनेट बनाने वाली कंपनी शिन इत्सू केमिकल विएतनाम में एक प्लांट लगा रही है जो बेकार हाईब्रिड वाहनों, कंप्यूटर की हार्ड ड्राइव से दुर्लभ खनिज निकालेगी। 
 
 
हिताची ने हार्ड ड्राइव, कंप्रेसर और एयरकंडीशनर से खनिज तेजी से निकालने का उपकरण बना लिया है। दुनिया में दुर्लभ खनिजों का बाजार छोटा है इसलिए कहना मुश्किल है, चीन के प्रभुत्व को बेअसर करने के लिए जापान से दूसरे देश सबक सीखेंगे या नहीं।
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