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अपनी नाकामी को छिपाना चाहता था अमेरिका

dainikbhaskar.com | Feb 24, 2013, 13:43PM IST
 
 

अमेरिका ने अपने जासूसों की नाकामी छिपाने के लिए भारत के पहले परमाणु परीक्षण को फुस्स बताया है। यह जानकारी अमेरिकी दस्तावेज में दी गई है। ये दस्तावेज सूचना की स्वतंत्रता के तहत मांगे जाने पर दिए गए हैं। 
 
 
 
इनमें यह भी कहा गया है कि 24 जनवरी 1996 को क्लिंटन प्रशासन ने मान लिया था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने परमाणु परीक्षण नहीं करने का निश्चय किया है। इन दस्तावेजों में कहा गया है कि 1974 में निक्सन प्रशासन के अमेरिकी गुप्तचरों का सारा ध्यान रूस और वियतनाम युद्ध पर था। इसलिए भारत का परमाणु परीक्षण उनकी 
प्राथमिकता में शामिल नहीं था। 
 
 
18 मई 1974 का भारत का परमाणु परीक्षण अमेरिका के लिए चौंकाने वाला था। अमेरिका के नेशनल सिक्यूरिटी आर्काइव (एनएसए) ने यह जानकारी दी गई है। इसके अनुसार, 1972 में अमेरिकी विदेश मंत्रालय के खुफिया और विश्लेषण विभाग (आईएनआर) ने जरूर कहा था कि भारत भूमिगत परमाणु परीक्षण की तैयारी कर रहा है।  
 
 
 
दस्तावेज का विस्तृत विश्लेषण इंटरनेट पर जारी किया गया है। इसमें कहा गया है कि अगर तुलना करें तो भारतीय मामला वैसा ही है जैसा 2002-03 में इराक का था। जब व्हाइट हाउस की चिंता इतनी बढ़ गई थी कि खुफिया विभाग ने उसे यह मानने पर मजबूर कर दिया कि सद्दाम हुसैन व्यापक जनसंहार के हथियार बना रहे हैं। 
 
 
 
 
‘ऑपरेशन स्माइलिंग बुद्धा’ के कूट नाम से राजस्थान के पोखरण फायरिंग रेंज में एक थर्मोन्यूक्लियर डिवाइस से 1974 में परमाणु परीक्षण किया गया था। इसकी विस्फोटक क्षमता बहस का विषय रही है। हो सकता है कि इसकी कम शक्ति के कारण अमेरिकी जासूस इसका पता न लगा पाए हों और उन्होंने इसे फुस्स या नाकाम बताया हो।
 
 
 
इन्हीं दस्तावेजों में यह भी कहा गया है कि आर्थिक प्रतिबंध से बचने और आर्थिक क्रांति के जनक की पहचान बनाने के लिए नरसिंह राव ने 1995-96 में परमाणु परीक्षण रोक दिया था। हालांकि परीक्षण करने से उनके फिर से सत्ता में आने की संभावना थी।
 

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