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दुनिया के सबसे ताकतवर देश के सामने बेहद कठिन दौर

जॉन मीकम | Jul 22, 2012, 09:42AM IST
 
 

अमेरिकी सपने ने अच्छे दिन देखे हैं, बहुत अच्छे. वैसे भी हमेशा से ही यह दृढ़ विश्वास रहा है कि जो लोग मेहनत करते हैं और नियमानुसार काम करते हैं, उन्हें सुकूनदायक वर्तमान और बच्चों के लिए मजबूत भविष्य के रूप में इनाम मिलेगा। लेकिन हो इसके उलट रहा है। वही भविष्य हर दिशा से दुर्गति का सामना कर रहा है। लोकतांत्रिक पूंजीवाद की सबसे बड़ी दुश्मन है आर्थिक असमानता और अमेरिका इसी सच का सामना कर रहा है। बेरोजगारी की दर निराशाजनक रूप से बढ़ती ही जा रही है। देश के दीर्घकालीन वित्तीय हालात खतरे में हैं। यही स्थिति राजनीतिक तंत्र की है, थॉमस जेफरसन ने इस तंत्र को विश्व की सुनहरी उम्मीदों का इंजन कहा था। लेकिन वैसा कहीं दिख ही नहीं रहा। हालिया समस्याओं के समाधान निकलने के आसार ही नहीं नजर आ रहे हैं।

सच तो यह भी है कि हमेशा से ऐसा नहीं था। जैसा कि प्रसिद्ध इतिहासविद् जेम्स ट्रूस्लो एडम्स ने अपनी किताब ‘द एपिक ऑफ अमेरिका’ की प्रस्तावना को पूरी करते समय 1 मई 1931 को बताया था। अमेरिका के लिए वह समय उत्सुकता से भरपूर था। जबकि 1929 की मंदी ने गंभीर संकट की ओर इशारा कर दिया था जो आने वाले कई सालों तक बनी रहनी थी। फिर भी वहां प्रगति और संभावनाओं को लेकर जोश पूरी तरह कायम था। जिस दिन एडम्स ने अपनी किताब पूरी की, उसी दिन राष्ट्रपति हर्बर्ट हूवर ने 34 स्ट्रीट, फिफ्थ एवेन्यू पर बनकर तैयार हुई एम्पायर स्टेट बिल्डिंग की लाइट्स का बटन दबाया था। न्यूयार्क, मैनहट्टन की यह सबसे ऊंची इमारत रोशनी से नहा उठी थी। चार दशक तक उसका यह वर्चस्व कायम रहा जब तक कि वर्ल्ड ट्रेड सेंटर अस्तित्व में नहीं आया था।

मुश्किल समय में बड़ी उम्मीदें

एडम्स की सुखद भविष्य की कामना, एम्पायर स्टेट का निर्माण और किताब का पूरा होना संयोगवश एक साथ घटित हुआ। वैसे उस समय तक अमेरिका की यशगाथा स्थानीय भाषा में देशभर में लोकप्रिय नहीं हो पाई थी। हार्डिग, कूलिज और हूवर के शासनकाल में भी स्थिति नहीं बदली। एडम्स ने लिखा कि हमारे हर श्रेणी के नागरिकों के लिए बेहतर, धनी और खुशहाल जीवन का जो अमेरिकी स्वप्न था और दुनिया के लिए हमारा सबसे बड़ा योगदान, क्या हम उसे साकार कर पाए? यह कोई नई बात नहीं थी। दृढ़ विश्वास था कि आने वाला कल, आज से बेहतर होगा। सपना या उम्मीद..एडम्स ने लिखा, वो शुरू से ही मौजूद था।

नया था वह मुहावरा ‘अमेरिकन ड्रीम’ जिसका उपयोग एडम्स ने किया था। यह बैंजामिन फ्रेंकलिन के ‘द वे टु वेल्थ’ से प्रेरित और अमेरिका की जड़ों में रचा बसा था। बिलकुल जेफरसन के स्वतत्रंता के विचार और दृढ़ विश्वास की तरह कि वे ही ऐसे लोग हैं जो दुनिया में बढ़िया तरीके से रह सकते हैं। और संसार को अपना योगदान दे सकते हैं। इस मामले में थॉमस पेन बिलकुल सही थे जिन्होंने कहा था कि हममें वह शक्ति है कि हम दुनिया को फिर से अपने तरीके से शुरू कर सकते हैं।

पीढ़ी दर पीढ़ी अमेरिकी लोगों ने व्यक्तिगत और देश की स्थिर प्रगति का सपना देखा। खुद फ्रेंकलिन रूज़वेल्ट ने उम्मीदों और सपनों को प्रोत्साहित किया। वे महान स्वप्नदृष्टा थे। उन्होंने अपने आखिरी समय में अपने पुराने ग्रोटोन स्कूल के रेक्टर एंडेकॉट पिबोडी के शब्दों को याद किया, जिसमें उन्होंने कहा था - जीवन में हमेशा चीजें सरलता से नहीं चलेंगी। कभी हम ऊंचाइयों की ओर बढ़ेंगे तो कभी ऐसा लगेगा कि सब कुछ उल्टा हो रहा है। फिर भी, यह तथ्य याद रखना जरूरी है कि सभ्यता हमेशा ऊंचाई की ओर जाती है। 1945 में रूज़वेल्ट ने अपने आखिरी उद्घाटन भाषण में भी यही बात कही थी। आगामी दशकों में अमेरिकी शक्ति और समृद्धि महान ऊंचाइयों पर पहुंच गई।

पिबोडी और रूजवेल्ट के ये कथन सही लग रहे थे कि दुनिया एकदम सही नहीं है और न ही हो सकती है। लेकिन अमेरिका की यह कहानी, दिल की कहानी थी कुछ और अच्छा कर गुजरने की। बीमारी से जीतने की, सितारों तक जाने की, स्वतंत्रता बचाए रखने की और समृद्धि बढ़ाने की। युद्ध के बाद के अमेरिकियों ने बिलकुल इसी तरह की बेहतर, समृद्ध और खुशनुमा जिंदगी को जीया।

जो भी राष्ट्राध्यक्ष 2013 में राष्ट्र के नाम उद्घाटन भाषण देगा उसे ध्यान में रखना होगा कि अमेरिकन ड्रीम गहरे आर्थिक और सांस्कृतिक दबाव में है। इसका सबसे बढ़िया तरीका मध्यम वर्ग की स्थिति को आंकने का है। जिसके बारे में हम ज्यादा सुनते हैं। ९क् फीसदी अमेरिकी खुद को मध्यम वर्गीय, उच्च मध्यम वर्ग या निम्न मध्यम वर्ग का मानते हैं।

कुछ ऐसा है मध्यम वर्ग

इस मध्यम वर्ग को परिभाषित करना बड़ा मुश्किल हो रहा है। इसीलिए अब अमेरिकी वाणिज्य विभाग ने आंकड़ों में उलझने की बजाय वर्णनात्मक भाषा में समझने पर जोर दिया। उन्होंने पाया किमध्यम वर्ग को आय की बजाय महत्वाकांक्षाओं से ज्यादा अच्छे से समझा जा सकता है। वे मानते हैं कि मध्यमवर्गीय परिवार घर, कार, बच्चों के लिए उच्च शिक्षा, स्वास्थ्य, रिटायरमेंट के बाद सुरक्षा और परिजनों के साथ कभी-कभार छुट्टियों की चाह रखते हैं।

यह अब और मुश्किल हो गया है क्योंकिज्यादा से ज्यादा लोग मध्यम वर्ग में पहुंचना चाह रहे हैं। वह इसीलिए कि जिंदगी से जुड़ी जरूरी चीजों जैसे स्वास्थ्य रक्षा, शिक्षा और घर पर खर्च आय से कई गुना ज्यादा हो गए हैं। पिछले दशक में औसत घरेलू आय भी थम गई है। बिल क्लिंटन के शासन काल की तुलना में अब अमेरिकियों की आमदनी बहुत कम हो गई है।

रोनाल्ड रीगन और बिल क्लिंटन अमेरिकी संभावनाओं के बारे में विस्तार से सोचते थे। वे दोनों मध्यमवर्गीय अमेरिकी वर्ग से आए थे। रीगन और क्लिंटन किसी खास सिद्धांत से नहीं जुड़े थे। उन्होंने मध्यम वर्ग को केंद्र में रखकर बुनियाद का निर्माण करने की कोशिश की। वे जीवन को बेहतर बनाने और नौकरियों के अवसर पैदा करने के लिए व्यक्तियों की क्षमता में भरोसा करते थे।

रीगन कहते थे कि सरकार एक समस्या है पर उन्होंने सरकारी तंत्र को तोड़ने की कोशिश नहीं की। क्लिंटन ने कहा कि भारी भरकम सरकार का युग समाप्त हो गया। लेकिन उन्होंने राजनीति को केंद्र में रखा। 1990 के दशक में आईटी के सहारे आए आर्थिक बूम ने बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर पैदा किए। इसके मूल में सरकारी खर्च की मुख्य भूमिका थी। अमेरिकी ड्रीम की सबसे मूलभूत जरूरत रोजगार है। राष्ट्रपति ओबामा और राष्ट्रपति चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार मिट रोमनी के सामने भी यह सवाल खड़ा होगा।

संक्षेप में कहें तो यह गंभीर संकट का समय है, अमेरिकन ड्रीम कहीं दूर फिसलता जा रहा है। इमर्सन ने अमेरिकन ड्रीम की अवधारणा पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि इसका कोई स्पष्ट इतिहास नहीं है। एक जीवनी है यह, एक विचार की जीवनी। जिसने अमेरिका को महान बना दिया है। अमेरिका अब इस सवाल का सामना कर रहा है कि क्या उस सपने का कोई भविष्य है।
 
 
 

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