पाकिस्तान में तनाव से उभरे सवाल
Source: बीबीसी | Last Updated 16:55(14/01/12)
पाकिस्तान में सरकार और सेना तथा न्यायपालिका के बीच उभरे गहरे मतभेद के कारण एक दफ़ा देश की राजनीतिक स्थिरता पर सवाल उठने लगें हैं.
पाकिस्तान में सेना के ज़रिए सत्ता हथियाने का एक लंबा इतिहास है.
मौजूदा संकट में राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के नेतृत्व वाली प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी की सरकार है जो लोकतांत्रिक तरीक़े से चुनी हुई सरकार है लेकिन काफ़ी कमज़ोर और अलोकप्रिय हो गई है.
सरकार और सेना से टकराव के कारण इस सरकार के अस्तित्व पर ख़तरे के बादल मंडराने लगे हैं.
सरकार और सेना के बीच आख़िर विवाद क्यों हुआ?
राष्ट्रपति ज़रदारी की पीपीपी के संबंध सेना से कभी भी अच्छे या क़रीबी नहीं रहें हैं. इन दोनों के बीच ताज़े विवाद की शुरूआत अक्तूबर 2011 में हुई जिसे हम 'मेमोगेट' के नाम से जानते हैं.
पाकिस्तान सरकार ने कथित तौर पर अमरीका को एक मेमो भेजा था जिसमें मई महीने में अल-क़ायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद पाकिस्तानी सेना के ज़रिए तख़्ता पलटने की आशंका जताई गई थी.
मई 2011 में पाकिस्तान के शहर ऐबटाबाद में अमरीकी सेना ने पाकिस्तान को बताए बेगै़र एक सैन्य अभियान में ओसामा बिन लादेन को मार दिया था.
ऐसा कहा जाता है कि उस समय अमरीका में पाकिस्तान के राजदूत रहे हुसैन हक़्क़ानी ने राष्ट्रपति ज़रदारी के कहने पर उस मेमो को तैयार किया था.
उसमें कथित तौर पर ज़रदारी ने सेना के ख़िलाफ़ अमरीकी मदद के बदले में सेना के शीर्ष नेतृत्व को बदलने और चरमपंथी संगठनों से तमाम रिशतों को ख़त्म करने का यक़ीन दिलाया था.
उस मेमो को तत्कालीन अमरीकी सेना प्रमुख माइकल मलेन को सौंपा गया था.
मलेन ने इस तरह के एक मेमो पाने की बात आधिकारिक रूप से स्वीकार भी की थी लेकिन ये कहा था कि अमरीका ने उस पर कोई कार्रवाई नहीं की थी.
इस विवाद के कारण हक्क़ानी को अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा था.
हुसैन हक़्का़नी और राष्ट्रपति ज़रदारी दोनों ही इस तरह किसी भी मेमो से इनकार करते हैं लेकिन अगर जांच में ज़रदारी का नाम आया तो उन्हें अपनी कुर्सी छोड़ने के लिए मजबूर किया जा सकता है.
इस साल जनवरी में सेना ने सार्वजनिक तौर पर प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी की जमकर फटकार लगाई थी.
गिलानी ने एक साक्षात्कार में सेना के अधिकारियों की आलोचना की थी जिसके जवाब में सेना ने कहा था कि गिलानी के बयान के गंभीर परिणाम हो सकते हैं.
न्यायपालिका और सरकार के बीच में मतभेद क्यों हुए?
पीपीपी के संबंध अगर सेना से कभी भी अच्छे नहीं रहें हैं तो न्यायपालिका से भी उनके संबंध कोई ज़्यादा अच्छे कभी नहीं रहे.
सुप्रीम कोर्ट अपनी तरफ़ से मेमोगेट की जांच कर रहा है जबकि संसद की एक समिति भी इसकी जांच कर रही है.
अदालत में याचिका दायर करने वालों की मांग है कि मेमोगेट के लिए हुसैन हक़्क़ानी और राष्ट्रपति ज़रदारी के ख़िलाफ़ देशद्रोह का मुक़दमा चलाया जाए.
भ्रष्टाचार के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट सरकार के लिए सिरदर्द बनी हुई है.
जनवरी में चेतावनी दी कि अगर प्रधानमंत्री गिलानी बड़े-बड़े राजनेताओं के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के मामलों की दोबारा जांच के आदेश नहीं देते हैं तो उन्हें अपने पद से हटाया जा सकता है.
अदालत ने यहां तक कह दिया था कि गिलानी ने अपने शपथ का उल्लंघन किया है और वो ईमानदार आदमी नहीं हैं.
इससे पहले 2009 में भी एक दफ़ा सरकार और न्यायपालिका के बीच संबंध काफ़ी ख़राब हो गए थे.
उस वक़्त अदालत ने राष्ट्रपति ज़रदारी और दूसरे राजनेताओं को भ्रष्टाचार के मामले में राहत देने संबंधी क़ानून को ख़ारिज कर दिया था.
क्या तख़्तापलट हो सकता है?
पाकिस्तान में इस समय ज़्यादातर विश्लेषकों का मानना है कि तख्तापलट की संभावना बहुत कम है. उनके मुताबिक़ पाकिस्तान में पहली बार सभी राजनीतिक दलों में इस बात को लेकर सहमति है कि तख्तापलटने की किसी भी कोशिश का सख़्ती से विरोध किया जाएगा.
इसके अलावा पाकिस्तान के मौजूदा सैन्य नेतृत्व के पास ऐसा कुछ भी ख़ास नहीं है जो वो अंतरराष्ट्रीय जगत के सामने पेश कर सकते हैं और जिन्हें दिखाकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस बात के लिए राज़ी किया जासके कि वे सैनिक शासन का समर्थन करें.
ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद पाकिस्तानी सेना की छवि देश में और देश के बाहर भी शायद उसके इतिहास में इस समय सबसे ज़्यादा ख़राब बनी हुई है.
जानकारों का मानना है कि सबसे ज़्यादा संभावना इस बात की है कि राष्ट्रपति ज़रदारी बिना कोई ख़तरा मोल लिए हुए मामले को आसानी से सुलझाने की कोशिश करेंगे. उनके अनुसार ज़रदारी सेना प्रमुख और ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के प्रमुख को हटाने की हिम्मत नहीं करेंगे.
लेकिन विपक्षी दल जल्द से जल्द आम चुनाव कराने के लिए दबाव बना सकते हैं.
मौजूदा सरकार का कार्यकाल फ़रवरी 2013 तक है लेकिन सरकार को उससे पहले चुनाव कराने के लिए मजबूर किया जा सकता है.
हालाकि सरकार भी मार्च से पहले चुनाव नहीं कराएगी क्योंकि वो प्रांतों के विधानसभा के ज़रिए संसद के ऊपरी सदन सिनेट में अपना बहुमत हासिल करने की कोशिश करेगी.
राष्ट्रपति ज़रदारी की कुर्सी कितनी सुरक्षित है ?
भ्रष्टाचार और कुशासन के आरोपों के बीच पिछले तीन वर्षों से राष्ट्रपति की कुर्सी पर आसीन आसिफ़ अली ज़रदारी के भविष्य के बारे में कोई भी कुछ कहने से बच रहा है.
यह कहना बहुत मुश्किल है कि वो अपना कार्यकाल पूरा कर पाएंगे या नहीं या फिर गिलानी की सरकार कब तक चलेगी.
पाकिस्तान में सेना के ज़रिए तख़्तापलटने की घटना शायद भले ही अब ना हो लेकिन सभी राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में सरकार की स्थिति और ख़राब होगी.
ज़रदारी को इस समय सबसे बड़ी चुनौती दे रहें हैं क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान ख़ान.
पाकिस्तान में मोटे तौर पर दो ही पार्टिया रहीं हैं. एक ज़रदारी की पीपीपी और दूसरी पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की पार्टी मुस्लिम लीग.
लेकिन इमरान ख़ान के नेतृत्व वाली तहरीक-ए-इंसाफ़ को एक तीसरी शक्ति के रूप में पेश किया जा रहा है.
कुछ लोग इमरान ख़ान की तरफ़ इसलिए खिंचे चले आते हैं क्योंकि वो राजनीति में नए हैं और उन पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं है.
लेकिन कुछ लोग तो इसलिए भी उनकी तरफ़ आकर्षित हो रहें हैं क्योंकि उन्हें विश्वास हो गया है कि इमरान ख़ान को सेना का समर्थन हासिल है और अगर वो सत्ता में आते हैं तो देश को अस्थिरता प्रदान करेंगे जिसकी फ़ौरी तौर पर बहुत ज़रूरत है.
पाकिस्तान में बदलाव की बयार और राजनीतिक उथल पुथल को देखते हुए पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने भी देश लौटने की घोषण की है.
अगर चुनाव जल्दी हो जाते हैं तो बहुत से विश्लेषकों का मानना है कि इमरान ख़ान, परवेज़ मुशर्रफ़ और सिध की मुत्तिहदा क़ौमी मूवमेंट और सेना के समर्थन वाले कुछ नेताओं के बीच गठबंधन हो सकता है.
लेकिन इन सबकुछ के बाद जो भी पाकिस्तान में सत्ता में आएगा उसके लिए बहुत बड़ी चुनौतियां इंतज़ार कर रहीं हैं.
पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था की हालत बहुत ख़राब है, देश के कई इलाक़ों में चरमपंथी सक्रिय हैं और दशकों में पहली बार अमरीका से संबंध इतने ख़राब हैं.
लेकिन क्या उम्मीद की कोई किरण है?
फ़िलहाल कुछ भी कहना मुश्किल है और ये इस बात पर निर्भर करता है कि हालात किस करवट लेते हैं.
इस्लामाबाद स्थित बीबीसी संवाददाता इलयास ख़ान के अनुसार पाकिस्तान में भारी अस्मंजस की स्थिति बनती जा रही है और बहुत से लोगों को यक़ीन होने लगा है कि या तो इसके बाद देश में लोकतांत्रिक संसदीय प्रणाली बहुत मज़बूत होगी या फिर सिस्टम पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगा.
निरंतर सैन्य शासन या फिर सेना नियंत्रित नागरिक सरकारों ने पाकिस्तान में एक सैन्यीकृत समाज को बढ़ावा दिया है जहां 'युद्ध की अर्थव्यवस्था' के हालात बने हुए हैं.
लेकिन मौजूदा सरकार पाकिस्तानी इतिहास में सबसे ज़्यादा दिनों तक चलने वाली सरकार बन गई है और शायद इसीलिए पाकिस्तान में संस्थाओं के बीच हो रहे इस संघर्ष ने विकराल रूप ले लिया है.