भारतीय संस्कृति में सिंदूर और कंगन को महिलाओं के सुहाग का प्रतीक माना जाता है। शादी के बाद पति के जिंदा रहते महिलाएं अपनी सिंदूर और चूड़ी नहीं उतारती हैं। लेकिन एक शहर ऐसा भी है जहां की महिलाएं अपने पति के जिंदा रहते ही सिंदूर पोछ लेती हैं और अपनी चूड़ी भी उतार देती हैं। फिर पूरे दिन विधवा के वेश में अपने पति के सुरक्षित वापस लौटने की कामना करती हैं।
क्या है परंपरा
विशु को कोल्हाण में शिकार पर्व के नाम से जाना जाता है। इसकी मान्यताएं भी अदभुत हैं। परंपरा, संस्कृति और आस्था के नाम पर मनाए जाने वाले इस पर्व की तैयारी मार्च के अंतिम सप्ताह से शुरू हो जाती है और अप्रैल में इसे मनाया जाता है। इस पर्व में महिलाएं अपने पति को चंदन लगाकर शिकार के लिए जंगल भेजती हैं। फिर पति के वापस लौटने तक महिलाएं अपना सिंदूर पोंछकर और चूड़ी उतारकर उनके वापस लौटने का इंतजार करती हैं। शिकार से पति के जिंदा लौटने के बाद महिलाएं फिर अपना श्रृंगार करती हैं।
क्यों मनाया जाता है
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