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PICS : सबकुछ शांत था, लेकिन 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर' ने ला दी वासेपुर में फिर तबाही

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धनबाद.गैंग्स ऑफ वासेपुर फिल्म आने से पहले पांच सालों तक कोई गैंगवार नहीं हुआ था और न ही कोई मर्डर। स्थिति बिलकुल शांत हो गई थी। लेकिन गैंग्स ऑफ वासेपुर फिल्म आने के बाद वासेपुर में फिर से गैंगवार शुरू हो गया है। एक के बाद एक हत्याएं और दर्जनों जानलेवा हमले होने शुरू हो गए हैं। वासेपुर में रहने वाले एक सभ्य वर्ग का मानना है कि फिल्म आने के बाद फिर से गैंगवार को नई हवा मिल गई है। लोगों का यह भी मानना है कि फिल्म आने के बाद फिर से वर्चस्व की लड़ाई लगातार शुरू होने लगी है। यह वासेपुर पर कहीं-न-कहीं बुरा प्रभाव डालने लगा है।


वासेपुर में अचानक फिर से खूनी खेल शुरू हो गया है। डीबी स्टार ने इस मामले की ग्राउंड पड़ताल की। वासेपुर के पढ़े लिखे लोगों से डीबी स्टार ने बात की तो उन सभी में एक आम राय थी कि फिल्म के बाद कहीं न कही वासेपुर में वर्चस्व की लड़ाई फिर से नए रास्ते पर चल पड़ी है। डीबी स्टार की टीम को जानकारी मिली कि अभी वर्चस्व सिर्फ सरकारी जमीन को अपने कब्जा में करने की है। डीबी स्टार ने ऐसे ही चार जमीन का मुआयना किया जहां पर या तो कभी जमीन को लेकर खून बह चुका है या उसको लेकर अभी गैंगवार चल रहा है।


फिल्म रिलीज होने से पहले 16 वर्षों में हुईं तीन हत्याएं


1. सुल्तान -1996 2. वाहिद आलम-2009 3. इरफान -2011


फिल्म रिलीज होने के बाद हुई घटनाएं


गैंग्स ऑफ वासेपुर 22 जून 2012 को रिलीज हुई। फिल्म रिलीज होने के तीन माह में ही वासेपुर में 2 हत्याएं हुई है। एक जानलेवा हमले में परवेज कोलकाता में इलाजरत है। अभी भी उसकी हालत चिताजनक बनी हुई है। इसके अलावे भी कई जानलेवा हमले हुए हैं।


1. आमिर खान-2012 2. सोनू -2012 3 परवेज -2012(कोमा में)


गैंग्स फिल्म के बाद बढ़ गया वासेपुर में क्राइम का ग्राफ


"फिल्म में ऐसी कोई चीज नहीं दिखाई जानी चाहिए जो किसी समाज को हानि पहुंचाए। घटनाएं होती रहती है तो लोगों को याद नहीं रहता है। लेकिन जब हम उस सभी घटना को एकत्रित कर रील में दिखाते हंै तो सभी पुरानी बातें फिर से ताजी हो जाती हैं। ऐसे में जो कम पढ़ा लिखा समाज है वह यहां चल रहे गुटों में सक्रिय हो जाते है। और इसी का परिणाम हाल में हुई घटनाओं में देखा जा सकता है। लोग फिल्म को फिल्म की तरह देखे उसे अपने जीवन में नहीं उतारेे।"- प्रो. एम एच खान, रिटायर्ड प्रोफेसर, वासेपुर निवासी


"फिल्म को लोगों ने फिल्म की तरह नहीं बल्कि वासेपुर की छवि के तरह देखा है। युवाओं में थोड़ा बहुत इसका असर पड़ा है। वह भी ऐसे समाज को इस फिल्म ने प्रभावित किया है, जिस परिवार में शिक्षा की कमी है। अशिक्षित युवा को वर्चस्व की लड़ाई अपने तरफ अधिक आकर्षित करती है। वैसे आम लोगों को आज भी कोई परेशानी नहीं है। प्रशासन ने ही ऐसे गुटों को पनपने दिया है। अगर पुलिस चाहती तो उठने से पहले ही ऐसे लोग या गुटों को समाप्त किया जा सकता था।"- डॉ मासूम, वासेपुर निवासी.


फिल्म ने एक बार वर्षों से रुकी खूनी जंग को जीवंत कर दिया है। यहां के युवा क्राइम को अपना फन मानने लगे हैं। शौक से वह अपराध जगत से जुड़ रहे है। फिल्म आने के बाद गुट फिर से सक्रिय हो गए हंै। जो नाम अपराध में पहले कभी नहीं सामने आया, वह अब सामना आ रहा है। वासेपुर कुछ राज्यों में अपने छवि को लेकर बदनाम था वह फिल्म आने के बाद दुनिया में आपराधिक छवि को लेकर बदनाम हो गया है। फिल्म ने वर्षों से दबी चिंगारी को फिर से हवा दे दिया है। - प्रो. मनजर इमाम, स्थानीय निवासी.



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