व्हील चेयर पर सिमटी जिंदगी से परेशान विश्वनाथ ने सरकार से मांगा रिटायरमेंट या ईश्वर से मौत मांगा

रांची . व्हील चेयर में सिमटी जिंदगी। खाने से शौच तक, सब व्हील चेयर पर। वो भगवान से मौत मांगते हैं और सरकार से रिटायरमेंट, पर दोनों ही नहीं मिलते। यह दर्द उसकी पत्नी की आंखों से भी साफ झलकता है। झर-झर बहते आंसुओं में हाल बयां हो जाता है। न घर में खाने को एक दाना है, न दवा के लिए पैसे। घर में जो भी पैसा-जेवर था, इलाज में सब बिक गया। गृहस्थी अब चलाए नहीं चलती। बस घिसट रही है जिंदगी। यही है घाटशिला के धालभूमगढ़ के पंचायत सेवक विश्वनाथ आस की जिंदगी। लगभग साढ़े सात साल पहले ड्यूटी के दौरान हुई एक सड़क दुर्घटना में वे पूरी तरह विकलांग हो गए थे ।
विश्वनाथ की पत्नी रीता आस वेतन और पति के जीवन रक्षा की भीख मांगते-मांगते थक चुकी हैं। उन्होंने रांची में राज्यपाल डॉ. सैयद अहमद से हाल में वेतन के लिए गुहार लगाई। इससे पूर्व रांची में तत्कालीन सीएम अर्जुन मुंडा, विधानसभा अध्यक्ष सीपी सिंह, डीसी जमशेदपुर, एसडीओ घाटशिला, निदेशक व प्रधान सचिव पंचायती राज तथा झारखंड सरकार तक उन्होंने अपनी व्यथा पहुंचाई। पर किसी ने कुछ नहीं किया।
मांगी नौकरी तो मिला जवाब मरा हुआ नहीं मान सकते
पति की जगह नौकरी की मांग पर विभाग ने कहा- ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। विश्वनाथ के जीते जी उनके परिजन को नौकरी नहीं मिल सकती। उन्हें मरा तो मान नहीं सकते। अर्जित या अन्य कोई अवकाश बचा नहीं है। इसलिए 'नो वर्क नो पे के आधार पर वेतन देना संभव नहीं है। अधिकारियों ने ऐच्छिक सेवानिवृति के लिए आवेदन देने की सलाह दी। रीता ने ऐच्छिक रिटायरमेंट के लिए आवेदन दिया। लेकिन, एक साल से डीसी ऑफिस जमशेदपुर में फाइल अटकी पड़ी है।
बेटे की छूटी पढ़ाई
रीता आस कहती हैं- अब हाथ में कुछ भी नहीं। पैसे के अभाव में उनकी दवा भी बंद हो चुकी है। बेटा मद्रास में इंजीनियरिंग सेकेंड इयर का छात्र था। पैसे नहीं होने के कारण उसकी पढ़ाई बीच में ही रुक गई। अब एक दुकान में दो हजार रुपए प्रति माह पर काम कर रहा है। डीसी के पास जाती हूं तो आश्वासन देकर लौटा दिया जाता है। पर, काम नहीं होता। कोरे आश्वासनों के भरोसे आखिर कोई कैसे जिए!
क्या है मामला
घटना 27 सितंबर 2005 की है। धालभूमगढ़ प्रखंड के पंचायत सेवक विश्वनाथ आस विभागीय कार्य के दौरान सड़क दुर्घटना में घायल हो गए। इस दुर्घटना ने उन्हें पूरी तरह विकलांग बना दिया। न आवाज निकलती है। न खड़े होकर चल पाते हैं और न हाथ काम करते हैं। वेतन नहीं मिलने से अब दवा भी बंद हो चुकी है। असह्य दर्द से जब वह रात को चिल्लाते हैं, तो पूरे मुहल्ले की जिंदगी सिहर उठती है। लेकिन, उनकी यह कराह सरकारी महकमे तक अब तक नहीं पहुंची।







