रांची।एक छोटे से कस्बे से बढ़ते-बढ़ते रांची झारखंड राज्य की राजधानी बनी। कभी कहा जाता था, 'पीठ पर छौआ, माथ पर खांची/ जब देखो तो समझो रांची'। आज वक्त के साथ रांची बदली, यहां के रहवासी बदले, लेकिन इसके गली-मोहल्लों के नाम वही हैं, जैसे सैकड़ों वर्षों पहले थे। यहां के मोहल्लों और स्थानों के अटपटे नामों की रोचकता किसी को भी आकर्षित कर सकती है।
हम रांची वाले लोग इन नामों को सुनते आए हैं, इसलिए अभ्यस्त हो गए हैं। लेकिन जो पहली बार रांची आते हैं और कडरू, बहू बाजार, बूटी मोड़, कोकर, पीपी कंपाउंड, चुटिया, हटिया, डोरंडा, रातू आदि सुनते हैं, तो उन्हें ये नाम रोचक लगते हैं और इनका अर्थ वे जानना चाहते हैं। लेकिन इन नामों के बारे में ज्यादा किसी को नहीं पता। दैनिक भास्कर ने इन नामों के पीछे छुपे तथ्यों को ढूंढऩे का फैसला किया। भास्कर रिपोर्टर ने रांची के पुराने बाशिंदों और एक्सपर्ट से इन नामों के पीछे की सत्यता जानने की कोशिश की।
बहू बाजार
पुराने समय में आवागमन का साधन नहीं था। लोग पैदल या बैलगाडिय़ों में सफर करते थे। ऐसे में दूर के स्थानों पर शादी होने पर दुल्हन को पालकी से लाया जाता था। शाम होने पर पालकी को किसी खास स्थान पर ठहराया जाता था। बहू बाजार जिसका पुराना नाम बडड़ेरा था, यहां एक खास स्थान पर पालकी रुकती थी और बहू (दुल्हन) यहां रात्रि विश्राम के लिए रुकती थी। इसी कारण स्थान का नाम ही बहू बाजार पड़ गया।
डोरंडा
डोरंडा मुंडारी शब्दों 'दुरंद दाह' का अपभ्रंश है। 'दुरंद' का मतलब गीत गाता हुआ और 'दाह' मतलब नदी होता है। यानी दुरंद दाह का मतलब गीत गाता हुआ पानी है। डोरंडा के बीचो-बीच प्रसिद्ध हरमू नदी गुजरती है। कभी यह नदी पूरे वेग से उछलती-कूदती यहां आती थी (अब नाली जैसी स्थिति है), इसी कारण इस स्थान का नाम दुरंद-दाह पड़ा, जो कालांतर में अपभ्रंश होता हुआ डोरंडा हुआ।
बूटी मोड़
बूटी शब्द से लोग इस जगह को जड़ी-बूटी के नाम से जोड़कर देखते हैं। बूटी शब्द का अंग्रेजी में अर्थ होता है लूट या लूट का माल। अंगरेजों के समय में इस इलाके के लोग चोरी में सम्मिलित पाए गए, जिसके कारण उस गांव का नाम ही बूटी (चोरों का गांव) रख दिया गया। बूटी गांव के कारण ही इस चौक का नाम बूटी मोड़ पड़ा। अंग्रेज चले गए, लेकिन इलाके का नाम अब भी बूटी (चोरों का मोहल्ला) है और लोग इस नाम को ढो रहे हैं।