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विश्वास कीजिए, इस शख्स ने अपने हौसले से हरा दिया कैंसर को

स्मिता मुग्धा | Apr 10, 2012, 12:07PM IST
 
 

शैलेश की जिंदगी की रफ्तार सुकून और जिंदादिली के साथ चल रही थी। सुबह उठना, एक्सरसाइज, मॉर्निग वॉक, घर में मां-पापा और छोटे भाई का साथ। लगता था यही तो जिंदगी है। अचानक फरवरी 2011 में वक्त ने करवट बदली। कोल्ड व फीवर की शिकायत के बाद ट्रीटमेंट में टाइप ऑफ ब्लड कैंसर निकला। इसके बाद अंतहीन पीड़ा। आखिरकार लंबी और काली लगने वाली रात खत्म हुई और कैंसर को हराकर शैलेश ने नई जिंदगी की शुरुआत की। दर्द का सफर खुद शैलेश की जुबानी सुनिए।



रांची। कभी टाइफाइड, जॉन्डिस या ऐसी किसी बीमारी के लिए मेडिकल ट्रीटमेंट नहीं लिया। पिछले साल फरवरी में कोल्ड और फीवर रहने लगा था। फरवरी के अंतिम दिनों में पेट के लेफ्ट साइड भयानक दर्द उठा। डॉक्टर को दिखाया जिसके बाद ब्लड टेस्ट और दूसरे कुछ टेस्ट कराए। ब्लड कैंसर के डाउट के बाद मार्च के पहले हफ्ते में वेल्लोर क्रिश्चियन हॉस्पिटल में बोनमेरो टेस्ट और माइल्याड यूक्रेनिया डायग्नोस में टाइप ऑफ ब्लड कैंसर निकला।



ये सफर किसी के लिए आसान नहीं रहता है। इस दौर में मैंने जिंदगी के कई पक्षों को महसूस कर लिया। असहनीय पीड़ा के बीच नाउम्मीदी तैर जाती थी। लेकिन फिर परिवार को देखने पर लगता था कि सब सह लूंगा। भरोसा था कि सब कुछ बीत जाता है। वाकई, सब कुछ बीत ही गया।



दर्द के इम्तिहान से गुजरा



ब्लड कैंसर की रिपोर्ट आने के बाद कीमोथेरेपी शुरू हुई। चार साइकिल कीमो, असहनीय पीड़ा, सामने मां-पापा और छोटे भाई की उम्मीद से भरी आंखें। लगता था भगवान 32 साल की उम्र में ही धैर्य और दर्द सहने की परीक्षा ले रहे हैं। फिर बोनमेरो ट्रांसप्लांट के लिए डोनर की तलाश शुरू हुई। किस्मत ने साथ दिया और छोटे भाई से बोनमैरो मैच कर गया। लगा कि अब सवेरा देखूंगा। आखिरकार खुशी ने दस्तक दी। जनवरी 2012 में घर लौट आया हूं।
 
 
 

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