रांची। रामगढ़ के नागेश्वर प्रसाद को पैंक्रियाज का कैंसर था। जांडिस का लेबल काफी हाई था और आंखें पीली पड़ चुकी थी। ऐसे में रोगी एक तरह से मौत के काफी करीब पहुंच चुका होता है। यह कहना है सिंघल सर्जिकल हास्पिटल के कैंसर सर्जन डॉ. अजय कुमार का।
बताते हैं कि रोगी पहले जांडिस के इलाज के लिए डॉक्टरों से मिला। जांच में पता चला कि पैंक्रियाज का कैंसर है। ट्यूमर के कारण पित्त की नली ब्लॉक हो चुकी थी। इसी कारण जांडिस हुआ था। रामगढ़ में किसी सीनियर डॉक्टर ने सलाह दी कि इलाज के लिए रोगी को मुंबई जाना चाहिए। डॉक्टरों की सलाह पर नागेश्वर इलाज के लिए टाटा मेन हॉस्पिटल मुंबई चला गया। वहां के डॉक्टरों ने जांच करने के बाद उसे तीन महीने बाद का ऑपरेशन का समय दिया। इस ऑपरेशन के लिए लगभग डेढ़ लाख रुपए का खर्च बताया गया। इतना पैसा जुटाना नागेश्वर की क्षमता से बाहर था। निराश होकर वह रामगढ़ वापस लौट आया।
इस बीच अप्रैल 2011 में जब हमलोगों ने रामगढ़ में नो टोबैको डे पर अवेयरनेस कैंप लगाया था, तो उसकी हम लोगों से मुलाकात हुई। जब हमने देखा तो पहली बार लगा कि केस इनऑपरेबल हो गया है। जांडिस लगातार बढ़ता जा रहा था। इससे लीवर फेल होकर मरीज के जान को खतरा हो सकता है। यही नहीं, मरीज की बैक में भी पेन हो रहा था। उसकी आंखें पीली पड़ चुकी थीं। हालांकि जब मुंबई में जांच हुई थी, तब केस ऑपरेशन करने लायक था।
इसके बाद मरीज को रांची लाकर हमने जब दुबारा सिटी स्कैन करवाया तो लगा कि अब उसके बचने का फिफ्टी-फिफ्टी का चांस है। कुछ भी हो सकता था। यह एक बड़ी चुनौती थी। फिर भी हमने केस टेकअप किया। मेजर सर्जरी होनी थी। मरीज और उसके दोनों बेटे तैयार हो गए। हमने भी इस ऑपरेशन के लिए रिस्क लिया और हमार प्रयास सफल रहा। आज आठ माह से ज्यादा होने को है, मरीज की स्थिति काफी अच्छी है।
केस जटिल इसलिए :आमतौर पर ऐसे केस काफी सीरियस होते हैं। इसे विपल्स ऑपरेशन कहते हैं। सर्जरी कर टच्यूमर के साथ ही गैस्ट्रिक जूस, पित्त जूस और पैंक्रियाज ग्लैंड जूस को नली समेत निकालना पड़ता है। काफी कंप्लीकेटेड केस होता है।
फैक्ट फाइल
5000
कैंसर पीड़ित हैं रांची समेत पूरे राज्य भर में
80
प्रतिशत मामलों में समय पर जांच होने से बचाई जा सकती है कैंसर पीड़ित व्यक्ति की जान