BUZZ: किस्सा 'गैंग्स आफ वासेपुर' का, 3 साल में बना 'जिओ हो बिहार के लाला...'

आज रिलीज हुई अनुराग कश्यप की फिल्म 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' के खूब चर्चे हो रहे हैं। इसके सभी गाने पहले ही हिट हो चुके हैं। फिल्म की म्यूजिक डॉयरेक्टर स्नेहा खानवलेकर ने 'जिओ हो बिहार के लाला...' पर पूरे तीन साल काम किया, तब जाकर यह बन पाया।
जब उन्हें फिल्म ऑफर हुई, उस वक्त उन्हें बिहार और बिहारी लोक संगीत के बारे में कुछ भी नहीं पता था। स्नेहा के मुताबिक उन्हें 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' के गाने के लिए त्रिनिदाद जाकर प्रेरणा मिली। स्नेहा गैंग ऑफ वासेपुर से पहले, ओए लकी लकी ओए, लव, सेक्स और धोखा के साथ भेजा फ्राय 2 में भी म्यूजिक दे चुकी हैं।
वहशी जुर्म के लिए बदनाम 'वासेपुर' की यह है असली और फ़िल्मी कहानी
'गैंग्स ऑफ वासेपुर' दो भागों में बनी है। करीब साढ़े पांच घंटे की इस फिल्म में 25 गाने हैं। इस फिल्म के प्रोमोशन के लिए अभिनेता मनोज वाजपेयी और कुछ दूसरे कलाकार दैनिकभास्कर.कॉम के आफिस भी आए थे (देखें तस्वीरें)। फिल्म का जबरदस्त प्रोमोशन किया गय है। इसे लेकर आज सोशल साइट्स पर भी खूब चर्चा हो रही है।
विवाद भी खूब
'गैंग्स ऑफ वासेपुर' का शहर वासेपुर झारखंड के धनबाद जिले का एक छोटा सा कस्बा है। कहा जाता है कि वहां रात में आठ बजे के बाद निकलना खतरे से खाली नहीं है। जब धनबाद से वासेपुर के लिए निकलते हैं तो आपको पहले ही बता दिया जाता है आठ बजे के बाद वहां मत जाइएगा। वासेपुर कोयले की खानों और इसके लिए होने वाले वहशी जुर्म के लिए बदनाम बताया जाता है।
मुस्लिम बहुल्य वासेपुर को अनुराग कश्यप ने इंटरनेशनल लेवल पर एक पहचान दे दी है। लेकिन कुछ लोग इससे नाराज भी हैं। इनका कहना है कि अनुराग यहां के मुसलमानों को बदनाम करने पर तुले हैं।
फिल्म के लेखक जीशान कादरी को धमकी भी मिल चुकी है। फोन पर एक शख्स ने उन्हें धमकाते हुए कहा था कि अनुराग ने फिल्म के माध्यम से वासेपुर को बदनाम किया है। यह यहां की सच्चाई नहीं है। कादरी ने जो किया, ठीक नहीं किया। अब इसके लिए उन्हें पछताना पड़ेगा। कादरी को धनबाद में घुसने नहीं दिया जाएगा। जीशान अभी मुंबई में हैं। उनका पूरा परिवार फिलहाल वासेपुर में ही रहता है
गुस्से में है वासेपुर
वासेपुर के लोगों ने फिल्म को बैन लगाने की मांग की है। इस संबंध में सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी, केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय, राज्यपाल डॉ सैयद अहमद और झाविमो प्रमुख बाबूलाल मरांडी को ज्ञापन सौंपा गया है। सामाजिक कार्यकर्ता परवेज अख्तर ने बताया कि मुस्लिम बहुल क्षेत्र वासेपुर की आबादी लगभग दो लाख है। यहां के कई लोगों प्रशासनिक पदों पर कार्यरत हैं। फिल्म में कई आपत्तिजनक डॉयलाग बोले गए हैं। यहां के लोगों को बदनाम करने की साजिश की जा रही है। कश्यप ने भी वासेपुर के बारे में कई आपत्तिजनक बात कही है।
काला इतिहास
झारखंड की कोयले की खदानें काले हीरे के बदले खून मांगती हैं। यहां कोयले के साथ आग और मौत का खेल चलता रहता है। तीन दशक में यहां 23 से भी अधिक व्यवसायियों और माफियाओं की हत्या हो चुकी है। यह कई जेनरेशन से चली आ रही गैंगवार का नतीजा है।
वासेपुर स्थित आएशा मस्जिद के इमाम मुबारक हुसैन की माने तो वासेपुर मुसलमानों के इलाके के तौर पर मशहूर है। ऐसे में अनुराग कश्यप ने वासेपुर के नाम से फिल्म बनाकर, मुसलमान चरित्रों के माध्यम से शहर को बदनाम किया है।
वासेपुर एकता मंच के अध्यक्ष और फिल्म के विरोध में रांची हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल कर चुके जावेद खान कहते हैं कि गैंग्स ऑफ वासेपुर के माध्यम से पूरे वासेपुर समाज और कौम को बदनाम किया जा रहा है।
क्यों है विवाद
यह फिल्म धनबाद के वासेपुर में चल रहे गैंगवार व धनबाद के कोल माफियाओं पर आधारित है। फिल्म में दिखाया गया है कि किस प्रकार यहां माफिया पनपे और गैंगवार हुआ। फिल्म की कहानी उस समय से शुरू होती है जब भारत में ब्रिटिश सरकार अपनी आखिरी सांसे गिन रही थीं। शाहिद खान लुटेरा है जो ब्रिटिश ट्रेनों को लूटता है। बाद में, वह रामधीर सिंह के कोयला खान में मजदूरी करने लगता है। जिन लोगों से उसकी पुश्तैनी दुश्मनी चल रही होती है, उनसे वह बदला लेना चाहता है। शाहिद का बेटा सरदार खान अपने बाप के अपमान का बदला लेने की कसम खाता है और वासेपुर का दबंग अपराधी बन जाता है, जिससे सभी डरते हैं और वह अपने दुश्मनों से बदला लेता है। यह कहानी सच्ची घटनाओं से प्रेरित है।





