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झारखंड की बेटियों को बचाने की करें पहल

 
Source: Bhaskar News   |   Last Updated 10:36(06/02/12)
 
 
 
 
जमशेदपुर। एटसेक (एक्शन अगेंस्ट ट्रैफिकिंग एंड सेक्सुअल एक्सप्लायटेंशन ऑफ चिल्ड्रन एंड वीमेन) झारखंड चैप्टर के स्टेट को-ऑर्डिनेटर संजय कुमार मिश्रा ने भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) से अपील की है कि वे झारखंड की बेटियों को बचाने में आगे आएं।



गोपाल मैदान बिष्टुपुर में चल रहे इंटरप्राइज झारखंड 2012 के तहत रविवार को आयोजित इंडस्ट्री एनजीओ इंटरफेस में उन्होंने कहा कि प्रत्येक साल झारखंड की 30 हजार बेटियों को दिल्ली में रोजगार के नाम पर पांच से 10 हजार में बेच दिया जाता है। कोई ऐसा दिन नहीं है, जिस दिन दिल्ली रेलवे स्टेशन पर झारखंड की 10 से 15 लड़कियों को रेस्क्यू कर बचाया नहीं जाता हो।



श्री मिश्रा ने कहा कि अगर मुंबई हॉलीवुड है, तो दिल्ली चाइल्डहुड। त्रासदी यह है कि परिवार वाले भी इन्हें दिल्ली रिटायर कह अपनाने को तैयार नहीं हैं। अगर यही स्थिति रही तो गुमला और सिमडेगा जिले में लड़कों की शादी के लिए लड़कियां नहीं मिलेंगी। स्टेट को-ऑर्डिनेटर ने बताया कि इस ठगी के धंधे में दिल्ली में 1400 फेक एजेंसियां काम कर रही हैं, जो झारखंड की बेटियों को बहलाकर ले जाती है और वहां बेच देती है। रेस्क्यू कर झारखंड लायी जा रही लड़कियों के सामने आजीविका एक प्रमुख समस्या है।




उन्होंने सीआईआई से अनुरोध किया कि वे ऐसी लड़कियों को प्रशिक्षित कर स्थानीय उद्योगों में रोजगार दिलाने की पहल करें। फिलहाल एटसेक स्थानीय उद्योगों के सहयोग से इन्हें सिक्युरिटी गार्ड, हाउस कीपिंग और मोटर ड्राइविंग की ट्रेनिंग दी जा रही है।



अब तक नहीं मिली एसएमपी के विस्थापितों को आजीविका



चांडिल से आए निखिल रंजन महतो ने कहा कि सुवर्णरेखा परियोजना (एसएमपी) के विस्थापितों को अब तक सही तरह से पुनर्वास की व्यवस्था नहीं कराई गई है। विस्थापित होने वाले ज्यादातर लोग खेतीहर हैं। लेकिन ट्रेनिंग नहीं होने से वे भूखे रहने को विवश हैं। उन्होंने बताया कि ये किसान बहुतायत मात्रा में टमाटर की खेती करते हैं। अगर इस क्षेत्र में फूड प्रोसेसिंग की यूनिट लग जाए, तो उन्हें ट्रेनिंग देकर बेहतर पुनर्वास किया जा सकता है।



बाजार की सुविधा नहीं



रांची के बुढ़मू से आई सुरभि डेवलपमेंट की मीना कुमारी ने कहा कि मधुमक्खी व मुर्गीपालन के क्षेत्र में उनका एनजीओ काम कर रहा है। लेकिन बाजार नहीं मिलने से लागत भी नहीं आ पाती। इंडस्ट्री एनजीओ इंटरफेस में लगभग 30 एनजीओ की भागीदारी रही। मौके पर उपस्थित सीआईआई झारखंड स्टेट काउंसिल के चेयरमैन आनंद सेन ने कहा कि वे एनजीओ की ओर से आए सुझावों को सीआईआई की स्टेट काउंसिल में रखेंगे और इन समस्याओं को दूर करने में सीआईआई और इंडस्ट्री क्या कर सकते हैं, उसपर रणनीति बनाई जाएगी।



सीआईआई की कोशिश है कि स्थानीय लोगों की दक्षता को बढ़ा कर उन्हें इस लायक बनाया जाए कि वे अपनी रोजी-रोटी कमा सकें। इसी मकसद को ध्यान में रख 30 गुरुकुल की स्थापना की जा रही है। इस सत्र में स्वागत भाषण जैमिकोल के प्रबंध निदेशक अमिताभ बख्शी और कनक्लूडिंग रिमार्क्‍स ईस्टर्न ट्रेवल प्राइवेट लिमिटेड के उदय धीर ने दिया।




सिर्फ 12 कंपनियों ने साइन किया है कोड ऑफ कंडक्ट



झारखंड सीआईआई के चेयरमैन आनंद सेन ने बताया कि स्थानीय कंपनियों की ओर से सीआईआई कोड ऑफ कंडक्ट पर हस्ताक्षर करने में हो रही देरी से परिसंघ (सीआईआई) को स्थानीय लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने में मुश्किल हो रही है। झारखंड की 70 कंपनियां सीआईआई की सदस्य हैं, लेकिन अब तक केवल 12 कंपनियों ने कोड ऑफ कंडक्ट पर साइन किया है। कोड ऑफ कंडक्ट एक कमिटमेंट है, जिसे साइन करने के बाद इंडस्ट्री को अपने आसपास की आबादी और लोगों के प्रति सामाजिक रूप से उत्तरदायी होना पड़ेगा।



सीआईआई का कोड ऑफ कंडक्ट



: कंपनी को समाज के सभी वर्ग से जोड़ना होगा।
: कंपनी को सबको समान अधिकार देना होगा, ताकि समाज के सभी वर्ग का विकास हो सके।
: सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को रोजगार देगी कंपनी।
: किसी भी रूप में कंपनी लोगों के साथ भेदभाव का रवैया नहीं अपनाएगी।
: कमजोर वर्ग के आवेदकों को कंपनी केवल इसलिए नहीं छांटेगी कि उससे उनकी गुणवत्ता
कम हो जाएगी।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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