उग्रवाद से निपटने के लिए मिले विशेष केंद्रीय पैकेज

रांची। राष्ट्रीय विकास परिषद (एनडीसी) की बैठक में राज्य सरकार झारखंड को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की मांग करेगी। एनडीसी की बैठक 29 दिसंबर को दिल्ली में होगी। अध्यक्षता प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह करेंगे। तय हुआ है कि बैठक में मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा पुरजोर तरीके से झारखंड का पक्ष रखकर विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की मांग करेंगे। सीएम का तर्क होगा कि विशेष केंद्रीय पैकेज के बिना झारखंड से उग्रवाद का खात्मा संभव नहीं है। केंद्र सरकार की खनिज दोहन नीतियों से राज्य बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है। यही वजह है कि 24 में से 19 जिले उग्रवाद प्रभावित हैं। एक करोड़ 75 लाख से अधिक आबादी (48 फीसदी) बीपीएल की है। 80 फीसदी किसान लघु एवं सीमांत गरीब हैं। राज्य सरकार इन तथ्यों के आधार पर विशेष राज्य का दर्जा दिलाने के लिए दबाव बनाएगी। सरकार का मानना है कि जनगणना के आंकड़ों को देखते हुए समग्र विकास में क्षेत्रीय संतुलन के लिए झारखंड को विशेष राज्य का दर्जा मिलना चाहिए।
विकास में पीछे है राज्य
आजादी के छह दशक बाद भी दूसरे राज्यों की तुलना में झारखंड का विकास काफी पीछे है। अरुणाचल प्रदेश , असम, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, मणिपुर, सिक्किम, त्रिपुरा, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश तथा जम्मू एवं कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा मिला है। जिन मानकों के आधार पर इन राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा मिला है, उस आधार पर भी झारखंड का पक्ष मजबूत है।
इसे बनाया है आधार
30 फीसदी क्षेत्र वनों से आच्छादित होने के बाद अब भी झारखंड बाहर के खाद्यान्न पर निर्भर है। यहां प्रति व्यक्ति बिजली की औसत खपत नेशनल एवरेज से बहुत कम है। औद्योगिक इकाइयां रहने के बाद भी अधिकतर सार्वजनिक और निजी कंपनियां अपने उत्पादन को दूसरे राज्यों में स्टॉक ट्रांसफर कर देती हैं। 1 2 फीसदी जमीन की बर्बादी खान-खदान की खुदाई के कारण हो रही है। राज्य प्रदूषण की गंभीर मार झेल रहा है। सरकार को वन बचाने पर करीब 500 करोड़ रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं। राज्य की आधी आबादी गरीब है। पहले पंचवर्षीय योजनाओं में केंद्र द्वारा राज्यों को समर्थन के रूप में 34 फीसदी बजट दिया जाता था। पिछली तीन पंचवर्षीय योजनाओं से इसे घटाकर 23 फीसदी कर दिया गया। 75 फीसदी कर लिया है। इससे झारखंड जैसे राज्य को नुकसान हुआ है।
मानक पूरा करता है झारखंड
झारखंड आदिवासी बहुलता वाला राज्य है। पठारी क्षेत्र के साथ-साथ यह अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटा है। अति नक्सल प्रभावित राज्य है। खनिज उत्खनन के कारण विस्थापन और गरीबी के चलते बड़ी संख्या में लोग पलायन कर रहे हैं। राज्य की आर्थिक स्थिति भी गड़बड़ है। लगातार कर्ज बढ़ता जा रहा है। वेतन भुगतान के लिए पैसे के लाले पड़ जाते हैं।
परिसंपत्ति का निर्माण भी ठीक से नहीं हो पा रहा है। झारखंड अब भी बाहर के खाद्यान्न पर निर्भर है। यहां प्रति व्यक्ति बिजली की औसत खपत नेशनल एवरेज से बहुत कम है।
देश की प्रगति का बोझ झेल रहा झारखंड
देश की प्रगति में झारखंड सर्वाधिक प्रदूषण की मार झेल रहा है। कोयला, आयरन ओर, यूरेनियम के उत्खनन और वाशरी एवं केंद्रीय विद्युत तापघरों के कारण यहां तेजी से प्रदूषण फैल रहा है। खनिजों की खुदाई और ढुलाई के कारण वनों की कटाई हो रही है। दामोदर नदी का पानी जहरीला हो गया है। सुवर्णरेखा और कोयल नदी का भी कमोबेश यही हाल है। सीसीएल, बीसीसीएल, डीवीसी और एनटीपीसी की कई इकाइयों से नदियां प्रदूषित हो चुकी हैं। कोयला कंपनियों और बड़ी औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला जहरीला पानी और कचड़ा नदी में गिर रहा है। इस्पात कंपनियों से निकलने वाला कचड़ा और यूरेनियम का रेडिएशन जमा होने से पानी उपयोग योग्य नहीं है।






