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चुशूल आज भी लड़ रहा है चीन से
उपमिता वाजपेयी
| Oct 07, 2012, 07:07AM IST

चीन के कब्जे वाले अक्साई-चिन से मात्र छह किलोमीटर दूर है लद्दाख का गांव चुशूल। यहां पहुंचने के लिए प्रशासन से परमिट लेना होता है। क्योंकि इलाका संवेदनशील है। चीन और भारत दोनों की ही सेना यहां गश्त लगाती है। लेह से करीब आठ घंटे के सफर के बाद एक पहाड़ के ढलान पर नजर आता है 100-150 घरों वाला चुशूल। 14000 फीट की ऊंचाई पर यही वो युद्ध क्षेत्र था, जहां 50 साल पहले हमारे सैनिकों ने चीन के पैर नहीं जमने दिए थे। उसे लौट जाना पड़ा।
यहां हुए खूनखराबे के गवाह हैं कांचोक गेलसा और ताशी। चुशूल निवासी ये दोनों बुजुर्ग 62 के युद्ध के दौरान सेना में पोर्टर (सामान उठाने वाले) थे। तब गांव के ज्यादातर लोग यही काम करते थे। कांचोक कहते हैं कि अक्साई-चिन के निर्जन इलाके को पार करते हुए चीन के सैनिक यहां तक तो बेधड़क चले आए। लेकिन फिर उन्हें ऐसा जवाब मिला, जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। उन्होंने हमारा एक सैनिक शहीद किया तो हमने उनके दस सैनिक मार गिराए। 85 वर्षीय कांचोक और 76 वर्षीय ताशी कहते हैं कि दुख होता है चीन ने हमारे अक्साई चिन के 38 हजार वर्ग किमी क्षेत्र पर कब्जा कर रखा है। गांव की पहाड़ी के पीछे पैंगूर झील है। जो पहले हमारे ही गांव का हिस्सा थी। लेकिन युद्ध के बाद से चीन के कब्जे में है।
कांचोक के मुताबिक जंग को 50 साल बीत गए, लेकिन उसका तनाव हर दम बना रहता है। सड़क और पानी को लेकर कोई योजना बनती है तो चीनी सेना आपत्ति दर्ज कराती है। तनाव टालने के लिए काम रोक दिया जाता है। हमारे मवेशी उस ओर चले जाएं तो सेना की मदद से वापसी हो पाती है।
ताशी बताते हैं कि बुनियादी सुविधाओं की बहुत कमी है। चुशूल से लेह जाने के लिए सरकारी बस है। लेकिन हफ्ते में दो दिन ही चलती है। गांव से 100 किमी दूर तक मौजूद बंजर पहाड़ियों और सेना की पोस्ट के अलावा यहां के लोगों ने बाहरी दुनिया कुछ साल पहले ही देखी है। गांव में टीवी जो आ गया है।
मिलिए, गांव की इकलौती पोस्ट ग्रेजुएट से
दाचिन डोलमा गांव की इकलौती पोस्ट ग्रेजुएट हैं। बेंगलुरू यूनिवर्सिटी से एम.कॉम. करने वाली दाचिन कहती हैं कि पढ़ाई के दौरान घरवालों से बात करने में बड़ी मुश्किल होती थी। गांव में एक ही सैटेलाइट फोन है। इनकमिंग के लिए सुबह 10 से 10.30 और दोपहर 3 से 3.30 का टाइम फिक्स है। 26 वर्षीय दाचिन की पढ़ाई का जिम्मा लेह के एक एनजीओ ने स्पेशल एजुकेशन स्कीम के तहत उठाया था। दाचिन को अब गांव के ही सरकारी स्कूल में नौकरी मिल गई है। वे गांव की लड़कियों को कॉलेज जाने के लिए प्रेरित कर रही हैं।
दिनभर गोला-बारूद उठाते थे और शाम को लाशें
कांचोक कहते हैं कि अक्टूबर में यहां ठंड इतनी होती है कि फल भी ग्रेनेड की तरह सख्त हो जाते हैं। ऐसे विपरीत मौसम में युद्ध के दौरान हम दिनभर गोला-बारूद उठाते और शाम को लाशें। लेकिन अंत सुकून देने वाला रहा..
10 जुलाई 1962: हमारी गोरखा चौकी को करीब 350 चीनियों ने घेर लिया। करीब 200 मीटर की दूरी से वे लाउड स्पीकर पर गोरखा सैनिकों को कहते रहे कि वे भारत की ओर से युद्ध न करें। लेकिन सूबेदार जंग बहादुर ने उन्हें धमकी दी कि वे लौट जाएं वरना ठीक नहीं होगा। चीनी लौट तो गए, लेकिन यह तय हो गया कि जंग होकर रहेगी।
19-22 अक्टूबर: सीमा चौकियों पर कब्जा करते हुए चीनी चुशूल तक आ गए।
22-30 अक्टूबर: हमारे सैनिकों के पास कुछ छोटे हथियार और दो मोर्टार ही थे। लेकिन इलाके की अच्छी जानकारी और पहाड़ों पर मौजूद होने से चीन के सैनिक आसान शिकार बने। और ज्यादा मारे गए। (फिर 20 दिन तक छिटपुट गोलाबारी होती रही।)
19 नवंबर: मेजर शैतान सिंह 13 कुमायूं कंपनी के 127 जवानों के साथ एअरफील्ड पर तैनात थे। वे सबको हिदायत देते कि ‘दुश्मन कभी भी हमला कर सकता है।’ सुबह के चार बजे थे। चीन ने अचानक जबर्दस्त हमला बोला। हमारे सैनिक डटे रहे। और जवाबी हमला किया। चीनियों को ही लौटना पड़ा।
21 नवंबर: संघर्ष विराम की घोषणा हुई।
चीन युद्ध : बैकग्राउंड
ऐसे बढ़ा तनाव
चीन अक्साई चिन और नेफा (अरुणाचल प्रदेश) को अपना हिस्सा बताता रहा।
तिब्बत में असंतोष फैला। चीन ने दमन किया तो दलाई लामा ने भारत में शरण ली। चीन को ये नागवार गुजरा। और सीमा पर गोलीबारी शुरू कर दी।
यह हुआ परिणाम
हमने चीन के हमला न करने के वादे पर भरोसा किया। सेनाएं तैयार नहीं थी। चीन ने अक्साई-चिन और नेफा पर कब्जा कर लिया।
बाद में नेफा से तो वह लौट गया, लेकिन अक्साई-चिन पर उसका कब्जा आज भी है।






