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जो अब मंथन न किया, तो बस विष बचेगा!

Danik bhaskar.com | Jan 02, 2013, 20:16PM IST
 
 


उसने सब तबाह किया था, विश्वास, मर्यादा, गरिमा सब कुछ। पर बच्चा, उसका क्या दोष?

 

एक पीड़िता की कहानी डॉ. हेमनलिनी स्वामी की क़लम से...

 



अपलक बैठी मैं दीवार पर लगी घड़ी को देख रही थी। मन में आशंका के बादल घुमड़ रहे थे। फोन आने ही वाला था। रोहित हर दूसरे मंगलवार को फोन करता था। और मैं हमेशा उसका फोन उठाने से बचती थी। मंगलवार को इसी समय मैं हमेशा खेड़ापति मंदिर चली जाती थी। लेकिन आज सतीश घर पर नहीं हैं, रागिनी अपनी पीएचडी की थीसिस टाइप करने सुबह ही चली गई है।



सतीश हिदायत दे गए हैं कि रोहित का फोन आएगा, तुम मंदिर मत चली जाना। वो अमेरिका से आने वाला है, आज अपने आनेकी डेट कन्फर्म करेगा। सुनते ही मैं जड़ हो गई। उसकी आवाÊा कैसे सुनूंगी? वो आ रहा है, कैसे झेलूंगी उसे? अब वो कैसे दिखता होगा? क्या उस जैसा नहीं.. नहीं।

 

 

 

पिछले पंद्रह साल से रोहित अमेरिका में अपनी बुआ के पास है। उसकी इंजीनियरिंग पूरी हो गई, तो वहीं से एमएस कर रहा है।

बहुत होशियार है। सतीश के सारे दोस्त तारीफ़ करते हुए कहते हैं, ‘बेटा हो तो रोहित जैसा।’ सतीश तो सुनकर ख़ुश हो जाते हैं, पर मेरे अंदर जैसे कांच की किरचें चुभने लगती हैं। कई बार रोहित की होशियारी की बातें सुनकर आश्चर्य होता है। वो तो ऐसा नहीं था। रोहित बचपन से ही होशियार है। हालांकि मैंने उसकी पढ़ाई पर ध्यान नहीं दिया। पढ़ाई क्या, मैंने तो रोहित पर ही ध्यान नहीं दिया, लेकिन रागिनी और सतीश उसे हर व़क्त खिलाते रहते थे। सतीश को बेटा चाहिए था, सो उन्हें रोहित के रूप में मिल गया और रागिनी को छोटे भाई के रूप में एक खिलौना। पर मुझे.. मुझे क्या मिला? जबजब मैं नन्हे रोहित की तरफ़ देखती, उस पल की पीड़ादायक स्मृति मेरे शरीर पर चींटियों की तरह रेंगने लगती और मैं एकदम अवसादग्रस्त हो जाती। हालांकि कितने साल बीत गए पर आज भी उस दिन की याद आते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

उफ!! कैसा भयानक पल था। जब एक तरफ़ मैं और दूसरी तरफ़...

ट्रिन ट्रिन ट्रिन.. टेलीफोन की घंटी बज उठी। मैं एकदम चौंक कर कुर्सी से उठी। रोहित का ही फोन होगा उठाऊं? कैसे बात करूंगी? ..क्या बात करूंगी? इतने बरसों बाद उसकी आवाज सुनकर कैसा लगेगा? ट्रिनट्रिन..घंटी बजे जा रही थी। हिमत करके मैंने फोन उठा लिया, ‘हैलो, हैलो डैड मैं रोहित।’ रोहित की आवाज है यह। इस आवाज में तो उस आवाज का कोई अंश नहीं, जो आज बरसों बाद भी दिमाग़ के बंद दरवाजें खड़खड़ाती है। ‘खोलो, खोलो.. खोलती है कि नहीं?’

‘नहीं, नहीं।’ मेरी चीख़ती आवाज।

‘खोल.. नहीं तो..।’

‘रुकोरुको।’ मेरे हाथ कांपने लगे। हाथ से रिसीवर छूट गया। ‘हैलो डैड, मैं रोहित।’ अभी भी रिसीवर से आवाज आ रही थी।

अचानक पीछे से आकर सतीश ने रिसीवर उठा लिया।

‘हैलो, हां बोल बेटे, मैं डैडी बोल रहा हूं। अरे वो फोन मेरे हाथ से फिसल गया था।’

‘मम्मी?’ रोहित का प्रश्न पूरा होने से पहले ही सतीश ने जवाब दिया, ‘बेटा, वो तो पूजा मैं बैठी है। तू कब चल रहा है? अच्छा परसों की लाइट है। गुडगुड आ जाओ बेटे। मैं तुझे लेने एयरपोर्ट पर पहुंच जाऊंगा।’‘..और मम्मी?’ रोहित ने पूछा।


‘हां, मम्मी भी आएगी। तेरी रागिनी दीदी भी आएगी। हम सभी आएंगे, इतने दिनों बाद हमारा बेटा जो आ रहा है। ओके बेटा, टेक केयर।’ फोन रखकर सतीश ने ग़ुस्से से मेरी ओर देखा, ‘तुहें क्या हो जाता है? इतने साल बीत गए हैं, भुला नहीं सकती उन पुरानी बातों को? रोहित हमारा है.. हमारा बेटा। उसको किसी दुर्घटना के साथ मत जोड़ो। वो तो अच्छा हुआ मैं घर चला आया, नहीं तो..’ बड़बड़ाते हुए सतीश बैठक से चले गए। मैं अपराधी सी खड़ी रही।



रागिनी भी कॉलेज से आ गई थी। घर में घुसते ही डैडी से समाचार मिला कि भइया परसों आ रहे हैं, तो ख़ुश हो गई। सभी ख़ुश हैं, तो मैं ख़ुश क्यूं नहीं हूं? आख़िर रोहित मेरा बेटा है। पैदा तो मैंने ही किया है, फिर भी क्यों मैं उसे आज तक अपना बेटा नहीं मान पाती। सिर्फ़ इसीलिए कि सतीश उसके पिता नहीं हैं। लेकिन जब सतीश को इस बात का ग़म नहीं है, तो मुझे क्यों है?



 ‘तेजबहादुर? तेजबहादुर ही है। बदमाश, फौरन बेडरूम से बाहर निकलो, नहीं तो साहब से बोलकर नौकरी से निकलवा दूंगी।’ मैं अंदर से चिल्लाई। एक हाथ छेद पर रखा था, इसलिए कपड़े भी नहीं पहन पा रही थी। लेकिन बाहर से थपथपाहट और तेज हो गइर्। ‘खोल.. खोल दरवाजा खोल।’ मैं घबराने लगी।

 

क्या करूं, क्या न करूं। आसपास कोई दूसरा बंगला भी नहीं था। किसचिल्लाकर बुलाऊं? अचानक बाहर से रागिनी के रोने की आवाज आने लगी। मैंने छेद से झांका तो देखा कि तेजबहादुर ने रागिनी को बेरहमी से पकड़ रखा था और दूसरे हाथ से दरवाजे पर मुक्के मारे जा रहा था। शराब से लड़खड़ाती आवाज और आंखों में उतरी वासना ने उसे इस क़दर अंधा कर दिया था कि उसने रागिनी को नीचे पटक कर दरवाजे पर लात मारी। ‘खोलती है

दरवाजाकि मैं तेरी लड़की को ही...’




‘नहीं नहीं।’ चीख़ते हुए मैंने दरवाजा खोला और रागिनी के पास भागी, तभी दो पैशाचिक हाथों से मुझे पकड़ लिया। होश आने तक सबकुछ बदल चुका था। तेजबहादुर फरार हो चुका था। सतीश ने लखनऊ ट्रांसफर ले लिया। उस हादसे के बाद मुझे बारबार दौरे पड़ जाते थे। ऐसे में मालूम ही नहीं पड़ा कब गर्भ ठहर गया। मेरी मानसिक स्थिति इतनी ख़राब थी कि डॉक्टर अबॉर्शन का रिस्क न ले सके। मेरी और रागिनी की देखभाल के लिए सतीश ने एक भली महिला सुजैन का प्रबंध कर लिया था।



उसी उन्माद की अवस्था में मैंने रोहित को जन्म दिया। तेजबहादुर की झलक तक नहीं  थी उसके चेहरे पर, लेकिन उसे देखते ही मेरे मुंह से  चीखें निकलने लगतीं। न मैंने कभी उसे गोद में उठाया, न अपना दूध पिलाया। रोहित को सतीश, रागिनी और सुजैन ने मिलकर ही पाला।



रोहित चार साल का हो चला था, तब सुजैन नौकरी छोड़ गई थी। रोहित की देखभाल कौन करता? उन्हीं दिनों अमेरिका से सतीश की बहन इंडिया आई थी। उसकी कोई संतान नहीं थी। सतीश ने अपनी समस्या उन्हें बताई। वे ख़ुशीख़ुशी अपने एकमात्र भतीजे को अमेरिका ले गईं।



वही बीस साल का रोहित आज अपने घर आ रहा है। मैं कैसे सामना करूंगी उसका? उसकी नजरें मुझसे ढेरों सवाल करेंगी। मां, उस हादसे में मेरा क्या कसूर था? तुमने मुझे अपना दूध, अपना स्नेह, अपना संरक्षण कुछ भी तो नहीं दिया। अपनी गोद और अपने प्यार से सदा वंचित रखा। क्यों मां क्यों? मैं क्या जवाब दूंगी उसके सवालों का? कैसे बता पाऊंगी कि तुम मेरे अरमानों का स्वरूप नहीं, बल्कि हादसे का नतीजा हो। नहीं ये सब मैं उससे नहीं कह सकती। एक हादसा ही सही, पर कोख से तो मेरी जन्मा था वो। मेरे शरीर का अंश। उसे कितनी बेदर्दी से मैंने काटकर अलग कर दिया।

मेरी आंखों से आंसुओं की धारा बह चली।  तेजी से उठकर मैंने सतीश की अलमारी खोली और सामने ही रखा रोहित का बड़ासा फोटो सीने से लगा लिया। बरसों से सीने में रखा बोझ आंखों के रास्ते पिघलकर बहने लगा। अब मुझे परसों का इंतजार था।



ठीक है, ईश्वर ने पहले पुरुष को बनाया और फिर महिला को। आख़िर बेहतरीन कलाकृति बनाने से पहले आप उसका एक ‘रफ़ड्रा़फ्ट’ बनाते हैं! -अज्ञात



साभार- मधुरिमा टीम

 

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