सबक सादे बड़े फायदे
dainikbhaskar.com
| Nov 21, 2012, 12:16PM IST

अलार्म बंद किया और सो गए
जब किसी की नौकरी चली जाती है, या किसी को कम आयु में दिल का दौरा पड़ने की खबर मिलती है या किसी के रिश्ते पर खतरा मंडराने की बात सुनने में आती है.. तब ऐसे मौकों पर सबका ध्यान अपनी नौकरी, सेहत और रिश्ते पर तुरंत जाता है। चिंता सताने लगती है। कल से व्यायाम करेंगे, ऑफिस में ध्यान देंगे, बीवी को (या शौहर को) समय देंगे जैसे वादे होते हैं। लेकिन अगली सुबह फिर वही ढर्रा बना रहता है।
दरअसल, हम सब अलार्म को स्नूज़ पर डालते हैं यानि चुप करा देते हैं। अब सुबह की नींद का समय ही लीजिए। अलार्म बजा, उसे चुप करा दिया। दस मिनिट बाद फिर वही करते हैं। जितनी देर स्नूज़ करते हैं, उतनी देर चैन से सो भी नहीं पाते और उठते भी नहीं। यही ज़िंदगी का हाल है।
इससे सीखिए। जब अलार्म बजे, तुरंत उठें। जीवन जब कोई सावधानी बरतने की ख़बर दे, उस पर ग़ौर करें और अमल करें।
मैंने किया है..
मृणाल मेहता
कॉल सेंटर एक्ज़ेक्यूटिव
हिसाब रखना अच्छा है
कितनी बार पढ़ा होगा कि जो करना हो, उसके नोट्स बना लो। डायरी लिखो वगैरह, वगैरह। हर बार केवल हंस देती थी। क्या मुसीबत है? हर बात को लिखने से भला क्या होगा? और कितना लिखे कोई?
फिर एक बार दोस्त की पार्टी पर खेल खेलने को मिला। इसमें एक पेपर पर यह लिखना था कि बीते एक साल में आपने क्या सीखा या लिखना था कि पिछले एक साल में आप अपनी विकास यात्रा को कैसे आंकते हैं? खेल गम्भीर हो गया। जब हिसाब लगाया, तो पता चला कि नया कुछ सीखा ही नहीं है। ज़िंदगी का जो ढर्रा पहले था, वही चलता आ रहा है। नया कुछ बताने को नहीं था। तब से तय कर लिया कि अब हर हफ्ते लिखूंगी कि नया क्या सीखा और यह हफ्ता दूसरे हफ्ते से कैसे अलग था।सच कहूं, एक नई ऊर्जा का अहसास हर पल बना रहता है।
अब कोई पूछे तो पन्ना कम
पड़ जाएगा बताने में।
प्रियांशी बैनर्जी
टीचर
रास्ता ढूंढो बिंदू मिलाओ
अख़बार या पत्रिकाओं में ऐसे पृष्ठों पर महिलाओं को ठहरना ज़रा कम होता है। पर मैंने जानबूझकर इन्हीं पेजों पर ध्यान देना शुरू किया। कहां एक वक़्त था कि मुश्किलें आते ही, समस्याओं से सामना करते ही मैं घबरा जाती थी। उनकी अवहेलना करके सोचती थी कि वे खुद-ब-खुद सुलझ जाएंगी। लेकिन कठिन से कठिन रास्ता ढूंढो कॉलम को हल करने में माहिर हो चुकी मैं, अब ज़िंदगी में भी ऐसा कर पाती हूं।
किसी ने कहा है कि इनसे अच्छा मानसिक व्यायाम भी होता है और मन की सेहत चुस्त-दुरुस्त बनी रहती है, तो लीजिए, सोने पर सुहागा हो गया। नया लक्ष्य बनाया है कि वर्ग पहेलियां सुलझाऊंगी।
भाषा ज्ञान में बढ़ोतरी होगी।
ज़िंदगी बहुत कुछ सिखाती है। हम उनमें से कितनी ही बातों को ऐसे भूल जाते हैं जैसे बासी ख़बर।
फिर वह सबक सज़ा के तौर पर सामने आता है, तब आंख खुलती है। इसके बाद किस्मत को दोष दें या वक़्त को, ख़ामियाज़ा तो भुगतना ही पड़ता है। वक़्त रहते समझ लें, तो सादे सबक कितना फायदा देंगे, ज़रा देखिए।






