सबका कांहा!
dainik bhaskar
| Aug 08, 2012, 09:43AM IST

‘मेरे तो गिरधर गोपाल..!’
श्रीकृष्ण के साथ हमारा नाता जितना आत्मीय है, उतना किसी दूसरे भगवान या भगवान के अवतार के साथ नहीं। ‘यशोदा के लड़के ने मुझे पागल बना दिया है’ गाता अधेड़ बाउल जाने कब पलक झपकते किशोरी गोपिका बन जाता है और जब विलाप करता है ‘बृन्दाबौने कृष्ण नेई कीछू नेई!’ तब हम उस दर्द भरे विषाद में डूब जाते हैं जिसका अनुभव वृंदावनवासियों को उस क्षण हुआ था जब कृष्ण उन्हें अकेला छोड़ गए थे। जब मीरा झूम कर गाती हैं, ‘मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो ना कोई!’ तो ‘गिरिधर-गोपाल’ तथा ‘मेरे’ शब्द दोनों बराबर वÊानदार हैं। यह अपनापन राजस्थान की राजकुमारी से लेकर तमिल कोकिला एम. एस. सुब्बलक्ष्मी तक अक्षत रहता है। सूरदास के लिये कृष्ण ‘गोवर्धनगिरिधारी’ कम नटखट ‘माखनचोर’ ज्यादा हैं। सावन के आने के साथ ही यत्र-तत्र झूले पड़ जाते हैं और द्वापर युग में बालकृष्ण का झूलानुमा पालने में झुलाया जाना दोहराया जाता है। तंजावुर शैली के कांच पर बने सुनहरे चित्रों में जो बालगोपाल दिखते हैं वह अपने घर का या पड़ोस का ही प्यारा बच्चा जान पड़ता है। ‘मैया मोरी मैं नहि माखन खायो’ जैसा झूठ बोलता!
यह घनिष्ठ निजी नाता इसलिए जुड़ पाता है कि कृष्ण ‘श्रीकृष्ण’ कम, कान्हा या कन्हैया ही Êयादा नÊार आते हैं। उनके हाथ में चमत्कारी चक्र पकड़ा देने के बाद भी सिर पर ‘मोर-मुकुट’ तथा होंठ पर मुरली-बंशी की सुध बिसरती नहीं।
प्रेम के साथ संयोद-वियोग अनिवार्यत: जुड़े हैं।‘ निसिदिन बरसत नैण हमारे, सदा रहत पावस ऋतु हम पर जब तै स्याम सिधारे’ वाली हालत से कौन नहीं गुÊारा होता है किशोरावस्था के भावावेश में?
सांवली सूरत, मोहिनी मूरत वाले मनोरंजक छल-कपट का मूर्तिमान रूप कृष्ण अपने भक्तों के आराध्य कम, सखा ही अधिक लगते हैं- उन्हें दूसरे महिमामंडित देवताओं से बिल्कुल अलग दिखाई देते हैं। हमारे बचपन में एक फकीर गर्मियों में भटकता, मैदानों की लू से राहत तलाशता हमारे पहाड़ी गांव तक पहुंचता था। बाजू में कोहनी तक पहनी पीतल की चूड़ियों को लकड़ी के डंडे से बजाता वह गाते-गाते मस्त हो जाता था- ‘क्या-क्या कहूं मैं कृष्ण कन्हैया का बांकपन!’ बरसों बाद यह पता लगा कि इन पंक्तियों के रचयिता मशहूर जनकवि नज़ीर अकबराबादी हैं। ‘बांकपन’ शब्द में जाने कितना कुछ छिपा है, जिसका वर्णन आसान नहीं। खड़े होने की ‘त्रिभंगी’ मुद्रा इसका एक छोटा सा हिस्सा है। माथे पर बंधे कपड़े की चीर में तिरछा खोसा मोरपंख, लापरवाही से कांधे पर डाला उत्तरीय, कमर से नीचे बंधी खिसकती फिसलती-सी धोती, हाथ में मुरली जो कभी भी होंठ तक पहुंच सकती है, बोलने मे निश्छल व्यंगात्मक शैली, कनखियों के कटाक्ष का कमाल- हर हाव-भाव चपलता, अदा-अंदाज इसमें शामिल है।
यह कमाल कृष्ण कन्हैया के बांकपन का ही है कि छापाखाने, रेडियो, टेलीविÊान के पहले वाले युग में यह रचना घर-घर पहुंच चुकी थी, सदियों के अंतराल के बाद भी उतने ही प्रभावशाली ढंग से जनमानस को सींच कर हरा भरा करने में समर्थ रही है ।
संस्कृत में रचित मधुराष्टक में एक और महत्वपूर्ण आयाम उजागर होता है। ‘चलितम् मधुरम् हसितम् मधुरम् वदनम् मधुरम् मधुराधिपतेर्अखिलम् मधुरम् आदि पंक्तियां रेखांकित करती हैं कि कृष्ण के विषय में मधुर रस ही प्रमुख है। जब पुिष्टमार्गी कृष्ण के लिए बदलते मौसम के अनुसार दिन-रात के प्रहरों के अनुसार अनुकूल भोग लगाते हैं, तब भी मीठे पर ही Êाोर रहता है। यही कृष्ण प्रसंग का मुख्य भाव है- इसी मधुर रस में पगे हम कृष्णमय होते रहे हैं सदियों से!








