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महकती रौशनी है दुल्हन

dainikbhaskar.com | Nov 28, 2012, 17:14PM IST
 
 

शादी का घर यानी ख़ुशियों का ठिकाना। शादी के तो मानी ही होते हैं ख़ुश होना। यहां अकेलेपन, उदासी या सन्नाटे का कोई काम नहीं। सारे खिले रंग और ख्शबुएं आकर घर में बस जाती हैं, जैसे ही पता चलता है कि ये घर दुल्हन का है। रौनकें लगने लगती हैं। बारात अपने पूरे रंगो-रौशनी के साथ आती दुल्हन के द्वारे है। इसीलिए, शादी भले दोनों घरों के लिए बराबर का मामला हो, शादी का घर वही कहलाता है, जहां दुल्हन होती है। पहले पिता का घर, फिर बिदाई के बाद पिया का घर। 
 
एक वक्त था कि मेहमानों के लिए खाने-पीने की तैयारी के तहत, अनाजों की सफाई, पिसाई, मिठाई, नमकीन आदि के तमाम बंदोबस्त करने के लिए दुल्हन के कुनबे की महिलाएं महीनों पहले से जुट जाती थीं। दुल्हन के लिए रिश्तेदारों के बीच रहने और उनकी समझाइशों के आशीष पाने का यह बेहतरीन मौका होता था। लगे हाथ, घर की छोटी लड़कियां भी जीवन के इस सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान की बुनियादी समझ पा लेतीं। आम के  गुलाब-गेंदे के फूल और मेहंदी की महक इस घर में आकर बस जाती। रोज़ ढोलक की थाप गूंजती। सारे काम खुद किए जाते और लड़की शादी की व्यवस्था से •यादा रिश्तों और गृहस्थी का प्रबंधन सीखती। ऐसे घर अब कस्बों में कहीं हैं या रंग उड़ी पुरानी तस्वीरों में। वक़्त के कुछ सफे पलटकर देखें, तो जीने की राह दिखाते श्लोकों की तरह कहीं इस तरह की शादियों का ज़िक्र और फायदा सुनाई देगा। 
 
बदलते हालात ने भले समय की तहें लगा दी हों, सब्र समेट दिया हो, पर शादी और दुल्हन वही हैं। हया की लाली लिए, हल्दी की पवित्रता से निखरी, मेहंदी रचे हाथ, महावर रंग पांवों और सिंदूर सजाए दुल्हन जब घूंघट ओढ़ती है, तो युगों के आर-पार विवाह उसी रंग में आ खड़ा होता है। शादी की व्यवस्था और रिश्तों के प्रबंधन में फर्क़ की समझ धूमिल हुई है वरना इष्टदेव का साक्ष्य, अपनों का साथ और सारी सज-धज क़ायम है। अक्षुण्ण। अखंड।  
 
शादी है शाद का जश्न।
दुल्हन है रंगो-नूर का नाम।
 
 
 
 
 

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