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अस्तित्व

 
Source: विभा सिंह   |   Last Updated 07:44(06/10/11)
 
 
 
 
विभा सिंह, चिरमिरी, छत्तीसगढ़

दो बज गए थे। मैं जल्दी-जल्दी घर की तरफ कदम बढ़ाने लगी। पति जब से रिटायर हुए हैं, उन्हें मेरी नौकरी अखरने लगी है। ‘पूरा दिन क्या करूं? तुम भी सुबह से भागम-भाग में लगी रहती हो।’ सचम़ुच, रिटायरमेंट आयु से नहीं बल्कि तन-मन बूढ़े होने पर दिया जाना चाहिए। पूरी तरह स्वस्थ और ऊर्जावान व्यक्ति को घर पर बेकार बैठना बुरा तो लगेगा ही।


घर पहुंची, तो जनाब पौधों की कटाई-छंटाई करने में व्यस्त थे। एक मोहक मुस्कान का आदान-प्रदान हुआ। मैं पर्स बाहर ही टेबल पर रखकर अंदर गई। दाल और सब्जी सुबह बनाकर जाती हूं। बस, रोटी बनानी थी। लेकिन रसोई का प्लेटफॉर्म सूखे आटे, चायपत्ती, चीनी, तवा, चकले और बेलन से बेतरतीब हुआ पड़ा था। जला हुआ तवा गवाही दे रहा था कि निर्ममता से उसका उपयोग हुआ है। रोटी वाले डिब्बे में जली हुई रोटियां रखी थीं। ओह! बाहर वाली मुस्कान का ये राज था, तब तक ये भी अंदर आकर हाथ धाते हुए बोले, ‘जल्दी खाना लगाओ, बहुत भूख लगी है।’ मैंने हंसते हुए पूछा, ‘क्या जरूरत थी परेशान होने की, मैं आकर रोटी तो बना ही लेती।’ उन्होंने कहा, ‘मैं भी तो बोर ही होता हूं। सोचा, चलो इतनी तो सहायता हो जाएगी तुम्हारी। देखना, जल्द ही अच्छी तरह रोटियां बनाने लगूंगा।’ एक-दूसरे की भावनाओं को इज्जत देती छोटी-छोटी बातों का यही प्रलेप पति-पत्नी के बीच प्रेम के रिश्ते को दृढ़ता प्रदान करता है। हमारे पैंतीस सालों के सुखद वैवाहिक जीवन का भी यही आधार है। खाने के बाद इन्होंने अपनी कुर्ते कीजेब से एक लिफाफा निकालकर मेरी तरफ बढ़ाया। मैंने लिफाफे पर नाम देखा रानी शर्मा। मेरी प्यारी ननद। लिफाफे से पत्र निकालते हुए मैंने पूछा, ‘क्या हालचाल हैं रानी के?’


‘मजे में है, खुद ही पढ़ लो।’ पत्र छोटा था, लेकिन आदर, स्नेह और सुख की ऊष्मा से ओत-प्रोत था। उसका काम चल नहीं दौड़ रहा था। दूसरे शहर में भी एक दुकान खोलने की बात सोच रही हैं। उसके पति और बच्चे भी ठीक हैं। अपने भैया के स्वास्थ्य की भी चिंता और भतीजे को बहुत दिनों से न देख पाने का अफसोस जताया था। बस! मन को खुश और संतुष्ट करने देने वाली बातें थीं पूरे पत्र में। मैं पत्र मोड़कर वापस लिफाफे में डाल रही थी और मेरा मन अतीत के झरोखे से रानी के विगत सात-आठ सालों पहले के उथल-पुथल वाले जीवन में झांकने लगा।

ठीक ऐसी ही एक दोपहर स्कूल से लौटने पर रानी की चिट्ठी मुझे बिछावन पर मिली थी। मेरे पूछने पर, ‘किसकी है?’

‘बुआ का है, वह खुश नहीं हैं।’ मेरे किशोर होते बेटे ने बस इतना ही कहा था।

अभी तो एक साल भी नहीं हुआ। अच्छा घर-बार देखकर शादी हुई है। इतनी जल्दी क्या आफत आ गई, मैं धड़कते दिल से पत्र पढ़ने लगी- ‘बहुत दिनों से पत्र लिखना चाह रही थी। नई-नई शादी के बाद सभी को उम्मीद रहती है कि पत्र प्रेम के रस से भीगा, उम्मीद से छलकता हुआ होगा। लेकिन मेरे मन का घट तो किसी भी सुखद अनुभूति से रीता ही नहीं है। फिर इस सूखे पात्र से क्या निकालती, क्या बांटती? यहां सब ठीक है। आप लोगों ने मेरी शादी जल्दी कर दी। कितना शौक था मुझे पढ़ने का। मैंने तो कभी दूल्हे का सपना भी नहीं देखा था कि बंध गई जंजीर में। बाबूजी को जमीदार घर मिला, मां को पढ़ा-लिखा दामाद, सास-ससुर को सुघड़-सुंदर बहू मिली, लेकिन मुझे क्या मिला किसी ने नहीं पूछा? बड़े घर की बहू हूं न। चौबीस कमरों की हवेली में हर काम के लिए अलग कामवाली है। लेकिन ये सब सिर्फ बाहरी दिखावा हैं। खेत बेचकर इस बार दिवाली में घर की पुताई हुई। पता नहीं, ऐसी पुताई से घर की लक्ष्मी आ रही है या जा रही है। भीतर ही भीतर बुराइयों से खोखले होते जा रहे इस खानदान की इज्जत को किसी तरह से ढकने का प्रयास किया जा रहा है। पूरे घर पर सासूजी का रौब चलता है। उनके सामने ससुरजी का व्यक्तित्व मानो बौना होकर रह गया है। जेब खर्च के लिए भी वे सासुजी के सामने वे जिस तरह गिड़गिड़ाते हैं, उसे देख पता नहीं क्यों मैं एक लिजलिजे अहसास से भर जाती हूं। आपके ननदोई पता नहीं किस कॉलेज में पढ़ाते हैं। पूरे दिन हवेली के मुख्य द्वार के बाहर दालान पर दोस्तों की महफिल सजी रहती है। लेकिन घर के अंदर लगता है सांस भी मां की आज्ञा से ही लेते हैं। यहां तक भी सब ठीक था, लेकिन एक दिन ये देर रात गए लड़खड़ाते हुए घर आए। न चाहते हुए भी गुस्से में मेरे मुंह से निकल गया, ‘शराब पीकर यहां क्यों आए हैं, मां की गोद में जाइए सोने।’ यह सुनते ही मेरी गर्दन दबाने लगे। ज्यादा चकर-चकर करोगी, तो काटकर यहीं गाड़ देंगे।’ मैं कांपने लगी थी। पांचों उंगलियों का निशान पड़ गया था गले पर, जिसे पता नहीं मैंने कितने दिनों तक आंचल से छिपाए रखा। बहुत दिनों से अंदर ही अंदर घुट रही थी। आज आपको सबकुछ लिखकर मन हल्का हो गया। मां-बाबूजी को यह सब नहीं बताइएगा। हमारी शादी के वक्त बाबूजी कितने खुश थे। अब बुढ़ापे में बेटी के दुख में क्यूं डूबें। सबको भ्रम में जीने दीजिए। नसीब में जो होता है, वही मिलता है। भैया को प्रणाम। बाबू को दुलार।’

रानी..

मैं लगातार रो रही थी। यह क्या हो गया? मुझे याद आ रही थी, वो दस-गयारह साल की रानी। मेरी शादी के वक्त उनकी यही उम्र थी। दौड़-दौड़कर मेरे लिए खाना लाना, पानी लाना। ठंड के दिन में मेरा हाथ थाली में ही धुलवा देती थी। ‘बाहर बहुत ठंड है, मत जाइए।’ और खुद बाहर जाकर थाली धो लेती थी। मैं उससे कहती, ‘तुम्हारे ससुराल जाने पर मैं ससुराल आना छोड़ दूंगी।’ वह मुस्कुराकर कहती, ‘खबर कर दीजिएगा, मैं दौड़ी चली आऊंगी।’


मुझे कोई बेटी नहीं थी। रानी की शादी के वक्त सास ने कहा, ‘सब खर्च तुम लोग ही कर रहे हो, तो कन्यादान भी तुम ही करो।’ दान करने के बाद तो उसे मैं ननद कम, बेटी ज्यादा मानने लगी थी। और आज उसी बेटी के दर्द से में आपा खोती जा रही थी। पति ग्रामीण परिवेश से परिचित थे। वह कहते, ‘ज्यादा परेशान होने से कुछ नहीं होगा, गांव में ऐसा ही होता है। धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।’
मैं तमक उठती, ‘धीरे-धीरे ठीक होने के लिए उन्हें धीरे-धीरे मरने दूं?’


मेरी एक सहेली की रिश्तेदार का सम्बंध महिला मंच से था। मैंने उन्हें सारी बात बताई। उन्होंने कहा, ‘मैं अपने संगठन की तरफ से कहूं, तो उसे आजादी, पैसा सब मिल जाएगा। लेकिन अगर स्त्री के तौर पर कहूं, तो उसे सुख नहीं मिल पाएगा। हमारे यहां बिगड़े हुए सामान तक को सुधारकर उपयोग में लाने की परम्परा रही है, फिर यह तो दो परिवारों के टूटने की बात है। कोई ऐसा रास्ता ढूंढिए, जिससे वह उसी घर में सुखी रहे।’


मैं अब कुछ शांत हो गई थी। लेकिन मंथन जारी था। अपने यहां बुलवाकर, कई तरह के कोर्स करवा उसे स्वालम्बी बना सकती थी, लेकिन जमींदार घर की बहू के लिए असम्भव था। रानी शादी से पहले अपने सारे सूट, मां के ब्लाउज वगैरह खुद सिलती थी। पुराने कपड़े के ऊपर नया कपड़ा लगाकर, ऊपर से सुंदर कढ़ाई कर उसने जो फलिए बनाए थे, उन्हीं पर सोकर मेरा बेटा बड़ा हुआ था। मैं जब उन फलियों को धोकर बाहर फैलाती, तो पड़ोसनें उनकी बहुत तारीफ करतीं।


कुछ निश्चय करते हुए तीन-चार दिन की छुट्टियों लेकर मैं गांव आ गई। मकर संक्रांत का समय था। रानी के ससुराल भेजने के लिए चिवड़ा, तिलकुट, कपड़े आदि तैयार थे। उन्हीं समानों से साथ मैंने रानी को होली तक मायके आने का एक अनुरोधभरा पत्र अपने ससुर से लिखवाकर पहुंचा दिया। ससुराल से स्वीकृति मिलते ही रानी को मायके बुलवा लिया। छोटे भाई से बारहवीं का फॉर्म चुपके से मंगवाकर, वह पहले ही भर चुकी थी। मैंने उससे कहा, ‘अब परीक्षा देकर ही जाना।’ डबल बेड-सिंगल बेड की चादरों, कुशन आदि के लिए बाजार से अलग-अलग रंगों में केसमेंट का कपड़ा कटवाकर मैंने घर में रखवा दिया। उससे कहा, ‘ससुराल में खाली समय में इन कपड़ों पर वहीं फलिए वाली कढ़ाई कीजिएगा। जब दो-तीन बन जाएंगे, तब मेरे पास भेज दीजिएगा।’


तय प्रोग्राम के मुताबिक रानी परीक्षा देकर ससुराल चली गई। एक महीने बाद ही देवर रानी की ससुराल से एक डबल बेड, दो सिंगल बेड की चादरें और दो-तीन कुशन कवर का सेट लेकर मेरे पास आ गए और मैं उन्हें स्कूल ले गई। वहां स्टाफ रूम में मैंने जैसे ही चादर खोली, सब उसकी कढ़ाई देखकर भौंचक्के रह गए। मैंने लागत से डेढ़-दो सौ रुपए ज्यादा में उन्हें बेच दिया। लगे हाथ आठ-दस ऑर्डर भी मिल गए। देवर पैसे और ऑर्डर लेकर चले गए।


अपनी मेहनत के पैसे हाथ में आते ही रानी में भी जोश आया। एक-दो महीने बाद देवर फिर हाजिर थे। प्रचार की अब कोई आवश्यकता ही नहीं थी। मेरे स्टाफ, मेरी छात्राओं की माताएं, उनकी पड़ोसिनें, मेरे सम्बंधी सभी प्रभावित थे। घर बैठे-बैठे ऑर्डर मिलते। पैसे मिलने से ससुराल में भी रानी की इजात बढ़ गई। सास और पति बाजार से सामान लाकर देते। ऑर्डर बहुत ज्यादा मिलने के कारण वह गांव की एक-दो लड़कियों से कढ़ाई करवाने लगी। रानी अपनी सास के दहेज में आई चादरों के डिजाइन ढूंढती, तो कभी गांव जाकर पुरानी डिजायंस को इकट्ठा करती। उसकी हर चादर में अलग डिजायन होती और रंगों का चुनाव भी उत्तम रहता। लोग अपनी पसंद का डिजायन चुनकर ऑर्डर करते। उसके पति का दिमाग भी खुलने लगा था। वह दूसरे शहर में जाकर भी दुकानदारों से सम्पर्क करते, वहां से भी ऑर्डर लेकर आते। अब तो रानी इतनी व्यस्त थी कि उससे मिल पाना भी असम्भव-सा हो गया था।


दो साल हो गए थे। उस बार दुर्गा पूजा की छुट्टियों में उसे ख़बर देकर बुलवाया था। गर्भ के बार से हल्के स्थूल हुए शरीर और आत्मविश्वास भरे कदमों से जब वह आंगन में दाखिल हुई, तो मैं उसे देखती रह गई। रोकती तब तक वह दौड़कर मेरे सीने से लग गईं। मैंने ऐसी अवस्था में दौड़ने के लिए उसे मीठी डांट पिला दी। फिर उसे निहारते हुए कहा, ‘मां कहती थी न, ‘नाम भी रानी है, जा भी रही है राजा के घर, राज करेगी।’’


उसने मुस्कुराकर कहा, ‘नहीं भाभी, वहां रानी तो दुखों के भार से दबकर हवेली में कब की दफन हो गई होती, अगर अवसाद के उन दिनो में आपने उसे खींचकर, उसके अंदर छिपे गुणों को उभारकर, निखारने का प्रयास नहीं किया होता।’


मैं मन में सोच रही थी, घने जंगल में खड़े सैकड़ों दरख्त तो, सबको सहारा देने के लिए हमेशा खड़े रहते हैं। लेकिन वहीं कोमल लताएं उनका सहारा पाकर, ऊपर तक पहुंचती हैं और सूर्य का प्रकाश पाती हैं, जिसमें अपने आसपास की झाड़ियों को दबाकर ऊपर बढ़ने की क्षमता होती है और जिसकी जड़ें मजबूत होती हैं, उसे विज्ञान की भाषा में ‘स्ट्रगल फॉर एक्जिस्टेंस’ कहते हैं। इस लड़ाई में रानी कामयाब हुईं और लगातार बढ़ती जा रही है, सफलता की ऊंचाइयों पर..।
 
 
 
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