अपनों के बीच छोटी-बड़ी बातों को लेकर तकरार होना आम है। पति-पत्नी, ननद-भाभी, भाई-बहन, सास-बहू सभी में कभी न कभी नोंकझोंक होती है। कई बार वजह होती तो छोटी है, लेकिन दोनों पक्षों से होने वाले शाब्दिक प्रहार इसमें अन्य मुद्दों को शामिल कर देते हैं और बात बढ़ जाती है। ये स्थितियां आग में घी डालने का काम करती हैं और रिश्ते स्वाहा होने की कगार पर आ जाते हैं। आइए, इन स्थितियों को विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं-
नजरिया अपना-अपना
परिवार में कई सदस्य साथ रहते हैं। सभी के तौर-तरीकों, आदतों, विचारों में फर्क होता है। ऐसे में जब दो सदस्यों में सामंजस्य नहीं हो पाता, तो वैचारिक मतभेद की स्थिति बनने लगती है। विचारों का यही अंतर आपसी झगड़े की जड़ बनता है। हर रिश्ते में इस तरह की नोंकझोंक आम है, लेकिन जब छोटा-सी तकरार वाकयुद्ध का रूप लेकर अशांति उत्पन्न करती है, तो स्थितियां लगातार बिगड़ती जाती हैं।
बात सम्भलेगी ऐसे..
तकरार छोटी हो और दोनों पक्ष थोड़ी देर बाद मन शांत होने पर खुद को टटोलकर अपनी-अपनी गलतियां मान लें और बात को खत्म करने की पहल करें, तो बात सम्भल सकती हैं। ये आपसी तकरार परस्पर रिश्तों में दीवार न बनाए, इसके लिए कुछ अन्य बातों का भी ख्याल रखना होगा, जैसे-
शब्दों और रिश्तों की मर्यादा- गुस्से में हम अपनों को कड़वी बातें कह जाते हैं, जो उनके मन को आहत कर देती हैं। मर्म गहरा हो, तो ये बातें झगड़ा खत्म होने के बाद भी अपना असर छोड़ जाती हैं। नतीजतन, रिश्तों में गांठ पड़ जाती है। इसलिए आपसी तकरार के दौरान शब्दों और रिश्तों दोनों ही सीमाओं का ख्याल रखना बेहद जरूरी है।
ये अहम है- मैं तो ऐसा/ऐसी ही हूं। मुझसे बदलने की उम्मीद मत करो। जैसे वाक्य हमारी तटस्थता जाहिर कर देते हैं। इससे समस्या हल होने के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं। रिश्तों को जोड़कर रखना चाहते हैं, तो अपनी गलतियों को स्वीकारना और उन्हें न दोहराने की कोशिश करना सीखना होगा।
आज के बाद मैं- झगड़े के दौरान आवेश में आकर हम अक्सर ऐसी घोषणाएं कर जाते हैं, जिन पर अमल करना काफी मुश्किल होता है। ऐसी घोषणाओं से बचना ही उचित है। इसलिए आवेश के दौरान सोच-विचार कर बोलना ही उचित होता है।
सही वक्त का चुनाव- विवाद की शुरुआत करने वाला अधिक आवेश में होता है, क्योंकि वह मानसिक रूप से विवाद के लिए तैयार रहता है। ऐसे में दूसरे पक्ष को बराबरी से प्रयुत्तर देने के बजाय शांति से काम लेना चाहिए। इसलिए पहले सामने वाले को शांत करने का प्रयास करें, फिर उससे बात कर समस्या को सुलझाएं।
मुद्दे की बात- प्राय: छोटी-सी बात पर हुई अनबन के दौरान हम कई पुराने किस्से और शिकायतें जोड़ने की गलती करते हैं। इससे समस्या बढ़ जाती है। इसलिए विवाद के दौरान पुराने मुद्दों से जुड़ी शिकायतों को दोहराने के बजाय वर्तमान समस्या का ही जिक्र करें। यदि दूसरे पक्ष से आपको पहले से ही कोई शिकायतें हैं भी, तो बाद में शांत मन से उन पर विचार-विमर्श करना ही सही होगा।
अहं को दरकिनार करें- तकरार के दौरान अपने अहं के चलते, हम सामने वाले को समझने की कोशिश ही नहीं करते और इस कारण उसके हर तर्क को सिरे से नकार देते हैं। ये संवाद का तरीका नहीं है और संवाद के बिना किसी भी समस्या को सुलझा पाना नामुमकिन है। इसलिए दूसरे पक्ष की बातों को न सिर्फ सुनें, बल्कि उन्हें समझने की कोशिश भी करें। यदि आपको अहसास हो कि गलती आपकी भी है, तो अपने अहं को त्यागकर सामने वाले से माफी मांगे।
माफ कौन करेगा?- अक्सर झगड़े के दौरान किए गए गलत बर्ताव के लिए हम खुद को यह कहकर माफ कर देते हैं कि हमारा स्वभाव ही ऐसा है। ऐसा करने से पहले ध्यान रखें कि आपके बर्ताव से सामने वाले का मन आहत हुआ है, इसलिए माफ करने या न करने का एकमात्र अधिकार उसके पास है। इसलिए स्वयं को माफ करने के बजाय उससे माफी मांगे। आपके ये बोल मरहम का काम करेंगे और आप दोनों के बीच की कड़वाहट कम हो जाएगी।
तीसरे पक्ष की भूमिका
विवाद करने वाले दोनों पक्ष स्वयं को सही साबित करने में जुट जाते हैं। अंदर छिपा अहं उन्हें झुकने नहीं देता। ऐसे में जब कोई अपनी गलती मानने को ही तैयार न हो, तो बात को खत्म करने की पहल भी नहीं होती। एक-दूसरे पर दोषारोपण के चलते स्थितियां गम्भीर रुख लेती जाती हैं। इस स्थिति में परिवार के अन्य सदस्यों की अहम भूमिका होती है।
यदि परिवार के बड़े-बुज़ुर्ग विवाद के बढ़ने से पहले दोनों पक्षों को शांत कर दें, तो बात Êयादा बिगड़ेगी नहीं। इसी तरह बड़ों की तकरार को शांत करने में समझदार हो चुके बच्चे भी अहम भूमिका निभा सकते हैं। शांत होने पर जब दोनों पक्षों को अपनी-अपनी गलती का अहसास होगा, तो वे भी माफी मांगने व सुलह करने की पहल करेंगे हैं और स्थितियां सम्भल जाएंगी।