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मुझे मेरा हिस्सा दो

 
Source: अर्चना नेमा   |   Last Updated 11:24(10/08/11)
 
 
 
 
भागते शहर की बेतरतीब जिंदगी से दूर नीली बैगनी क्षितिज रेखा के उस पार एक गांव बसा था। यह गांव अपने नाम से उतना प्रसिद्ध नहीं था, जितना इसके एक छोर पर बने खंडित शिवाले के कारण। न सिर्फ इस गांव के लोग बल्कि आसपास के दस गांवों में खंडित शिवाले को लोग बरम बाबा (ब्रह्मा बाबा) के नाम से पुकारते थे। गांव के बूढ़े बरगद की निचली कोटर में बना किसी अनजाने अनचीन्हे भक्त की श्रद्धा का प्रतीक यह शिवाला आज भी अपने पुराने वैभव की गाथा कहता है। पुराने शिवाले के गोल-गोल पत्थरों के कोनों में बने छोटे-छोटे छिद्रों में ज्ञानी काकी अगरबत्ती खोंस अपने पोपले मुंह से बरम बाबा के कान में कई मनौतियां बुदबुदाती हैं। इन्हीं बरम बाबा के इर्द-गिर्द हजारों कहानियों के ताने-बाने ठीक वैसे ही बुने हैं, जैसे बरम बाबा के पड़ोसी बूढ़े बरगद पर ढेरों मनौतियों के रंग-बिरंगे धागे।

सांझ होते ही बरम बाबा के चबूतरे पर गांव के बूढ़े-सयानों की टोली की आमद का शोर दूर से ही पहचाना जा सकता था। और फिर इस चबूतरे पर बड़े-बुजुर्गों के साझे दुखों-सुखों के ढेर सारे रंग बिखरने लगते। किसी बुजुर्गो के पास गई रात तरकारी के नोन मसाले की झिड़की होती, तो कोई अपने जने कपूत के लुगाई के बस में होने की दुहाई देता।

बरम बाबा को घेरे बूढ़े बरगद की मोटी पतली शाखों के कोटरों में ढेरों नन्हे-नन्हे घर बसे थे और घरों में रहने वाले मेजबानों से दोस्ती थी, इसी गांव के छोटे-छोटे बच्चों की। यह बच्चे बरम बाबा के चबूतरे पर इकट्ठा हो कभी राजा-प्रजा का स्वांग रचते, तो कभी चबूतरों से सटी पगडंडी पर पुरानी सायकिल के टायर को टहनी से धकियाते पसीने से तरबतर इधर से उधर धमा-चौकड़ी करते। बरम बाबा के संरक्षण में बसा यह चबूतरा कभी इस नन्ही मित्र मंडली का सभागृह बन जाता, तो कभी किसी शरारत पर मिली सजा से बचने का एक खुफिया अड्डा।

इन्हीं बच्चों में से दो थे, पुनिया और मुन्नू। पुनिया और मुन्नू थे तो सगे भाई-बहन, लेकिन ईश्वर ने खाका ढालते समय एक भी चिन्ह इनके सगे होने का नहीं ढाला था। मुन्नू की रंगत जहां सांवले बादल-सी सलोनी थी, पुनिया वहीं रुई-सी गोरी चिट्टी। मुन्नू के नैन-नक्श चौराहे की दुर्गा मूर्ति से तीखे थे, वहीं पुनिया के भरे चेहरे पर चपटी नाक किंचित ही शोभा पाती थी। नीग्रो से घुंघराले बालों की लटें, जहां मुन्नू की लुनाई कई गुना बढ़ा देती थीं, वही पुनिया के भूरे बेजान बालों को मां कस्सी चोटी गूंथते समय खूब गरियाती। कुछ भी हो, दोनों बच्चे थे अलमस्त, पच्छम के टीले से आती मदमस्त पवन से। मंगल को दोनों की खुशी, ज्वार-सी उफनती थी। कारण होता था, दोनों को मिलने वाले एक-एक के सिक्के। इस एक के सिक्के में दोनों की दुनिया बसती थी। कभी इसमें दर्जन भर केले आ जाते, तो कभी एक खट्टी-मीठी गटागट की गोलियों की पुड़िया।

आज फिर मंगलवार था, दोनों की मौज-मस्ती से भरी खुशियों का दिन। जैसे ही सुबह हुई पिता ने जाने से पहले दोनों की हथेलियों पर एक-एक सिक्के का आसमान रख दिया। चेहरे पर खुशी आंखों की कोरों तक फैल गई। फिर योजनाओं के दौर शुरू हुए। मुन्नू ने बुड्ढी के बाल की योजना बनाई, तो पुनिया ने गटागट या जीराव्टी की बात सामने रखी। मुन्नू ने गुलाब-लच्छे पर पुनिया को मनाने की कोशिश की, तो पुनिया का मन खट्टे-तीखे जलजीरे के लिए मचल उठा। कई सारे प्रस्तावों, सहमति-असहमतियों के बाद एक बात सामने आई कि क्यों न आज जीभ की दरकार को तिलांजली देकर नियाज सायकिल मार्ट से गुलाबी भोंपू वाली सायकिल किराए पर ली जाए। ये ऐसा इकलौता विचार था, जिस पर साझी सहमति बन पाई। और फिर नियाज चाचा से दो घंटे के लिए गुलाबी-नीली गोल-गोल घूमती झालर वाली सायकिल किराए पर ली गई। फिर क्या था? पुनिया और मुन्नू के जैसे पंख निकल आए, कभी मुन्नू सीट पर, तो पुनिया डंडे पर। कभी पुनिया सीट पर, तो मुन्नू पीछे स्टैंड पर। तेज-तेज पैडल मारते, हवा से बतियाती उनकी सायकिल गांव की पगडंडी, मेड़, खेत सबसे सन्न से निकलती और उनकी किलकारियां उड़ते पंछियों की चहचहाहट से मिश्रित हो अनुपम संगीत का निर्माण करती रहीं। पंछियों की तरह उड़ते दो घंटे कब हवा हुए पता नहीं चला। देखते-देखते सांझ घिर आई कि अचानक सायकिल की चेन उतर गई। दोनों बच्चे सन्न रह गए, ‘अरे बाप रे! सायकिल को यह क्या हो गया? ये तो टूट गई, नियाज चाचा को क्या कहेगें?’ ‘नियाज चाचा तो अब नई सायकिल के पैसे मांगेगे। पापा के पास तो इतने पैसे भी नहीं है कि नई सायकिल खरीदी जा सके।’ अब तो दोनों को टूटी सायकिल और अपनी मरम्मत का डर सताने लगा। सांझ गहराने लगी और पुनिया और मुन्नू हारे सिपाही की तरह धीरे-धीरे नियाज सायकिल मार्ट की तरफ बढ़ने लगे। रास्ते में संवादहीनता की नीरवता पसरी थी। दोनों के हृदय धड़क रहे थे। मन में शंका-कुशंकाओं के डर जारी थे कि इतने में सायकिल की दुकान दिखाई दी। दोनों ने आपस में योजना बनाई कि जल्दी से दुकान में सायकिल टिका के दौड़ लगा देंगे और किया भी ऐसा। नियाज चाचा की हथेली पर अपना-अपना सिक्का थमा दोनों ने ऐसी दौड़ लगाई कि नियाज चाचा के कुछ भी न कहने पर भी उनकी ढेर-सी काल्पनिक आवाजें दोनों का घर तक पीछा करती रहीं और फिर घर आकर दोनों ने चैन की सांस लेते हुए इशारे-इशारे में एक-दूसरे को सांत्वना दी। इन जैसी ढेरों बचकानी घटनाओं के बीच बढ़ते रहे वे दोनों।

समय रबी-खरीफ सी फसल-सा खेतो में कटता रहा। बचपन की मीठी-मीठी शरारतें अब यौवन के गाम्भीर्य में सिमटने लगीं। भाई-बहन होने के बावजूद दोनों में एक स्वाभाविक दूरी आने लगी। लेकिन मन से, विचारों से, आपसी समझ से दोनों एक दूसरे के पास ही थे। फर्क इतना था कि बचपन के बचकाने खेल अब ख़त्म होकर गम्भीर विषयों के विचार-विश्लेषण में बदल चुके थे। बचपन की मीठी-मीठी टॉफियां और गुब्बारे के लिए किया झगड़ा, अब किसी विचार-वैभिन्य की बहस में परिवर्तित हो गया था। जैसे सबके होते हैं, उचित समय पर दोनों के विवाह भी हो गए और जीवन की व्यस्तता ने दोनों के बीच कभी नोक-झोंक, तो कभी संवादहीनता की दूरी घोल दी। दोनों के अपने परिवार व जिम्मेदारियां थीं, प्राथमिकताएं भी बदल गईं थीं, वैवाहिक रिश्तों का भी दबाव था। दोनों भाई-बहन के रिश्ते में घुली कसक धीरे-धीरे अकारण ही रिश्ते धुंधले करती चली गई। आपसी गर्मजोशी मंद पड़ने लगी। कारण बहुत महत्वपूर्ण नहीं थे, लेकिन परिणाम निराशाजनक थे। दोनों के अंदर तिल-तिल कुछ सुलगता था, तो कुछ सुलगाया जाता था। रिश्तों का सिरा कही खो गया था, उस सिरे को अपनेपन की गांठ की तलाश थी। अतीत की आंखों में तैरता साझा बचपन दोनों की प्राथमिक स्मृति में ताजा था। लेकिन कहीं कुछ ऐसा नहीं था, जो दोनों को इकट्ठा करके साथ खड़ा कर देता। रिश्तों की इन छोटी-छोटी धूप-छाही कणिकाओं को समेट दिन कभी सरपट भागते, तो कभी मंथर गति में आगे बढ़ते रहते।

..और निरंतर बीतते इन्हीं दिनों में एक दिन ऐसा आया, जिसने भाई-बहन के रिश्ते को दमकता जगमगाता उजाले से परिपूर कर दिया। बात शुरू हुई एक फोन कॉल से, कारण था पुनिया अर्थात पार्वती को मुन्नू अर्थात माणिक से अपनी ननद के एमबीए पाठ्यक्रम के लिए मार्गदर्शन लेना। पुनिया ने फोन पर साधारण हालचाल की औपचारिक पूछताछ के बाद, जब प्रवेश सम्बंधी जानकारी का जिक्र किया, तो मुन्नू की कटाक्षपूर्ण वार्ता आरम्भ हो गई। मुन्नू ने पुनिया के काम पड़ने पर ही बात करने का ताना मारा। पुनिया बचपन से ही मुन्नू से लड़ने की अभ्यस्त थी। जब मुन्नू ने कहा, ‘अच्छा! तो तुम्हारे फोन करने का यह कारण था, वही मैं कहूं कि आज अचानक से मेरी याद कैसे आ गई।’

पुनिया बोली, ‘तुम भी बात को कहां से कहां ले जाते हो, एक सीधी-सी बात का इतना टेढ़ा जवाब तुमसे बेहतर कोई नहीं दे सकता।’ मुन्नू बोला, ‘टेढ़ा जवाब? ये टेढ़ा जवाब तुम्हें उस समय याद नहीं आया, जब तुम्हारा ऑपरेशन हुआ था और मैं तुम्हें इस डॉक्टर से उस डॉक्टर के पास लिए-लिए घूमा था।’ पुनिया बोली, ‘कितने बुरे हो तुम, तुमने जो भी किया अपनी बहन के लिए किया। क्या मैंने तुम्हारे लिए कुछ नहीं किया? मेरे लिखे नाटक को अपना बताकर कॉलेज में खूब वाह-वाही लूटी थी और नाटक लेखक व डायरेक्टर बनकर कितनी ही लड़कियों को तुमने अपने पीछे घुमाया था भूल गए!’ यह सुनकर मुन्नू के होंठों पर मुस्कुराहट तैर गई, लेकिन यह युद्ध अभी बंद होने वाला कहां था। मुन्नू बोला, ‘और वो तुम्हारे ससुराल में ‘जी मम्मी जी-जी पापाजी’ कहकर जबर्दस्ती मुस्कुरा के, जो सबके पैर पड़ता हूं, वो कुछ नहीं!’ पुनिया बोली, ‘मेरे सास-ससुर के पैर पड़ते हो तो क्या? भाई हो मेरे! बहन का ससुराल में मान नहीं रखोगे?

मुन्नू गम्भीरता से बोला, ‘बहन का मान? मान रखने की बात करती हो! क्या तुम जानती नहीं हो, तुम्हारा मान क्या मायने रखता है मेरे जीवन में, तुम क्या मायने रखती हो मेरे लिए। तुम्हारी शादी के बाद हमारे रिश्ते में बिखराव पैदा हुआ। इस बिखराव के कारण जो भी रहे हों, लेकिन यह मानने में भी मुझे संकोच नहीं कि भविष्य में फिर जो भी हुआ, उसने बिखराव को और मÊाबूत किया। मैं यह नहीं कहता कि कमियां मेरी तरफ से नहीं थीं, लेकिन क्या तुमने सोचा कि तुमने हमारे रिश्ते को जरूरत से ज्यादा पुख्ता मानकर इस रिश्ते को पोसना बंद कर दिया। इस संसार में हर जीव-निर्जीव चीज पोषण मांगती है, फिर चाहे वो एक नन्हा पौधा हो या फिर एक मजबूत रिश्ता। तुम्हें इस रिश्ते के न टूटने का इतना ज्यादा विश्वास कर लिया कि मेरा व्यक्तित्व तुम्हारे मन के हर कोने से विलुप्त हो गया। मुझे या मेरी किसी भी बात को समय न देने की लापरवाही ने हमारे रिश्ते को सतही तौर पर कमजोर कर दिया। हम जानते थे और आज भी जानते हंै कि हम हमेशा एक दूसरे के लिए सहारा बनकर खड़े हैं, लेकिन क्या इस एहसास के नवीनीकरण की आवश्यकता नहीं है? तुम्हारे पास सबके लिए समय है, पति और बच्चे के लिए, माता-पिता के लिए, ससुराल के लिए, यहां तक के मेरे बीवी बच्चों के लिए तक तुम्हारे पास समय है। उनके लिए लाड़ है, दुलार है, लेकिन मेरे लिए? मेरे लिए क्या है तुम्हारे पास? तुम्हारी इन व्यस्तताओं में तुम्हारे भाई का हिस्सा कहां है पुनिया?’

पुनिया सन्नू रह गई। मुन्नू सच कह रहा था। वो मुन्नू के रिश्ते को लेकर इतनी आश्वस्त, इतनी विश्वस्त थी कि उसने कभी भी मुन्नू के रिश्ते की तरफ ध्यान नहीं दिया और उसके परिणाम में आज मुन्नू उससे ही उसका हिस्सा मांग रहा था। पुनिया जड़ हो गई। उसे याद आया कि यह सच ही कहा गया है कि औरत बीवी, मां, बेटी, बहू, भाभी, ननद सबकुछ है लेकिन इन सब से अलग एक बहन भी तो है। वो तो व्यस्तताओं के चलते इस रिश्ते को विस्मृत करने लगी थी।

रातभर विचार प्रक्रिया मष्तिष्क को मथती रही और सुबह का परिणाम बिलकुल सुबह जैसा ही स्वच्छ, स्निग्ध, रंगों से भरा था। पुनिया फोन पर अपने भाई का नम्बर मिलाने लगी, उसे उसका हिस्सा और उसकी बहन वापस करने।
 
 
 
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