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अच्छे लोग!

 
Source: डॉ दीपक पंचोली   |   Last Updated 00:06(17/08/11)
 
 
 
 
चूल्हे पर आखिरी रोटी सिकने वाली थी। लकड़ी के कोयले लाल सुर्ख जल रहे थे। ‘बापू ये आग कितनी सुंदर लगती है।’ तवा उतारते हुए नन्ही इलिया बोली, ‘लेकिन बापू यह आग दूर से ही सुहानी लगती है, काबू से बाहर होते ही अनहोनी कर जाती है।’ बापू ने गौर से इलिया को देखा, फिर सोचा ‘कहीं ये आग और मेरी तुलना तो नहीं कर रही।’ वो भी जब शराब पीकर बेकाबू होता है, तो घरवालों की शामत आ जाती है।

‘तू ज्यादा भाषण मत झाड़, रोटी बनाकर छोटू को सम्भाल।’ थाली में हाथ धोकर वहीं कोने में थाली सरकाते हुए बापू बोले, ‘और ये बनवारी क्या सारा दिन खेलता रहेगा, उसे भी बुला ले।’ आदेश पर आदेश सुन इलिया कुछ घबराई। दुबली-पतली सांवली-सी दस साल की इलिया के चेहरे पर तेज़ी से भाव परिवर्तन हो रहे थे। गुस्सैल बापू से इलिया तो क्या उसकी मां भी घबराती थीं। चूल्हे के आसापास सफाई के दौरान उसका आधा ध्यान बापू पर, तो आधा काम पर था। बापू तीन साल के छोटू को प्यार से सहला रहे थे, जो अभी-अभी नींद से उठा था। सही मौका देखकर इलिया बापू के पास गई। ‘बापू आज मंगलवार है।’ ‘तो.. क्या हुआ?’ छोटू के बालों को सहलाते हुए बापू ने जवाबी प्रश्न किया। ‘खाना मैंने बना दिया, बर्तन मां धो देंगी, आप कहें तो मैं हनुमान जी के मंदिर चली जाऊं?’ सहमी हुई इलिया बोली।

‘बकरियों को बाड़े में बांधकर पानी पिलाया या नहीं?’ बापू बोले। इलिया ने जवाब भी तुरंत ही ‘हां’ में दिया। कुछ देर चुप्पी छाई रही फिर अचानक बापू बोले, ‘ठीक है चली जा, पर साथ में छोटू को भी ले जा। तेरी मां पता नहीं कब आए, मैं इतनी देर इसका ध्यान नहीं रख सकता।’ बापू की हामी की देर थी, इलिया ने छोटू को झट से गोद में उठाया और निकल गई। ‘ओ चम्पा, हनुमान जी के मंदिर नहीं चलना क्या? आज मंगलवार है।’ पास ही के घर में अपनी सहेली को पुकारती हुई इलिया बोली। ‘बस एक थाली मांजकर आती हूं।’ अंदर से आवाज़ आई। छोटू को इंतज़ार मंज़ूर न था, वो रोने लगा। इलिया ने कहा, ‘मेरा छोटू भईया, आज तो मावे का प्रसाद खाएगा। चम्पा को भी ले चलेंगे, तो हमें ज्यादा प्रसाद मिलेगा।’ ये बात छोटू को समझ में आ गई। यदि थोड़ी देर रुकने से ज्यादा प्रसाद मिलेगा, तो क्या हर्ज़ है।

अगले पांच मिनट बाद चम्पा, छोटू और इलिया मंदिर पहुंच चुके थे। मंदिर एक विशाल चबूतरे पर था। चबूतरे के चारों ओर काफी खुला हरा-भरा मैदान था। ‘चम्पा, जल्दी चल.. लोग मंदिर आने लगे हैं।’ इलिया के स्वर में अजीब उत्साह था। कुछ बच्चे मैदान में दौड़-भाग रहे थे। उनके बीच में से निकलते हुए इलिया और चम्पा अपनी खुशी रोक नहीं पा रही थीं। ‘हे बजरंगबली, आज हमें आप पिछले मंगलवार से ज्यादा प्रसाद दिलवाना।’ मूर्ति के सामने वाले दरवाज़े पर टंगी घंटियों को बजाते हुए इलिया बोली। ‘बजरंगबली मुझे तो मावे का प्रसाद ही दिलवाना..’, नन्हे हाथों को जोड़ते हुए छोटू बोला। उधर चम्पा काफी देर मूर्ति के सामने माथा टिकाए रही। उसकी भक्ति एक प्रौढ़ ने तोड़ी, ‘ए लड़की हट, मुझे दीपक जलाने दे।’ चम्पा ने उसकी तरफ देखा, उसके हाथ में कटोरी थी, जिसमें थोड़ा घी और बाती थी। चम्पा ने हनुमान जी को हाथ जोड़े और चबूतरे पर बैठी इलिया के पास चली गई। वह व्यक्ति अब चम्पा की जगह पर सिर झुकाए प्रणाम कर रहा था।

‘देख कैसा आदमी है, बजरंगबली का आशीर्वाद लेने आया है और प्रसाद भी नहीं लाया, खाली दीपक जला रहा है।’ इलिया के स्वर में आक्रोश था। ‘जीजी-जीजी मावा कब मिलेगा?’ छोटू को शायद ज्यादा जल्दी थी इसलिए उसने इलिया से पूछा, लेकिन इसका जवाब उसके पास नहीं था। दोनों ने छोटू का ध्यान मैदान में खेल रहे बच्चों की ओर लगा दिया। छोटू भी मैदान में बच्चों के साथ उछल-कूद करने लगा। इलिया ने उसे आश्वस्त कर दिया कि वो उसके लिए ढेर सारा प्रसाद इकट्ठा कर लेगी।

‘चम्पा देख, वो जो आदमी आ रहा है। उसके पास थैली है, उसमें ज़रूर प्रसाद होगा।’ इलिया ने चम्पा से कहा। दोनों मूर्ति के थोड़ा नज़दीक खड़ी हो गईं। भक्त ने पहले अगरबत्ती जलाई, माथा टेका फिर थैली मूर्ति के सामने रख प्रार्थना करने लगा। इलिया, चम्पा उसकी प्रार्थना खत्म होने का इंतजार कर रही थीं। अगले ही पल व्यक्ति ने थैली में से मिठाई का एक टुकड़ा मूर्ति के चरणों में रखा और चलने लगा। यह देख इलिया तुरंत उस आदमी के पास भागी, ‘अंकल जी, प्रसाद खिलाओ न।’ अपने बाएं हाथ को दाएं के नीचे रख इलिया बोली। एक पल के लिए आदमी ने कुछ सोचा फिर थैली में हाथ डाला। एक बड़ा-सा टुकड़ा मिठाई का हाथ में आया। उसका आधा भाग कर उसने इलिया को दे दिया। इलिया के चेहरे पर खुशी उभर आई, चम्पा भी तुरंत उस आदमी के सामने हाथ फैलाए खड़ी हो गई। आदमी ने बेरुखी से कहा, ‘तेरी सहेली को दे दिया, उससे ले लेना।’ चम्पा हताश होकर आदमी को देखती रही फिर इलिया से बोली, ‘ये बजरंगबली भी कैसे कंजूसों को अपना भक्त बनाते हैं। ला थोड़ा प्रसाद मुझे चखा।’ चम्पा ने अधिकार पूर्वक कहा। इलिया ने न चाहते हुए भी उसे थोड़ा हिस्सा दिया। ‘सुन इलिया, ये प्रसाद तो हम खा लेते हैं, लेकिन अब जो प्रसाद मिलेगा उसे इकट्ठा करेंगे और आखिर में खाएंगे, ताकि एक साथ ज्यादा खाने को मिले।’ प्रसाद को मुंह में रखती इलिया भी तैयार हो गई। छोटू को प्रसाद देना वो भूल गई, वो भी खेलने में मशगूल था। अगले दो भक्तों से इलिया और चम्पा को अलग-अलग प्रसाद मिला। दोनों की हनुमान जी के प्रति शिकायत कम हुई। तभी चार लड़के, जो उनकी ही उम्र के थे, मंदिर में आए। ‘देख आ गए शैतान, ये भैरू और इसके दोस्तों ने पिछली बार भी हमारा प्रसाद छीन लिया था।’ लड़कों की तरफ हेय दृष्टि से देखते हुए इलिया बोली। ‘और इनके आने से प्रसाद देने वाले भी हमें प्रसाद कम देंगे, ये हमारे हिस्से का बंटवारा जो करा देते हैं।’ चम्पा बोली। चारों लड़कों के मंदिर की घंटी बजाई और प्रसाद के इंतज़ार में चबूतरे पर बैठ गए। इलिया थोड़ी-थोड़ी देर में छोटू पर नज़र डाल लेती और उसे खेलता देख निश्चिंत हो जाती। भक्तों की संख्या अब बढ़ने लगी थी। एक सुंदर-सा फ्रॉक पहने इलिया की उम्र की लड़की अपने पिता के साथ मूर्ति के सामने खड़ी थी। ‘देख चम्पा, कितनी सुंदर फ्रॉक पहनी है उसने।’ इलिया ने धीमे से कहा, लेकिन लड़की के कानों तक उसकी तारीफ पहुंच गई थी। लड़की के चेहरे पर गर्वानुभूति उभर आई। जाते-जाते लड़की ने पिता से विशेष सिफारिश कर इलिया और चम्पा को उम्मीद से ज्यादा प्रसाद दिलवाया।

‘काश! मैं भी उसकी तरह होती।’ चम्पा ने गहरी सांस लेते हुए कहा। कुछ देर चुप्पी छाई रही फिर इलिया चुप्पी तोड़ते हुए बोली, ‘हां, अगर हम उसके जितने पैसे वाले होते, तो रोज़ मिठाई खाते।’ बोलते-बोलते इलिया का चेहरा गुलाब-सा खिल गया, एक पल के लिए मानो वो सुंदर फ्रॉक वाली लड़की बन गई। ‘हां फिर हमें बकरियां नहीं चरानी पड़तीं, हम भी पढ़ने जा सकते।’ चम्पा ने अगली कल्पना ज़ाहिर की। उनके खयाली पुलाव को भैरू ने आकर भंग किया, ‘ए लड़कियों अब पहले प्रसाद हम लेंगे, तुम बाद में मांगना। नहीं तो हम तुम्हारा सारा प्रसाद छीन लेंगे।’ फिल्मी खलनायक की तरह भैरू बोला।

दोनों लड़कियां सहम गईं। दोनों ने हथियार डालने की मुद्रा अपनाते हुए चबूतरे का कोना पकड़ लिया। ‘ये लड़के कितना रौब गांठते हैं!!’ चम्पा के स्वर में गुस्सा था, इलिया की कोई प्रतिक्रिया न देखकर चम्पा बोली, ‘सभी आदमी ऐसे ही होते हैं। तेरे बापू हो या मेरे बापू। हमारी मांएं मज़दूरी भी करती हैं और उनकी मार भी खाती हैं।’ इलिया को अचानक कुछ याद आया और वो तुरंत बोली, ‘सारे आदमी ऐसे नहीं होते। एक है, जो बहुत प्यारा है।’ मुस्कुराते हुए इलिया बोली। ‘कौन है वो?’ आश्चर्य से चम्पा बोली। ‘अरे पगली, अपने बजरंगबली और कौन!!’ इलिया ने मूर्ति की ओर इशारा करते हुए बोली। फिर दोनों खिलखिलाने लगीं। भक्तों की बदौलत भैरू के साथियों और इलिया-चम्पा को काफी प्रसाद मिल चुका था। दो युवक भैरू को प्रसाद देते हुए चम्पा और इलिया के पास आए, ‘क्या नाम है बेटा तुम्हारा?’ एक युवक ने स्नेह से पूछा। ‘मेरा चम्पा और इसका इलिया।’ प्रसाद को मुट्ठी में लेते हुए चम्पा बोली। ‘ये इलिया का क्या मतलब होता है?’ दूसरे युवक ने आश्चर्य से पूछा। ‘पता नहीं अंकल जी, जब में पैदा हुई तो बापू बहुत नशे में थे। उनके दिमाग में न जाने क्या आया, मेरा नाम इलिया रख दिया।’ चहकते हुए इलिया बोली। प्रसाद बांटकर दोनों युवक चले गए। इलिया चम्पा से बोली, ‘देख बजरंगबली के अलावा भी कुछ आदमी अच्छे हैं।’ चम्पा ने सहमति से सिर हिलाया। दोनों के पास काफी प्रसाद इकट्ठा हो गया था। ‘चम्पा अब घर चलें, मां भी आ गई होगीं।’ चम्पा ने हामी में सिर हिलाया। दोनों के बजरंगबली को प्रणाम किया और चबूतरे से नीचे उतर आईं। ‘छोटू देख तेरे लिए कितना मावे का प्रसाद इकट्ठा किया।’ अपने दोनों हाथों में भरे मावे का प्रसाद दिखाते हुए इलिया बोली। छोटू भागकर आया, उसे थोड़ा प्रसाद देते हुए हुए इलिया बोली, ‘बाकी प्रसाद घर चलकर खाएंगे। थोड़ा-थोड़ा मां-बापू और भईया को भी दे देंगे।’ छोटू मान गया। तीनों मैदान पार कर बस्ती की तरफ रवाना हुए, मैदान का कोना पार करते हुए इलिया ने हनुमान जी की मूर्ति पर घूमकर निगाह डाली और बोली, ‘हे हनुमान जी, अगले मंगलवार को भी ऐसी कृपा रखना।’ चम्पा ने भी घूमकर फिर प्रणाम किया, तभी छोटू बोला, ‘जीजी रोज़ाना मंगलवार होता, तो कितना अच्छ होता। हमें रोज़-रोज़ मीठा खाने को मिलता।’
 
 
 
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