कहां कैसे जाए? अहसासों के जंगल में सब अकेले होते हैं।
Source: रचना समंदर | Last Updated 03:33(07/10/11)
भावनाएं किसी को दिखाई नहीं जा सकतीं। यह बिलकुल वैसा ही होगा, जैसे कोई पहाड़ के सामने खड़ा हो और आप उससे दरिया की बातें कर रहे हों। जितना मुश्किल इस इंसान के लिए चट्टानों को देखते हुए पानी की कल्पना करना है, उतना ही मुश्किल है किसी और के दिल की हालत की कल्पना करना।
नदी के जल में कदम रखने वालों से पूछिए, ‘कैसा लग रहा है?’ कोई शीतलता की अनुभूति बखानेगा, तो कोई लहरों के अहसास को। कोई तल में मौजूद जीवों का रोमांच बताएगा, तो पानी के छपाके उछालने के आनंद का ज़िक्र करेगा। और जिसने जल पर कदम रखा ही नहीं, उसे इसमें से कुछ भी समझाया नहीं जा सकता।
नदी एक, उसकी शीतलता वही, बहाव वही लेकिन नज़रें कई, अहसास कई और ज़ाहिरी तौर पर अनुभव जुदा। कुछ वक्त पहले एक मेले में रोमांचकारी झूले का अनुभव लेकर आए बच्चे बार-बार कह रहे थे, ‘क्या अनुभव था? बड़ा मज़ा आया।’
उनसे पूछा, ‘बताओ तो कैसा लगा? शब्दों में बयान करो’, तो उलझ गए। बस, यही कहते रहे, ‘बड़ा मज़ा आया।’ क्या महसूस किया, यह बताना वाकई मुश्किल था। अहसास हमारी शक्लों की तरह ही होते हैं, समान होते हुए भी अलग।
इंसान परवरिश के सांचे में बनते हैं, अहसास अनुभवों के। सुख हों या दुख, साझे तो हो सकते हैं, पर एक-से नहीं। फिर भी हम ऐसा चाहते हैं कि कोई हमारी भावनाओं को समझे? हम जिस तकलीफ से गुज़र रहे हैं, उसी से किसी और को गुज़ार कर हमें क्या मिलेगा?
ऐसा इसलिए कहा क्योंकि अक्सर हम दुख को ही बांटने में मिलने वाली नाकामी पर अफसोस करते हैं। वैसे कहा जाए भी तो क्या? दुख को कैसे शब्दों में पिरोया जा सकता है? दर्द तो कभी बोला ही नहीं। सदा से चुप है। बेज़ुबान है।