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मासूम

 
Source: मोहम्मद इस्माईल खा   |   Last Updated 08:39(24/08/11)
 
 
 
 
सुबह से ही अस्पताल के बरामदों में उसकी आवाज सुनाई देने लगती है। ‘चाय-चाय-चाय.।’ बहुत सवेरे ही वह नहा-धोकर तैयार हो जाता है। साधारण-सी पैंट-शर्ट लेकिन साफ-सुथरी, बालों में तेल कंघा और पैरों में रबर के स्लीपर। चेहरे पर चमक, आत्मविश्वास और लक्ष्य प्राप्ति के लिए मेहनत। उसकी आवाज ‘चाय-चाय..’ में एक अजब-सा आकर्षण, सुखद कोमलपन मौजूद रहता है, जो अनचाहे किसी को भी इच्छा के विरुद्ध चाय पीने पर मजबूर कर दे। उसके चेहरे का कोमलपन और उसकी कोमल आवाज का फायदा अंजाने में ही कैंटीन वाले को मिलता। जितनी चाय उन अस्पतालों के बरामदों में बिकनी चाहिए, उससे कहीं ज्यादा बासू की खनकदार आवाज और मासूम चेहरे की वजह से बिक जाती।

बासू इन सबसे बेखबर अस्पताल के बरामदों में दिनभर सुरीली आवाज में हांक लगाता रहता, ‘चाय-चाय-चाय.।’ जैसे वह अपने किसी मिशन में लगा हो। सारा दिन उसका यही शगल चलता। केतली में चाय खत्म हो जाती, तो दौड़कर कैंटीन से भर लाता। धुले हुए मग का छीका और चाय की केतली लिए फिर उसकी वही सुरीली आवाज अस्पताल के बरामदों में गूंजने लगती। शाम ढलते-ढलते उसे थकान चढ़ने लगती। असली मुस्कान थकावट के कारण उसके चेहरे से ओझल होने लगती, तो वह किसी नकली मुस्कान का मुखौटा निकालकर अपने चेहरे पर लगा लेता। ऐसा कि देखने वाले धोखा खा जाते और बरबस उसकी चाय पीने पर विवश हो जाते। अंधेरा होते-होते वह अस्पताल के गलियारों से गायब हो जाता, फिर तलाशने पर भी नहीं मिलता। सूर्य की किरणों के प्रस्फुटन की लालिमा, ठंडी मधुर पछुआ बयार और आकाशवाणी के टावर से वातावरण में फैलती पहले-पहल संगीत की मधुर स्वर लहरियां सुबह होने का संदेश देतीं, तो अस्पताल के गलियारों में सुबह बासू की मीठी हांक से होती। बड़े सवेरे उसकी हांक से अस्पताल के गलियारे, मरीज और मरीजों के अभिभावक जागते। दस-बारह बरस का बासू रात को नकली मुस्कान का मुखौटा कहीं फेंक, चेहरे की थकान को गंदे बिस्तर के तकिए के नीचे कहीं छिपाकर फिर सवेरे तरोताजा हो अस्पताल के गलियारों में आ जाता। एक हाथ में चाय की केतली, एक हाथ में मग का छीका और साथ में लाता मुंह भरकर मधुर, कोमल पुकार, ‘चाय-चाय-चाय.।’
मैं जब सवेरे बासू की आवाज से जागता तो सोचता, इतने साधारण से ये दो शब्द बासू के मुंह से निकलते ही कैसे इतने मीठे हो जाते हैं। चाय से भी कहीं Êयादा मीठे। और यही बात मुझे आकर्षित करती बासू की जिंदगी के बारे में जानने के लिए। मेरा मन करता बासू को सामने बैठाकर ढेर सारी बातें करूं। पूछूं उससे, उसकी छोटी-सी जिंदगी के बारे में। दरअसल, इस जिज्ञासा के पीछे उसकी खनकती आवाज सुनने की बड़ी चाहत थी।

एक अंदेशा हमेशा मेरे मन में रहता है कि ईश्वर सभी अच्छी चीजों एक को ही नहीं देता। सारी नेमतें देता है, तो एक-आध कमी भी कर देता है। या एक चीज अच्छी देकर सारा जीवन दुखों से भर देता है। बासू के बारे में मैं सोचता, कहीं ऐसा तो नहीं कि बासू की इस खनकती मनमोहक सुरीली आवाज के सिवाए उसके जीवन में और कुछ भी नहीं? वरना यह बंगाली लड़का यहां यूं चाय क्यों बेचता? यह विडम्बना है कि कई बार जीवन की कोई मजबूरी मुस्कुराहट का मुखौटा पहनने को मजबूर कर देती है, ताकि उसका दर्द दूसरों पर जाहिर न हो और वह किसी की हमदर्दी या सहारा न पा सके।

एक शाम जब मैं अपने काम से फुर्सत में था और अस्पताल की सड़क पर टहल रहा था, तभी अपना काम खत्म कर थका-हारा आता हुआ बासू मुझे पीछे से आता दिखाई दिया। मैंने अपनी चाल कुछ धीमी कर ली कि वह मेरे बराबर आ जाए और मैं उससे कुछ बातें कर लूं। जब वह मेरे करीब आ गया, तो चलते-चलते मैंने उसकी ओर देखा। उसने भी थकान से बोझिल एक मुस्कान मेरी ओर फेंकी। उसका मेरा पहला कोई परिचय तो था नहीं। अस्पताल के बरामदे में चाय बेचते समय उसने शायद मुझे कहीं देखा हो और मेरी सूरत से परिचित हो। उसने कहा, ‘नमस्ते साहब।’

‘नमस्ते-नमस्ते तुम अस्पताल में चाय बेचते हो न?’ मैंने जानते हुए भी पूछा।

‘जी साहब।’

‘क्या नाम है तुम्हारा?’

‘जी, बासू।’

मैंने कहा, ‘बासू क्या? पूरा नाम बताओ।’

‘बासू, बासू बंगाली।’ उसने झिझकते हुए कहा।

‘कहां रहता है? कहां जा रहा है?’

‘रेल्वे स्टेशन के पास बच्चों का रिमांड होम है, वहीं। दीदी के पास.. वहीं रहता हूं।’

‘दीदी के पास, कौन हैं ये दीदी?’

‘रिमांड होम में बच्चों की देखभाल करती हैं। गुमशुदा बच्चे रखे जाते हैं न वहां। बड़ी अच्छी हैं दीदी। बहुत प्यार करती हैं बच्चों को।’

‘कितने बच्चे रहते हैं वहां?’

‘कई सारे। कुछ बड़े, कुछ छोटे, कुछ बहुत छोटे। बड़े बच्चे काम पर भी जाते हैं। शाम को वापस आ जाते हैं। वहां खाना मिलता है, बिस्तर मिलता है। एक-दो जोड़ी नए-पुराने कपड़े भी मिल जाते हैं। यहां चाय कैंटीन से कमाए पैसे हम दीदी के पास ही जमा करते हैं, जब घर जाएंगे, तब ले लेंगे।’

‘यहां के बच्चे वापस घर भी जाते हैं?’

‘हां, पुलिस उनके घरवालों का पता लगाती है। पता लग जाने पर उनके माता-पिता उन्हें आकर ले जाते हैं।’ वह भावुक होकर बोला, ‘जब मां-पिता बच्चे को देखते हैं, तो दौड़कर उससे लिपट जाते हैं। बच्चे भी रोते, उनके माता-पिता भी रोते, फिर ले जाते।’

‘कब से है तू यहां, मेरे माता-पिता नहीं आए तुझे लेने अभी तक? तू तो बड़ा है, तेरे पास तो पता ठिकाना भी होगा तेरा?’

वह खामोश हो गया, जैसे उसकी सांस अटक गई उसके गले में। काफी देर बाद वह बोला, ‘मेरा घर-द्वार, माता-पिता नहीं हैं साहब।’

‘क्या.. तू यहां आया कैसे? कहां से?’ मैं सहसा अपने शब्दों में उलझ गया।

उसने कहना शुरू किया, ‘अलीपुर जिला, बंगाल में कसौली नाम के छोटे गांव में, मैं मेरे माता-पिता और छोटे भाई के साथ रहता था। मां बीमार रहती, उसके मुंह से खून आता। बाबा धान के खेत में मजदूरी करते। मेरी मां का इलाज गरीबी के कारण नहीं हो पाया और वह मर गई। कुछ दिन बाद एक दिन धान के खेत में पानी के सांप ने बाबा को काट लिया। वह भी न बचे। फिर हम दोनों भाई अकेले हो गए। मेरा भाई छोटा था, भूख से बहुत रोता था। फिर मेरा काका आया बोला, पैसा लेना है तेरे बाप से। तेरी मां की बीमारी के लिए लिए था उसने मुझसे। उसने हम दोनों भाइयों को निकालकर घर पर कब्Êा कर लिया। हम दोनों जैसे-तैसे भागकर हावड़ा आ गए। वहीं स्टेशन पर भीख मांगते रहे। एक दिन मेरा भाई ट्रेन में चढ़कर भीख मांग रहा था कि ट्रेन चल दी।’

मैंने आश्चर्य से पूछा, ‘फिर?’

‘पता नहीं साहब कहां चला गया?’

‘कौन सी ट्रेन थी? कहां जा रही थी?’ मैंने हैरानी से पूछा।

‘मालूम नहीं साहब।’

‘वह तो बहुत छोटा था, क्या होगा उसका?’ मैंने बेचैनी से पूछा।

वह मासूम-सा चेहरा बनाकर मुझे देखने लगा। मेरा अनुमान ठीक निकला। ऊपरवाला गरीब की झोली में एक-आध सुख डालकर बाकी दुखों से भर देता है। छोटा-बड़ा कुछ नहीं देखता।

मुझे कुछ सुझाई नहीं दे रहा था कि आगे क्या कहूं?

उसके चेहरे पर एक चमक उभरी, वह बोला, ‘मैं यहां चाय के कैंटीन में काम कर रहा हूं और दीदी के पास पैसे जमा कर रहा हूं। वापस गांव जाकर चाचा के पैसे चुका दूंगा और घर वापस लेकर छोटे भाई को रहने के लिए दे दूंगा।
‘कितने पैसे जमा करेगा! कब तक करेगा! क्या चाचा मकान वापस करेगा? छोटे भाई को कहां से लाएगा, उसमें रहने के लिए?’

फिर मैंने उससे पूछा, ‘तेरा चार साल का भाई कहां होगा, कहां खोजेगा उसे इतनी बड़ी दुनिया में?’

उसकी मासूम आंखों में मायूसी के डेरे तैरने लगे। उसने धीरे से कहा, ‘आएगा साहब, जरूर घर आएगा। मुझे मिलेगा साहब। मैं घर जाकर उसका इंतजार करूंगा।’ और उसकी आंखों से आंसू टप-टप गिरने लगे।

मैं अपने आप की मलामत करने लगा, इस मासूम के सपने झूठे ही सही, पर मैंने इन्हें क्यूं तोड़ा। उसकी खनकती हंसी को मैंने क्यों छीना।

अंधेरा घिर आया था। मेरे गालों पर एक गीली लकीर-सी बन गई थी। सच्चे पश्चाताप के आंसू थे, इसलिए ईश्वर ने उन्हें दुनिया की नजरों में छिपा लिया। मैंने मन ही मन ईश्वर से दुआ मांगी, तेरे खजाने में तो कोई कमी नहीं। तू तो असम्भव को भी सम्भव बना सकता है। इस मासूम की आस भी पूरी कर दे भगवन।

दूसरे रोज फिर अस्पताल के गलियारों में उसकी आवाज गूंजी, ‘चाय-चाय-चाय.।’ पर उसकी आवाज में वह सुरीलापन न था। वह खनक न थी। चेहरे पर वह खुशी न थी। मैंने अंजाने में उसके अंदर के कोमल गुलाब की पंखुड़ियों को नोंच डाला था। वह व्याकुल था, शायद सारी रात सो न पाया हो। उसकी इस दशा के लिए मुझे आत्मग्लानि हो रही थी। उसे मेरी ओर आता देख मैंने उससे अपना मुंह चुरा लिया मुजरिमों की तरह। वह मरे पास से गुजर गया हांक लगाता हुआ, ‘चाय-चाय-चाय.।’
 
 
 
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