हर गुज़रता लम्हा अहसास के निशान छोड़ता जाता है। फिर क्या छोड़कर हम आगे बढ़ते हैं?
‘इस्तेमाल करके फेंक देने’ या ‘बदल लेने’ की सुविधा वाले आज के दौर ने उत्पादों में प्रतियोगिता को बढ़ावा दिया है। सेवाओं के क्षेत्र में विकल्प बढ़ गए हैं। दिमाग ने तरक्की की, तो क्या दिल भी बदल जाता? सोच तर्क करके ज़मीन बनाता है। और मन की तो अपनी फिज़ां होती है।
‘मूव ऑन’ के नज़रिए ने सबकुछ भुला देने के केवल निर्देश दिए हैं। मानना तो दिल को है और उसकी दीवारें सख्त बनाना इंसान के हाथ में नहीं है। आंखों के लिए नज़ारे बढ़ जाएं, तो उन्हें दिल के सहारे मान लेना भूल होगी। तकनीक कितनी भी प्रगत क्यों न हो जाए, न तो आंसुओं में कुछ पानी कम कर पाएगी और न खुशी की किसी लकीर को बढ़ा पाएगी।
ज़िंदगी की राह पर, गुज़रा भुलाकर आगे बढ़ जाने का दावा करने वालों के पैर आज भी पुरानी हवेलियों को देखकर ठिठक जाते हैं। उनकी आंखों में उखड़ी ईंटों वाले आंगन के सपने चुपके से आ जाते हैं। आंगन का चूल्हा आज भी धुंआ देने लगता है। छोटी-सी तितली हथेली पर आ बैठती है। आधी-आधी रोटी के साझेपन की तृप्ति हूक उठा जाती है। संगीत के शोर को कितना ही बढ़ा लें, दादी की लाठी की ठकठक, मां की आवाज़, पापा की आहट गाहे-बगाहे सिर उठा लेती हैं। छोड़कर आगे बढ़ जाने वाले पलटना चाहते हैं लेकिन इंकार झूठे गुरूर की आड़ में बैठा है। गोया कोई हार को ही जीत का दर्जा दे बैठे।
दिल उतना ही नाज़ुक है। यहां आज भी किसी की नज़र, किसी के बोल, किसी का रवैया पुरानी कील पर उलझी रह गई चिंदी की तरह लगे रह जाते हैं। इनकी तरफ न भी देखें, तो भी चुभन का अहसास बना रहता है। आवाज़ें शांति का विकल्प कैसे हो सकती हैं? दुआ को उठने वाले हाथ हर मोड़ पर नहीं मिलते। दिल को पता होता है कि क्या छूट रहा है, तर्क करने पर वह चुप हो सकता है लेकिन गलत साबित नहीं होता।
यकीनन दिमाग की नादानी पर मुस्कुरा उठता होगा। दिमाग की तरक्की से दिल को जलन नहीं होती। उसे पता जो है कि रास्ते लौटने वालों के भी होते हैं। कितना पुरसुकून है यह सच, कितना इत्मीनान-भरा।