अवसर विशेष: त्योहार सिखाते हैं
Source: Bhaskar News | Last Updated 07:35(06/10/11)
भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत और गायों की पूजा करने की सलाह दी थी। हमारे कई पर्व वृक्षों और सूर्य-चंद्रमा की पूजा करके, उनके प्रति अपने आभार को प्रकट करने का संदेश देते हैं।
दशहरे का ही उदाहरण लीजिए, इस पर्व में वाहन, शस्त्रों और शमी पूजन का विधान है। पौराणिक कथा के अनुसार राम की रावण पर विजय ने विजयादशमी की नींव रखी थी। यानी यह पर्व अच्छाई की जीत के विश्वास को बनाए रखने की हिम्मत देता है।
दूसरी ओर शमी वृक्ष की पूजा कर हम प्रकृति का शुक्रिया अदा करते हैं। दशहरे के दिन पूजन के बाद परिचितों को शमी के पत्ते भेंट करने की प्रथा कायम है। कहते हैं, राजा रघु इंद्रलोक पर चढ़ाई न कर दें, इस डर से इंद्र ने शमी की पत्तियों को स्वर्ण में बदल दिया था। इसलिए स्वर्ण मुद्राओं के बराबर मानकर ही इन पत्तियों को भेंट किया जाता है। शमी की ये पत्तियां धन-धान्य का प्रतीक के रूप में स्वीकार की गई हैं। इसलिए माना जाता है कि जिसे दशहरे के दिन भेंट में ये पत्तियां मिलती हैं, उस पर लक्ष्मी कृपा बनी रहती है। यानी अपनों के जीवन में सुख-सम्पदा की कामना के साथ ये पत्तियां उन्हें भेंट की जाती हैं। इस रीत की प्रासंगिकता पर गौर करने पर अहसास होता है कि आपसी मेलजोल बढ़ाने और रिश्तों को जोड़े रखने का यह एक बेहतरीन तरीका है। पत्तियों भेंट करने के बहाने करीबियों से मिलते हैं, तो उनकी सुध ले पाते हैं, बड़ों के प्रति सम्मान और अपनों से प्यार जताने का अच्छा मौका होता है ये।
इसी तरह वाहन और शस्त्र पूजन पर गौर कीजिए। पहले बात करते हैं, वाहन पूजन की। जिंदगी को आसान बनाने में हमारे वाहन का अहम योगदान है, तभी तो घर में आई नई गाड़ी परिवार के सदस्यों के चेहरे पर मुस्कान ले आती है। दशहरे के दिन वाहन की पूजा कर हम इसी वाहन का शुक्रिया अदा करते हैं। देखा जाए तो एक ऐसी चीज का आभार प्रकट करते हैं, जो हमारी भावनाओं को समझ नहीं सकती, लेकिन फिर भी ये तरीका हमारे अंदर संस्कारों को जीवित रखने के साथ-साथ हमें वस्तुओं का मोल समझा जाता है।
ठीक इसी तरह शस्त्र पूजन भी अहम है। शस्त्र पूजा की यह परम्परा भारत की रियासतों में बड़ी धूमधाम से मनाई जाती रही है। रियासतों में शस्त्रों के साथ जुलूस भी निकाला जाता था। शस्त्र रक्षक माने जाते थे। एक तरह से जीवन के साथी। इसीलिए इनकी पूजा का विधान बनाया गया।
बदलते युगों ने शस्त्रों और वाहनों को दुरुपयोग का ज़रिया और प्रकृति को अवहेलना का शिकार बना दिया। लेकिन त्योहार हर साल आकर हमें याद दिला जाते हैं कि उनके असली मायने खोज लिए जाएं और फिर से प्रकृति के साथ साम्य बैठाती शांत जीवनशैली अपना ली जाए।