नागपुर
‘कनु तुम्हारी बिंदी कहां है? सुबह-सुबह सूना माथा अच्छा नहीं लगता!’ मुझे बगीचे में टहलते देख पड़ोस की माया आंटी दीवार से लगे मोगरे की बेल से फूल तोड़ते हुए पूछ रही थीं। तभी पीछे से जम्हाई लेते परेश आए और कहने लगे, ‘अरे आंटी, कनु की बिंदी माथे पर कम तकिए के गिलाफ में, सोफे के हत्थे पर, ड्रेसिंग टेबल, अलमारियों के आइने में या बाथरूम की टाइल्स में •यादा लगी होती हैं।’
तभी माया आंटी ने परेश की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘अरे परेश, बिंदी तो तुम्हारी बांह पर चिपकी हुई है।’ और मेरी ओर टेढ़ी नज़र मारते हुए ठहाके लगाकर हंसती हुईं अंदर चली गईं।
मैंने शरारती नज़रों से परेश की ओर देखा, तो उनका चेहरा झेंपा हुआ नज़र आया और मेरे चेहरे की मधुर लालिमा उसके चेहरे पर अनेक रंगों के साथ नज़र आई, जो अच्छा संकेत नहीं दे रही थी। अब मेरी सम्भलने की बारी थी क्योंकि बिंदी शायद तकिए के गिलाफ से परेश की बांह पर चिपक गई थी। अत: परेश का सुबह-सुबह ही मूड खराब हो चला था। मैंने बचने के लिए जल्दी-से भागते हुए कहा, ‘गर्मा-गर्म चाय बना लाती हूं।’ और अंदर चली गई।
हमेशा बात को सरलता और सहजता से लेने वाले परेश आज गम्भीर हो गए थे। शायद अपने आप को दो औरतों के बीच हंसी का पात्र समझ, वो सहज नहीं हो पा रहे थे। रसोई में वह मेरे पीछे-पीछे ही चले आए। मैं उनसे नज़रे बचाते हुए पानी में जल्दी-जल्दी चाय पत्ती-शक्कर डालने लगी, लेकिन परेश की घूरती आंखों का निशाना मेरी ओर लगा ही रहा। मैंने पूरा दिन खराब न हो, इस वजह से बड़े प्यार से परेश को चाय का प्याला दिया और खुद भी उनके साथ चाय पीने लगी।
अचानक मैंने देखा बिंदी अभी भी परेश की बांह पर चिपकी हुई है। मुझे हंसी आ गई और हंसते हुए ही जब मैंने बिंदी निकालनी चाही, तो परेश ने हल्के से हाथ को धक्का देते हुए कहा, ‘रहने दो कनु, मैं बिलकुल मज़ाक के मूड में नहीं हूं। जब बिंदी माथे पर टिकती नहीं, तो तुम महिलाएं इसे लगाती ही क्यों हो? क्या बिंदी नहीं लगाने से मैं तुम्हारा पति नहीं रहूंगा या मेरी उम्र कम हो जाएगी? किसी भी परम्परा या रिवाज़ को जबरन तुम लोग अपने ऊपर लाद क्यों लेती हो! देखो कनु मैंने तुमसे कई बार कहा है कि बिंदी इधर-उधर मत चिपकाया करो। किसी दिन मैं ज़रूर हंसी का पात्र बन जाऊंगा। पर तुमने कब मेरी बात की ओर ध्यान दिया। हर कलर, हर साइÊा की छोटी-बड़ी, गोल-चौकोर, लम्बी बिंदी हर जगह दिखाई देती है। जब बाहर जाना होता हो, लगा ली मैचिंग की सुंदर-सी बिंदी माथे पर और वापस आते ही चिपका दिया निकालकर उसको। बस, जहां जगह दिखी, वहीं पूरी ताकत के साथ कि ले अब तक मैं सम्भालती आई, अब तू सम्भाल। फिर बाद में लगा ली दूसरी नई बिंदी। वो बेचारी चिपकी रहती है- हफ्तों, महीनों, सालों वहीं पर।’
माया आंटी ने सुबह-सुबह महाभारत का शंख फूंक दिया था। आज रविवार की छुट्टी का दिन और उस पर मेरे बच्चों का मनपसंद नाश्ता भी कुर्बान होने जा रहा था, जो आराम से उठने के बाद उनकी पहली फरमाइश होती थी। परेश का धारा-प्रवाह बोलना Êारी था।
शादी के इतने सालों बाद भी एक छोटी-सी बात पति के लिए इतनी अहम बात हो जाएगी, कभी सोचा न था। मैं अभी भी होंठो पर मुस्कान सजाए बात के खत्म होने का इंतज़ार कर रही थी। गुस्से के बजाए दुख महसूस हो रहा था कि मैं परेश को कैसे चुप कराऊं। बच्चे उठ जाएंगे, तो क्या सोचेंगे कि मम्मी-पापा के झगड़े की वजह है भी क्या, एक छोटी-सी बिंदी।
हमेशा भावनाओं पर भाषण देने वाल परेश आज भूल गए थे कि भावनाएं सभी के पास होती हैं। आज उनकी भावनाएं मेरी भावना को जो ठेस पहुंचा रही थीं, उसका अंदाज़ कहां था उन्हें। वह तो सिर्फ यह अहसास करना चाहते थे कि कनु तुमसे गलती हुई है और मेरा अहं आहत हुआ है।
बाल्कनी में जा खड़ी हो यही सोचती रही कि इतने दिन साथ रहने पर भी हम एक-दूसरे को कहां समझ पाते हैं। परेश ऐसी एक क्या दस बिंदिया भी जो मेरी थीं, उनकी बांह पर चिपक जातीं तो भी नाराज़ न होते. पर आज सवाल दूसरों के सामने दिख जाने का था। कितनी बेदर्दी से उन्होंने कह दिया कि ‘बिंदी लगाना ही छोड़ दो।’ छोड़ देती अगर यह मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा न होता। उनकी खुशी, उनकी भावनाओं से बढ़कर तो नहीं कुछ भी मेरे लिए।
मुझे मौन देखकर शायद उनको तसल्ली नहीं हो रही थी। अगर मैं चिल्लाती-रोती, तो पुरुषत्व की जीत होती। पर मेरी चुप्पी उन्हें बर्दाश्त नहीं हो रही थी। अपने ही विचारों से बात करते-करते मेरी आंखें गीली हो गईं। मैंने आहट सुनकर मुड़कर देखा, तो परेश अब तक बांह पर चिपकी उस बिंदी को उखाड़कर, उसे मुझे दिखाते हुए हाथ से झटककर नीचे फेंक रहे थे। अब मेरा दुख, मेरी उदासी और आंखों की नमी ये तीनों फूटे थे, रुलाई बनकर। अंदर आकर डायनिंग टेबल पर सिर रख मैं फूट-फूटकर रो पड़ी। मेरे धैर्य का अंत हो गया था। जो परेश मेरी छोटी से छोटी चीज़ को उठाकर ऊपर बड़े प्यार से, जतन से रखते आज मेरी माथे की बिंदी को मेरे ही सामने नीचे फेंक रहे थे। वह बिंदी, जो मैं उनके लिए लगाती थी। क्या मेरी बिंदी से बढ़कर, आंटी की कही हुई बात थी। रोते-रोते माथे पर लगी बिंदी माथे से निकाल टेबल पर चिपक गई थी। मैंने उसे वहीं चिपके रहने दिया।
मेरा अनवरत रुदन सुन परेश धीरे-धीरे मेरे पास आ खड़े हो गए और अब शायद अपनी कही बातों पर गौर कर समझ पा रहे थे कि गलती उनसे भी हो गई है। जिन हाथों से धक्का दिया था, जिन हाथों से बिंदी फेंकी थी, उन्हीं हाथों से मेरी दोनों बांहें थाम कहने लगे, ‘सॉरी कनु, मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था। प्लीज़ चुप हो जाओ, मुझे माफ कर दो।’ मेरे मौन ने उन्हें अपनी गलती का अहसास करा दिया था। अगर मैं भी उनके साथ चिल्लाती, तर्क-वितर्क करती, तो बात बढ़कर अनबोले पर खत्म हो जाती।
मेरे आंसू पोछते हुए उनकी आंखों में शर्मिदगी और ग्लानि के साथ-साथ पश्चाताप के भाव स्पष्ट नज़र आ रहे थे। परेश जैसे थे-सहृदय कोमल संवेदनाओं से भरे फिर वैसे ही हो गए थे। उनका कोमल अहसास पाते ही मेरी चुप्पी टूट पड़ी और मैं कहने लगी, ‘परेश, मैं तुम्हें आहत करना नहीं चाहती थी। आज तुम कितना नाराज़ हो गए थे। काश, हम महिलाएं तुम्हें समझा सकतीं कि यूज़ एंड थ्रो के ज़माने में भी यूज़ की हुई बिंदी हम डस्टबिन में नहीं फेंक पाते। जब ये पुरानी या बदरंग हो जाती हैं, तो सामने पड़ने वाले सामानों पर चिपका देते हैं। जिस तरह भगवान पर चढ़ाए गए सामान फेंकने के बजाय पवित्र नदियों में ही बहाया जाता है, उसी तरह की भावना बिंदी के लिए भी है।’‘बस कनु आगे कुछ मत कहो। सच कह रही थीं माया आंटी कि तुम्हारा सूना माथा बिलकुल अच्छा नहीं लगता।’ कहते हुए परेश ने ड्रेसिंग टेबल से लाल सुर्ख छोटी-सी बिंदी मेरे माथे पर लगा दी।
वह बिंदिया मानों कनु के चेहरे पर दमक उठी, लेकिन सिर्फ सौंदर्य या सुहाग का प्रतीक बन नहीं बल्कि कनु का स्वाभिमान, परेश का मान और प्यार बन...।
नारी के व्यक्तित्व की छोटी-छोटी चीज़ें उसके लिए बड़े मायने रखती हैं। कनु के लिए भी उसकी बिंदिया मात्र श्रृंगार का प्रतीक नहीं, बल्कि उसके नारीत्व का अहम हिस्सा है।