वे निराले,उनका अंदाज भी निराला..
Source: भास्कर | Last Updated 11:59(10/08/11)
हिंदी के महाप्राण, युग प्रवत्र्तक, सुप्रसिद्ध महाकवि पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी निराला कवयित्री महादेवी वर्मा के मुंहबोले भाई थे।
एक बार वे रक्षाबंधन के दिन सुबह-सुबह आ पहुंचे अपनी लाडली बहन के घर और रिक्शा रुकवाकर चिल्लाकर द्वार से बोले, ‘दीदी जरा बारह रुपए तो लेकर आना।’
आवाज सुनकर महादेवी तुरंत रुपए लेकर बाहर आईं। उन्होंने पूछा, ‘ये तो बताओ भैया, यह सुबह-सुबह बारह रुपए की क्या जरूरत आन पड़ी?’ हालांकि वे अच्छी तरह से जानती थीं कि उनका ये दानी भाई रोÊा सुबह किसी न किसी को अपना सर्वस्व दान कर आता है और फिर बड़े गर्व से उन्हें इस बारे में बताता भी है। लेकिन आज तो रक्षाबंधन है, फिर आज क्यों?
उनके प्रश्न का उत्तर देते हुए निराला सरलता से बोले, ‘ये दुई रुपया इस रिक्शावाले के लिए और दस रुपए तुम्हें देना है। आज राखी है न! तुम्हें भी तो राखी बंधवाई के पैसे देने होंगे। रही बारह रुपए की उधारी, तो वो तुम्हें चार-आठ दिन में लौटा ही दूंगा।’