पिछले दिनों एक युवती का मैसेज मिला। कमाल की चित्रकार है वह। उसका मन रंगों की दुनिया में विचरता है लेकिन शरीर दिन-रात एक हादसे के नतीजे से मिली वेदना को झेलने पर मजबूर है। उसने मैसेज में बस एक वाक्य में अपनी इच्छा लिखी थी- ‘मैं सिर्फ एक दिन बिना दर्द के जीना चाहती हूं।’ उस दिन पहली बार इंसान की सीमाओं का शिद्दत से अहसास हुआ।
एक दिन तो क्या, हम में इतनी भी कूव्वत नहीं कि उसको दर्द से आज़ाद एक लम्हा भी दे सकें। उसने शायद यह दुआ ईश्वर से भी मांगी होगी। मन्नतों के पीछे छुपी दास्तानों का अब अंदाज़ा हुआ।
कौन क्या मांगता है, इससे उसकी ज़िंदगी और उसके अपनों की ज़िंदगी के कई धागे जुड़े होते हैं। हम अमूमन केवल अपनी दुआ कहते हैं। दूसरों की मन्नतें हम सुन लें, तो मन पर जाने कितने और मन उगते महसूस होंगे।
एकाएक हाथ फिर उठ जाएंगे। अबकी बार यकीनन दूसरों के लिए।
भोपाल के काली मंदिर में देवी की तस्वीर पर लिखी मन्नतों को देखा है कई बार। कुछ-कुछ दिनों में उस पर नई इबारतें दिखाई देती रहती हैं।
कोई चाहता है कि माता-पिता हर रोग से दूर रहें। एक ग्यारहवीं कक्षा के छात्र ने अपने अच्छे नम्बर आने की दुआ के साथ ही लिखा है कि उसकी लीवर और शुगर की समस्या भी देवी हल कर दें। एक अन्य दुआ बेटियों की है कि चूंकि माता-पिता चाहते हैं, इसलिए उनको जीवनसाथी पुलिसवाला ही मिले। तो एक ने लिखा है कि शादी जोधपुर में ही हो। समाज का आइना लगता है मंदिर का वह हिस्सा, जहां ये मन्नतें लिखी हुई हैं।
दुनिया के लोग कैसे-कैसे सवालों से जूझते हैं, उनकी मांगें कितनी छोटी-सी हैं। सबकुछ सम्भव-सा लगता है लेकिन कहीं न कहीं यही असम्भाव्य है, इसीलिए तकलीफ की वजह भी।
किसी भी देवस्थल पर आने-जाने वालों को देखिए, सब अलग ही भाव लिए आते हैं। उनकी देवस्थान की ओर उठने वाली नज़र में अलग आस होती है। किसी की अपलक दृष्टि में कुछ सुकून-सा छुपा होता है, तो किसी ने भटकती आंखें व्यथा बता देती हैं। यहां एक मूक संवाद चलता रहता है। मन्नतें कहानियां हैं, लोगों की। उनके परिवेश की। कमियों की। कोशिशों की। उम्मीदों की। यह आसमानों की तरफ भेजी जाती हैं, लेकिन दिलों को छूकर गुज़रती हैं।