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अनुपस्थिति

 
Source: कुमार अनुपम   |   Last Updated 04:30(14/09/11)
 
 
 
 
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यहां
तुम नहीं हो

तुम्हारी अनुपस्थिति के बराबर
सूनापन है विचित्र आवाजों से सरोबार
धान की हरी-हरी आभा
और महक है
मानसून की पहली फुहार की छुवन
और रस है

तुम नहीं हो यहां
तुम्हारी अनुपस्थिति है।

नाम

जिस नाम से पुकारकर
मां थमा देती थी उसे सामान का खर्रा
मित्र उस नाम से अनजान थे

मित्र उसे ही समझते थे वास्तविक नाम
महÊा तुक पुकारने पर जिसका
वह फांद आता था दीवार

एक नाम उसका
पहचान की पुस्तक-सा
खुला रहता था जिसकी भाषा
नहीं समझती थी उसकी प्रेमिका

जिस नाम से अठखेलियां करती थी उसकी प्रेमिका
वह अन्य सबके लिए हास्यापद ही था

इस तरह
सबके हिस्से में
हंसी बांटने की भरसक कोशिश करता डाकिए-सा
जब हो जाता था पसीना-पसीना
वह खोल देता था अपने जूते
अपनी आंखें मूंदकर
कुछ देर सोचता था-
अपने नामों और अपने विषय में
हालांकि ऐसा कम ही मिलता था एकांत।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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