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बच्चों की परवरिश

 
Source: dainikbhaskar.com   |   Last Updated 09:56(06/02/12)
 
 
 
 
क्या आप अपने नन्हे बच्चों को अपने हाथ से खाना खिलाते हैं? क्या आप उन्हें उनकी खुराक या जरूरत से ज्यादा खाना खिला देते हैं? क्या आपके छोटे बच्चे आपके साथ एक ही पलंग पर सोते हैं? क्या उनके पास खेलने के लिए अच्छे (सुटेबल) खिलौने हैं? क्या आपके पास रबर का बना बाथटब है और उसी में आप अपने बच्चों को नहलाते हैं? क्या आप अपने गोद के बच्चे को डायपर पहनाते हैं और क्या डायपर बदलने की मेज आपके पास है? क्या आप उन्हें कभी जिद करने पर या किसी अन्य वजह से पीटते हैं? क्या आपने उन्हें स्कूल में या बाहर सही व्यवहार करना सिखाया है? क्या आपका अपने बच्चों से भावनात्मक जुड़ाव है?




सवाल किसी भी भारतीय माता-पिता को हैरान करने के लिए काफी हैं। हमारे यहां जैसी अलग-अलग परिस्थितियों में बच्चों की परवरिश होती है, उसमें यह कल्पना भी कठिन है कि अगर आप बच्चों की परवरिश में निश्चित मानकों का पालन नहीं करते तो खराब माता-पिता हैं। निम्नवर्गीय घरों को तो छोड़ ही दें, कितने मध्यवर्गीय घर होंगे जिनमें बच्चों को नहलाने के लिए रबर के बाथटब
का इस्तेमाल किया जाता है? डायपर बदलने की मेज हमारे यहां आखिर कितने उच्चवर्गीय संपन्न घरों में होगी, मध्यवर्गीय घरों को तो रहने ही दें?



सवाल सिर्फ आर्थिक हैसियत और सुविधाओं का ही नहीं है। बच्चों को सही रास्ते पर लाने के लिए झिड़क देने या पीट देने से हमारे अधिकांश घरों में गुरेज नहीं किया जाता। इसके बावजूद भावनात्मक लगाव की
हकीकत यह है कि वही बच्च थोड़ी देर में सुबकता हुआ अपनी मां की गोद में आकर छिप जाता है। हम वो देश हैं जहां सोलह किलोमीटर रोज सिर पर बस्ता रखकर ऊबड़-खाबड़ रास्तों से स्कूल जाने वाले बच्चे
महान वैज्ञानिक बने। हम वह संस्कृति हैं जहां तंगहाली में परवरिश करती मां जब बच्चे को ईदगाह के मेले से खिलौना खरीदने के लिए अपनी गाढ़ी कमाई से बचाकर कुछ पैसे देती है, तो वह मां के लिए चिमटा खरीद लाता है जिससे रोटी सेंकते वक्त उसकी उंगलियां नहीं जलें!




इसीलिए ये सवाल जब सुदूर नार्वे में अनुरूप और सागरिका भट्टाचार्य से किए गए तो एकबारगी वे उनका अर्थ ही नहीं समझ सके। जब तक समझे, वे एक ऐसे दुष्चक्र की गिरफ्त में आ चुके थे। यह यूरोप के दूसरे सबसे घनी आबादी वाले देश नार्वे में एक भारतीय दंपती की मुश्किलों की ही कहानी नहीं है। यह यूरोप और भारत में बच्चों की परवरिश के तौर-तरीकों में फर्क की ही कहानी नहीं है। यह बच्चों की परवरिश जैसे सामाजिक पारिवारिक मामले में सरकार के जघन्य हस्तक्षेप की कहानी भी है। लेकिन पहले अनुरूप और सागरिका भट्टाचार्य की कहानी। ऐसे शुरू हुआ एक के बाद एक की मुसीबतों का सिलसिला
अनुरूप भट्टाचार्य भू-वैज्ञानिक हैं और अमेरिकी कंपनी हालीबर्टन के लिए नार्वे के स्तावेंगर शहर में काम करते हैं। यह नार्वे का तीसरा बड़ा शहर है। आबादी दो लाख से भी कम है। यहीं अनुरूप पत्नी सागरिका, बेटे अभिज्ञान और बेटी ऐश्वर्य के साथ रहते हैं।



उनकी मुश्किलें तब शुरू हुईं जब स्तावेंगर के स्थानीय चाइल्ड केयर सेंटर ने अभिज्ञान के व्यवहार के बारे में कुछ शिकायत की। बस फिर क्या था, स्तावेंगर का सरकारी चाइल्ड वेलफेयर सर्विसेज महकमा फौरन
सक्रिय हो गया। पूरे परिवार को निगरानी पर रख दिया। महकमे के अफसर घर आने लगे। पूछताछ होने लगी। बच्चे कहां सोते हैं, क्या खाते हैं, कहां नहाते हैं, कभी उन्हें पीटा? यह सिलसिला कुछ दिनों तक चला। फिर एक दिन महकमे के कारिंदे अनुरूप-सागरिका के दोनों बच्चों को अपने साथ ले गए। तारीख थी 12 मई 2011। अभिज्ञान तब दो साल का था और ऐश्वर्य को दुनिया में आए पांच महीने हुए थे। परेशानहाल मातापिता ने पता किया तो उन्हें काउंटी बोर्ड के बारे में जानकारी मिली, जहां बाल और समाज कल्याण के मामलों की अपील की जा सकती थी। चार दिन बाद उन्होंने ठीक यही किया। चाइल्ड वेलफेयर सर्विसेज ने उनकी अपील का विरोध किया, यह कहकर कि बच्चों को न तो रबर के बाथटब में नहलाया जाता है और न ही डायपर बदलने के लिए डायपर टेबल का प्रयोग किया
जाता है। प्रारंभ में काउंटी बोर्ड की सहानुभूति भट्टाचार्य दंपती के साथ थी। बोर्ड ने कहा कि नहलाते और डायपर बदलते समय बच्चों को चोट लगने का खतरा तो है, पर अभी तक उन्हें चोट नहीं लगी है। यह भी कहा कि दंपती के घर में स्थितियां तभी खराब हुईं जब चाइल्ड वेलफेयर सर्विसेज के लोग घर आने लगे और मां को लगा कि वे बच्चों को उनसे छीनकर ले जा सकते हैं।



अंतत: बच्चों को ले जाए जाने के 11 दिन बाद, 23 मई को, बोर्ड ने फैसला दिया कि यह मानने का कोई कारण नहीं है कि भट्टाचार्य दंपती के घर में बच्चों की परवरिश की स्थितियां बेहतर नहीं हो सकती, खासकर जब उनकी मां की मदद के लिए बच्चों की नानी भी आने वाली हैं, इसलिए बच्चों को घर से अलग रखने का आदेश रद्द किया जाता है।


आरोप यह कि मां को 5 माह की बेटी को गोद में लेना नहीं आता अनुरूप-सागरिका की मुश्किलें इससे खत्म नहीं हुईं। चाइल्ड वेलफेयर सर्विसेज ने स्तावेंगर की सिटी अदालत में काउंटी बोर्ड के फैसले को चुनौती दी। अदालत में उसने और भी संगीन आरोप भट्टाचार्य दंपती पर लगाए। अब उसने कहा कि उनके घर में बच्चों के खेलने के लिए पर्याह्रश्वत जगह नहीं है, उनके पास ऐसे खिलौने हैं जो बच्चों के लिए ठीक नहीं, बेटे के लिए अलग बिस्तर तक नहीं है, उसे अपनी उम्र से बड़ी उम्र के कपड़े पहनाए जाते हैं।



सबसे गंभीर आरोप यह कि मां सागरिका बच्चों की भावनात्मक जरूरतों का ख्याल नहीं रखतीं। उनका बच्चों के साथ भावनात्मक जुड़ाव नहीं है। एक बार उन्होंने बच्चे को चांटा भी मारा था। दोबारा ऐसा इसलिए
नहीं किया क्योंकि उन्हें पता चल गया कि ऐसा करना नार्वे के कानून में अपराध है। सागरिका को बच्चों को ठीक ढंग से गोदी में लेना भी नहीं आता। सागरिका हतप्रभ कम और हैरान ज्यादा थीं।
अदालत ने फैसला दिया कि घर पर बच्चों की परवरिश ठीक ढंग से होने की कोई संभावना नहीं है, इसलिए उन्हें घर से अलग रखा जाए। बच्चों के नानीनाना के आने से भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि वे
थोड़े समय के लिए आएंगे। अंतत: दोनों बच्चों को दो अलग-अलग फॉस्टर होमों में डाल दिया गया। कोर्ट के फैसले में कहा गया था कि माता-पिता दोनों बच्चों से साल में दो बार दो घंटे के लिए मिल सकते हैं।



बाद में काउंटी बोर्ड ने इस आदेश को बदलते हुए कहा कि दोनों बच्चे अपने माता-पिता से 2026 और 2028 में 18 वर्ष की उम्र पूरी होने तक नहीं मिल सकते। अलबत्ता इस बीच वे साल में तीन बार एक-एक घंटे के लिए अपने माता-पिता से मिल सकते हैं। नार्वे में रहते हैं तो वहां के नियम कायदों का पालन करना पड़ेगा बच्चों को जुदा करने के आठ महीने बाद पिछले दिनों जब भारतीय मीडिया में अनुरूप और सागरिका की कहानी सामने आई, तब पहली प्रतिक्रिया मिलीजुली थी। कहा गया कि आप जिस देश में रहते हैं वहां के नियम-कायदों का पालन तो करना ही पड़ेगा। दूसरे, इसके पीछे नस्ली भेदभाव का अंदेशा व्यक्त किया गया।




कहा गया कि नार्वे के कितने मूल निवासियों को आखिर इस तरह उनके बच्चों से अलग किया जाता है। कुल मिलाकर भारतीय मीडिया और जनमत बच्चों को अलग करने के खिलाफ दिखाई दिया। इसी दबाव का नतीजा था कि केंद्र सरकार बदले में नार्वे सरकार पर दबाव बनाने को विवश हुई। अब कहा गया है ऐसी सहमति बन गई है कि नार्वे की अदालत से गुजारिश की जाएगी कि बच्चों को अगर माता-पिता को न भी दिया जा सके तो कोलकाता में उनके चाचा को सौंप दिया जाए। ऐसा अभी हुआ नहीं है और जब वास्तव में बच्चों को असलियत में उन्हें सौप दिया जाए तभी इसे कामयाबी माना जा सकता है। इसकी वजह वे रिपोर्ट हैं जो बताती हैं कि किस तरह नार्वे में चाइल्ड वेलफेयर के नाम पर पूरा उद्योग चल रहा है और बच्चों को उनके परिवार से अलग करके फॉस्टर होम में रखने के पीछे
बाकायदा संगठित न्यस्त स्वार्थ हैं। चाइल्ड वेलफेयर सर्विसेज केनाम पर चल रहा संगठित उद्योग मरिएन हास्लेव स्कैनलैंड नार्वे में एक यूनिवर्सिटी प्रोफेसर हैं। वे उन बहुत कम लोगों में से हैं जो पिछले कई वर्षो से नार्वे या स्वीडन जैसे स्कैंडिनेवियन देशों में सीपीएस (चाइल्ड प्रोटेक्शन सर्विसेज) के बारे में लिखती आ रही हैं। वे बताती हैं कि इन देशों में यह महकमा इसी तरह काम करता है और इसके शिकार परिवारों या माता-पिता की गिनती हजारों में है। ऐसा भी नहीं है कि यह सुलूक केवल दूसरे देशों के प्रवासी परिवारों के साथ किया जाता है। नार्वे के अपने मूल निवासी भी कम नहीं हैं जिन्हें अपने बच्चों को फॉस्टर होम में भेजने की जिल्लत से गुजरना पड़ता है। अलबत्ता वहां परिवार नामक इकाई के पतन के साथ उनके लिए यह शायद उतनी बड़ी मानसिक यंत्रणा या विडंबना न होता हो, जितनी भारतीय या एशियाई परिवारों के लिए होती है।




मरिएन 2006 में तुर्की के एक प्रवासी परिवार की कहानी विस्तार से बताती हैं, जिसे भट्टाचार्य दंपती की तरह ही अपने दो बच्चों से जुदा होने की यंत्रणा से गुजरना पड़ा था। उन्हें नाकाबिल माता-पिता घोषित
करते हुए 2002 में उनके पांच और सात साल के दो बच्चों को फॉस्टर होम में रख दिया गया। उन्हें साल में एक या दो बार मात्र कुछेक घंटों के लिए उनसे मिलने की इजाजत थी। वह भी वे प्रारंभ में इसलिए नहीं मिल पाए क्योंकि उनके यहां तीसरा बच्च होने वाला था और इस आशंका में कि तीसरे बच्चे का जन्म होते ही उसे भी फॉस्टर होम में भेजा जा सकता है, वे उसकी हिफाजत के लिए तुर्की लौट गए थे। नतीजा यह हुआ कि फॉस्टर पैरेंट और सीपीएस के अधिकारियों ने उनके दोनों बेटों का इस तरह ब्रेनवॉश किया कि चार सालों के भीतर वे अपने मूल माता-पिता को न सिर्फ भूलने लगे, बल्कि
उन्हें दैत्य की तरह समझने लगे। एक बार जब वे अपने फॉस्टर पैरेंट के साथ किसी जगह पिकनिक मनाने गए और पता चलने पर उनके मूल तुर्क माता-पिता भी उनसे मिलने वहां पहुंच गए, तब उन्हें न सिर्फ मिलने नहीं दिया गया, बल्कि इस तरह पेश किया गया कि वे उन दो बच्चों का अपहरण करने आए थे, जिन पर उनका कोई वैधानिक या नैतिक अधिकार नहीं है। बड़े फायदे का सौदा है नार्वे में फॉस्टर होम चलाना मरिएन बताती हैं कि नार्वे में चाइल्ड प्रोटेक्शन सर्विसेज ऐसे परिवारों को अपना निशाना बनाती हैं जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं और अपना बचाव नहीं कर सकते। ऐसे माता-पिता से वे उनके बच्चों को अलग करके फॉस्टर होम में डाल देती हैं। वहां आम तौर पर लोग पीड़ित माता-पिता की बजाय सरकारी अधिकारियों का ही विश्वास करते हैं। वे मानते हैं कि जिनके बच्चों को फॉस्टर होम भेज दिया गया है, वे जरूर खराब और नाकाबिल माता-पिता होंगे और वे खुद अच्छे माता-पिता हैं तभी सरकारी कार्रवाई से बचे हुए हैं। आश्चर्य नहीं कि बच्चों को माता-पिता से अलग करने के इर्द-गिर्द वहां एक पूरा कारोबार खड़ा हो गया है, जिससे फायदा उठाने वालों की खासी बड़ी तादाद है। इनमें मनोचिकित्सक, सोशल वर्कर, फॉस्टर होम चलाने वाले परिवार और सरकारी अफसर व कारिंदे सब शामिल हैं। अखबारों में फॉस्टर पैरेंट बनने के लिए बाकायदे विज्ञापन निकाले जाते हैं। हरेक फॉस्टर पैरेंट को साल में 30,000 यूरो मिलते हैं। इसके अलावा उन्हें
घर बनाने और कार खरीदने जैसी जरूरतों के लिए भत्ते भी दिए जाते हैं। पेंशन की सुविधा अलग से। फॉस्टर बच्चों के लालन-पालन के लिए उन्हें अपने मूल काम या नौकरी में विशेष छुट्टियां भी मिलती हैं। इसी तरह सोशल वर्कर और मनोचिकित्सकों को इस उद्योग की बदौलत अतिरिक्त काम मिलता है। कानून, अदालतें और सरकारी प्रक्रिया भी ऐसी है जिससे इस पूरे व्यवसाय को बढ़ावा मिलता है। मान्यता यह है कि बच्चे सरकार की संपत्ति हैं और उनकी सही परवरिश सुनिश्चित करना सरकार का अधिकार और कर्तव्य है। अगर कोई माता-पिता सरकार के इस अधिकार पर सवाल उठाता है तो वह जरूर बच्चों की परवरिश के नाकाबिल है और उसके बच्चों को उससे जुदा किया जा सकता है। ऐसे में यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि अभिज्ञान और ऐश्वर्य को उनके चाचा को वास्तव में और जल्दी ही सौंप दिया जाएगा। हमारे यहां स्वीकार होगा बच्चों के लालन-पालन में सरकारी हस्तक्षेप हम भारतीयों के लिए नार्वे की इस कहानी में क्या सबक छिपे हैं? इसमें कोई संदेह नहीं कि महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा और अधिकारों के मामले में नार्वे व अन्य स्कैंडिनेवियाई देशों की स्थिति हमारे जैसे एशियाई देश ही नहीं, कई यूरोपीय देशों की तुलना में भी बेहद अच्छी है। सामाजिक मानकों के आधार पर हर साल जारी संयुक्त राष्ट्र की फेहरिस्त में ये देश शिखर के दस देशों में होते हैं, वहीं हम सबसे निचली पायदानों पर। क्या यह माना जाए कि सरकार की इस सख्ती के कारण ही वहां बच्चों व महिलाओं की सुरक्षा व अधिकारों से कोई छेड़छाड़ नहीं कर पाता?


हमारे देश में ही इतनी अलग-अलग आर्थिक हैसियत के परिवार हैं कि कई परिवारों में अमीरी और नाजायज लाड़-ह्रश्वयार के कारण बच्चे बिगड़ जाते हैं, जबकि दूसरी ओर बहुत बड़ी संख्या में ऐसे परिवार हैं जो अपने बच्चों को न्यूनतम जरूरी पोषक आहार भी मुहैया नहीं कर पाते। ऐसे में बच्चों की परवरिश के मानक तय कर पाना न सिर्फ मुश्किल, बल्कि अन्यायपूर्ण भी हो सकता है।
दूसरा पहलू लालन-पालन की संस्कृति का है। हमारे यहां परिवारों की आर्थिक हैसियत में कितना और कैसा भी फर्क क्यों न हो, बच्चों का माता-पिता से और मातापिता का बच्चों से भावनात्मक लगाव लगभग एक समान है। हमारी मुंबइया फिल्में ऐसे दृश्यों और प्रसंगों से भरी पड़ी हैं जब चाबुक बच्चे की पीठ पर पड़ता है तो जख्म मां की पीठ पर होते हैं और जब मां तकलीफों से गुजरती है तब बच्च उसके सुख के लिए जमीन-आसमान एक कर देता है। यह भावनात्मक जुड़ाव इतना गहरा है कि इसके सामने बच्चों की परवरिश में छोटी-बड़ी कमी, सुविधा और असुविधा, सुख और दुख गौण हो जाते हैं। तीसरा पहलू निर्विवाद रूप से ऐसा है जो भारतीय संस्कृति में कतई स्वीकार्य नहीं हो सकता। वह है पारिवारिक सामाजिक मामलों में सरकार और सरकारी एजेंसियों के हस्तक्षेप का। भट्टाचार्य दंपती की कहानी से
नार्वे में बच्चों की परवरिश में सरकारी हस्तक्षेप की जो कहानी सामने आई है, भारत में उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। भारतीय समाज और परिवार यह कतई स्वीकार नहीं कर सकता कि बच्चों के लालन-पालन में सरकारी एजेंसियां उस हद तक दखलंदाजी करें जिस हद तक वे नार्वे में करती हैं। हालांकि हमारे यहां भी जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन) एक्ट जैसा एक कानून है जिसके
प्रावधान कमोबेश वैसे ही हैं जैसे नार्वे में बताए जाते हैं। इस कानून के तहत चाइल्ड वेलफेयर कमिटियां भी बनी हुई हैं। एनसीपीसीआर (नेशनल कमीशन ऑफ प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स) जैसी एक संस्था भी हमारे यहां है, जिसका काम कमोबेश वही है जो नार्वे की चाइल्ड प्रोटेक्शन (या वेलफेयर) एजेंसी का है। गरीब और बेसहारा बच्चों को चाइल्ड केयर होम में ले जाकर रखने की कुछ शिकायतें भी इनके खिलाफ सामाजिक संगठनों द्वारा की जाती हैं। लेकिन बच्चों की परवरिश में सरकारी एजेंसियों का वैसा आक्रामक और हस्तक्षेपकारी रवैया हमारे यहां अभी तक सामने नहीं आया है, जैसा नार्वे में दिखाई देता है। भारतीय परिवारों और संस्कृति में वह स्वीकार्य और संभव भी नहीं दिखाई देता
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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