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लोरी

 
Source: अलका सिन्हा   |   Last Updated 11:26(06/02/12)
 
 
 
 
कानों में गूंजते हैं

स्वह्रिश्वनल शब्द, मोहक तान


बहुत कोशिश करती हूं दोहराने की

वही सुर-ताल, वही गीत


कि मेरी नन्ही गुड़िया भी जिसे सुनकर


मधुर सपनों में खो जाए..


मैं मूंदती हूं आंखें


साधती हूं शब्द


आत्मसम्मान की खोज में


उठते कदमताल के साथ


तस्वीर सी उभरती है -


फ़ायदे-नुकसान का बजट


दिन भर के ताने और थकन।

गुज़रती है लोरी


घिसी एड़ियों के दर्द से


जि़मेदारियों के टंगे थैले से -


पीड़ित और उदास..



सहलाती लोरी के कंठ से


फूट पड़ता है प्रलाप



चूम-चूम पलकों को टोहती हूं



कुछ मीठे शब्द, कोमल भाव..



पर सच्चे मोती,



तुझे झूठा गीत कैसे दूं?



मेरे पास तो है उत्पीड़न और तड़प



मैंने जो गीत बुना



प्रताड़ित फंदों का



तेरे कानों में पिघलते सीसे-सा उतर चला



तो उतर जाने दे


उठ, मेरी बच्ची!



समय बहुत आगे बढ़ चला,


अब लोरियां सुनकर सोया नहीं जा सकता।


जाग, आत्मसात कर खुद को


कि तू उत्पीड़न के गर्भ से फूटी


आशा की कोपल है


ले, मेरा दर्द ले,


मेरी कुंठाएं


मेरी आकांक्षाएं ले..
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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