अब तो तेरा चेहरा भी मुझे याद नहीं
Source: dainikbhaskar.com | Last Updated 11:47(06/02/12)
स्मृति के संचित कोषों में महक रही फुलवारी
तुम आओ ना आओ, आएगी याद तुम्हारी
दूर-दूर तक ख़ुशबू फैली, लगे यहां पर मेले
सिमट रहा जग सारा, हम तनहा रहे अकेले।
कृष्णमुरारी चतुर्वेदी, बूंदी (राज)
ऐ ज़िंदगी बेशक कोई तेरे बाद नहीं
अब तो तेरा चेहरा भी मुझे याद नहीं
दिल को गर हुई कभी महसूस कमी तेरी
समझा लूंगा उसे ये बस्ती आबाद नहीं।
अमर मलंग, कटनी (मप्र)
सांझ अपने कटोरे में हर रोज़ ये सूरज डुबोता है,
लेकर उधार चांदनी मयंक सहर को नूर खोता है
पर मिट जाते हैं जो रोशन कर जाते हैं जग सारा
अंकुर तभी फूटता है जब बीज वजूद खोता है।
इंद्र भंसानी, जयपुर (राजस्थान)