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फ़िरंगी चिश्ती बेगम और रहस्यमयी ख्वाब

 
Source: जाहिदा हिना   |   Last Updated 12:01(06/02/12)
 
 
 
 
मझे साल भर किताबों की उस नुमाइश का इंतज़ार रहता है, जिसका आयोजन ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस करता है। इंतज़ार की वजह यह है कि इसमें हिंदुस्तान के ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी
प्रेस की छापी हुई किताबें भी आती हैं। दोनों मुल्कों के दरमियान किताबों की आमदोऱफ्त पर ऐसी पाबंदी है जैसे वो बम के गोले हों जो किसी भी व़क्त फट जाएंगे। शायद इसलिए कि किताबें नए ख़यालात का ख़ज़ाना होती हैं और इस ख़ज़ाने से उन लोगों को डर लगता है जो पुरानी रवायतों से चिपके रहना चाहते हैं।



कुछ दिनों पहले ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस की नुमाइश में एक किताब ‘द लैंप ऑफ लव’ नज़र आई जो एक ऑस्ट्रेलियाई ख़ातून उम्मतुल्लाह आर्मस्ट्रॉन्ग चिश्ती ने लिखी थी। मुझे हैरत हुई कि अरबी
और अंग्रेज़ी नामों के साथ हिंदुस्तान के मशहूर चिश्ती सिलसिले का नाम भी जुड़ा हुआ था।



किताब खरीदकर लाई और पढ़ा तो मालूम हुआ कि ये ‘चिश्ती बीबी’ ऑस्ट्रेलिया के एक ईसाई घराने में पैदा हुई थीं। उन दिनों वो ऑस्ट्रेलिया के दक्षिणी सहारा इलाक़े में थीं जब उन्होंने एक ख्वाब
देखा। ख्वाब यह था कि वो एक हुजूम के बीच हैं और एक श़ख्स कुछ गा रहा है। वो उन अल्फ़ाज़ को समझ न पाईं, लेकिन उस गीत ने उनके दिल को छू लिया और ये अंदाजा हुआ कि ये तुर्की या फ़ारसी का कोई गीत है। इस आवाज़ के साथ ही उस श़ख्स ने उन पर गहरा असर किया, लेकिन वो अपने इस ख्वाब को समझ न पाईं। कई बरस बाद किसी ने उन्हें पाकिस्तान के ग़ुलाम फ़रीद साबरी
क़व्वाल की सीडी दी। उन्होंने उसे देखा तो वो सोचती रह गईं कि यह मंज़र उन्होंने कहां देखा है, यह आवाज़ पहले भी सुनी है और यह श़ख्स जो गा रहा है उसे वो जानती हैं। लेकिन यह मुमकिन नहीं था, क्योंकि उन्होंने कभी पाकिस्तान में क़दम भी नहीं रखा था, कभी उस श़ख्स से नहीं मिली थीं जो क़व्वाली गा रहा था और सीडी पर जिसका नाम ग़ुलाम साबरी लिखा था। खोज की तो मालूम हुआ कि उन्होंने क़व्वाली का जो मंज़र देखा था वो उस क़व्वाली का था जो फ़रीद साबरी ने कराची की सबसे मशहूर दरगाह अब्दुल्लाह शाह ग़ाज़ी पर गाई थी और इसके बोल 700 साल पहले गुज़र चुके अमीर ख़ुसरो के थे। वो सोचती रहीं कि यह कैसे मुमकिन है कि जिस जगह को उन्होंने देखा न हो, जिस श़ख्स से मिली न हों, वो देखा हुआ और पहचाना लगे। फिर उन्हें याद आया कि यह सब उन्होंने ख्वाब में देखा था। ये एक नाक़ाबिले-यक़ीन बात थी जिसने फिर उनकी ज़िंदगी बदल दी। उन्होंने ईसाइयत छोड़ दी और अपना नाता तसव्वुफ़ से जोड़ा और ग़ुलाम साबरी की खोज में लग गईं। उन्होंने छानबीन की तो यह ख़बर सुनकर उन्हें निहायत सदमा लगा कि ग़ुलाम फ़रीद साबरी इस दुनिया से रुख़सत हो चुके हैं और अब उनके भाई रह गए हैं। ‘बीबी चिश्ती’ की लगन और तड़प ऐसी थी कि वो साबरी ख़ानदान से मिलने के लिए रवाना हो गईं और कराची पहुंचीं जहां यह ख़ानदान रहता है। मरहूम ग़ुलाम फ़रीद साबरी को वो अपना मुर्शद मान चुकी थीं। लिहाज़ा उनके ख़ानदान से मिलना और उस कमरे में रहना, जहां ग़ुलाम फ़रीद साबरी ने अपनी ज़िंदगी के दिन गुज़ारे थे, उनके लिए एक रूहानी तजुर्बा था।



ग़ुलाम फ़रीद के बाद उनके छोटे भाई मक़बूल अहमद साबरी अपनी क़व्वाल पार्टी के सरबराह हो गए थे। उन्होंने और उनके ख़ानदान ने ‘चिश्ती बीबी’ को बहुत एहतराम से अपने घर में रखा और अपने सबसे
छोटे भाई महमूद साबरी को उनके साथ कर दिया। वो चिश्ती बीबी को पाकिस्तान की तमाम बड़ी दरगाहों की ज़ियारत करवाते हुए हिंदुस्तान ले गए जहां उन्होंने दरगाह निज़ामुद्दीन औलिया की जियारत की, क़व्वालों से अमीर ख़ुसरो के कलाम सुने और रूहानी तजुर्बो से दो-चार हुईं। इसके बाद वो अजमेर शरीफ़ गईं जहां उन्होंने मुईनुद्दीन चिश्ती अजमेरी की उस दरगाह पर हाज़िरी दी जहां से चिश्तिया सिलसिला शुरू हुआ था। वो क़व्वाली की अलग-अलग महफ़िलों में शरीक हुईं और देखा कि ये हिंदुस्तान का वो इलाक़ा है जहां दरगाहों पर हिंदू और मुसलमान खिंचे चले आते हैं। अमीरी और ग़रीबी का फ़र्क़, ज़बानों और
अक़ीदों का फ़र्क़ यहां मिट जाता है। क़व्वाली के बोल, तबले, सारंगी और दूसरे साज़ों की आवाज़ सुनने वालों को किसी और ही दुनिया में ले जाती है।



‘बीबी चिश्ती’ की ये किताब एक ऐसा प्रेम का धागा है जिसमें पाकिस्तान और हिंदुस्तान की चिश्ती दरगाहें पिरोई हुई हैं। इन दरगाहों में अमीर, फ़क़ीर, हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, सभी नज़र आते हैं। यह शानदार रिवायत हमारे उपमहाद्वीप की शान है। यह ह्रश्वलूरिज्म या बहुलतावाद, जिसका सारी दुनिया में ज़िक्र होता है, अगर किसी को देखना हो तो हमारी दरगाहों पर देखे। जहां तक देखने वाली बात है, हमारे यहां आज भी कैसे-कैसे क़बीले आबाद हैं और वो दुनिया से कितने अलग हैं। हमारे हंसीनतरीन इलाक़ों में एक चितराल है। इससे कुछ ही फ़ासले पर वादी-ए-कैलाश है, जहां के रहने वाले लोग ‘कैलाशा’ कहलाते हैं। कहते हैं कि उनके पुरखों का ताल्लुक़ यूनान से था और वो सिकंदर-ए-आज़म की नस्ल से हैं। वादी में मुसलमान और ख़ुदा को न मानने वाले दोनों तरह के लोग रहते हैं। इनमें ज्यादा तादाद उन लोगों की है जो ख़ुदा को नहीं मानते। इसी वजह से इस इलाके को काफ़िरिस्तान भी कहा जाता है। कैलाशा औरतें ख़ास क़िस्म का काला रिवायती लिबास पहनती हैं और उनके बालों से रस्सियां लटक रही होती हैं। औरतों के गले में पहना जाने वाला ज़ेवर भी ख़ुद उनका तैयार किया हुआ होता है। यहां रहने वालों की रिवायात दुनिया के किसी भी दूसरे क़बीले में नहीं मिलतीं। यहां जब कोई बच्च पैदा होता है तो बहुत ज्यादा पकवान बनते हैं और मर्द व औरतें इकट्ठे रिवायती नृत्य करते हैं। दूसरी तरफ़ जब यहां किसी की मौत हो जाती है तब भी लोग ख़ुशी का इज़हार करते हैं।



पकवान बनते हैं और दूर-दूर से रिश्तेदार और हमदर्दी जताने वाले आते हैं। कैलाश में रहने वाले कैलाशा लोगों का मानना है कि जिस तरह पेड़ का पत्ता टूटने के बाद पेड़ से जुदा हो जाता है और दोबारा कभी नहीं जुड़ सकता, उसी तरह जब इनसान मरता है और अपने बहन-भाइयों और रिश्तेदारों से जुदा हो जाता है तब वो दुनिया से ज्यादा अच्छी जगह पहुंच जाता है, इसलिए उसके जाने पर ख़ुशी मनाना चाहिए। लड़के या लड़की की मौत के बाद कैलाश की तीनों वादियों में ऐलान किया जाता है कि फ़लां का बेटा या बेटी ख़त्म हो गई है, जिसके बाद वादियों के लोग मौत वाले घर पहुंचते हैं। मय्यत को उस व़क्त तक द़फ्न नहीं किया जाता जब तक सभी रिश्तेदार मरने वाले का चेहरा न देख लें। अगर किसी अमीर ख़ानदान में मौत हो जाए तो वो ख़ानदान मौत की रस्में चार दिनों तक करता है और अगर किसी ग़रीब ख़ानदान में मौत हो जाए तो ये रस्में तीन दिनों की होती हैं। इस दौरान गाने गाए जाते हैं और नृत्य किया जाता है। पकवान तैयार किए जाते हैं जिन्हें पुरसे के लिए आने वालों को पेश किया जाता है।
एक और बात क़ाबिले-ज़िक्र है : कैलाश क़बीले में मर्द की मौत पर नृत्य किया जाता है जबकि औरत की मौत पर नृत्य नहीं किया जाता, न ही गाने गाए जाते हैं।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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