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वही है!

 
Source: कर्तार सिंह दुग्गल   |   Last Updated 16:59(07/02/12)
 
 
 
 

गाड़ी आने में अभी आध घंटा था। मालती को अपने आप पर क्रोध आने लगा। फिर वह समय से इतना पहले स्टेशन पर पहुंच गई थी। जब उसे कहीं जाना होता, घर में वह एड़ी न लगने देती। हमेशा आध-पौन घंटा पहले ही स्टेशन पर पहुंच जाती। और यूं जब वह बोर होने लगती, हमेशा दिल ही दिल में फै़सला करती कि अगली बार वक्त पर आएगी। ज्यादा से ज्यादा पांच-दस मिनट पहले। लेकिन फिर जब उसे सफ़र करना होता, स्टेशन पर पहुंचकर उसे पता चलता कि वह तो पौन घंटा, घंटा पहले पहुंच गई है।

 

आज तो सितम जरीफ़ी यह थी कि गाड़ी पर जाना उसके घरवाले ने था, वह दफ्तर से अभी पहुंचा नहीं था, यह घर से उसका सामान लेकर पहले आ मौजूद थी। जिसे गाड़ी पर चढ़ना था, वह तो दूर-दूर नहीं था और पहुंचाने वाली पहले ही उपस्थित थी। खड़ी-खड़ी थक रही मालती को लगा जैसे पलेटफॉर्म की भीड़ में कोई आंखें, उसकी पहचानी-पहचानी हों। नहीं, इस शहर में उसका परिचित कोई नहीं। मालती कुली के बाजू पर बंधे उसके नंबर को फिर पढ़ने लगी। किंतु नहीं, यह तो कोई उसका परिचित ही लगता था।

 

बार-बार उसकी ओर झांक रहा था। परिचित कहां होगा! होगा कोई जिसके दिल के किसी तार को उसने छेड़ा होगा। मालती ने अपने रेशमी बालों को हाथ लगाकर देखा, उसके कंधों पर जैसे नाच रहे हों। तीन बच्चों की मां हो गई। तो क्या! अभी भी जहां वह बैठ जाती, जिधर से वह गुजर जाती, उसकी कहानियां शुरू हो जातीं। लेकिन एक हसरत थी। एक कसक उसके दृश्य के किसी कोने में छिपी पड़ी थी। उसने उसके साथ छल किया था। उसने। पहली मोहब्बत का दर्द कैसा होता है। अभी तक यह टीस उसने संभाल-संभाल रखी थी..।

 

लेकिन ये किन विचारों में वह बहे जा रही थी? उसका पति सुंदर, सजीला। लाखों का उनका व्यापार है। तीन बच्चे हैं उनके। दो बेटे और एक उनकी बहन। चांद जैसे। खुश-खुश, हंसता-हंसाता घर है। और आज यह कौन उसे याद आ रहा है? कौन? शायद वही है। बिट-बिट उसकी ओर देख रहा। खंभे से सटकर खड़ा है। ह्रश्वलेटफॉर्म पर ड़ कितनी बढ़ गई है। जिस किसी को बंबई जाना होता है, फ्रंटियर मेल की ही सोचता है। इसलिए कि यह ट्रेन वक्त कम लेती है। सफ़र में दो घंटे बचा लेंगे और बंबई पहुंचकर टैक्सी के लिए क्यू में चाहे तीन घंटे खड़े रहें।

 

मालती सोचते-सोचते मुस्कराने लगी। उसका चेहरा खिल-सा गया। फिर उनकी नजरें मिलीं। कोई जानापह चाना था। इस शहर में कौन हो सकता है? इस शहर में आए उनको कुछ महीने ही हुए थे। ठेकेदारी के झमेले, उसके पति को अभी फ़ुरसत ही नहीं मिली थी कि क्लब के वे मेंबर बन सकें। हर चौथे रोÊा तो उसे बाहर माल लेने जाना होता है। इस शहर में उनका कोई परिचित नहीं हो सकता।.. कैसे उसने इसे छोड़ा था। वह भी मालती की सहेली के लिए! अपनी महबूबा की सहेली से प्रेम करने लगा था।

 

एक नजर उसने इसे देखा और उसका दिल भरमा गया। मालती ने अपनी आंखों देखा था। उसकी आंखें तो उसे धोखा नहीं दे सकती थीं। तौबा! इतनी बदतमीजी! इतनी बेवफ़ाई! वही है शायद। एकटक उसकी ओर देखे जा रहा है। जैसे नÊारों ही नजरों से कोई किसी को बींध रहा हो। मालती पसीना-पसीना हो गई। उसे डर लगा। उसने पलकें उठाईं तो उनकी नजरें आपस में टकरा जाएंगी। यह कैसा उसे महसूस हो रहा है। उसे लगा जैसे उसने तो उसकी समूची मोहब्बत कहीं संजो रखी हो। दीवानी औरत! नहीं, वह नहीं। अब उसकी मालती की ओर पीठ थी। रेलवे के किसी कर्मचारी से कुछ पूछ रहा था। और मालती ने उसकी ओर ध्यान से देखा। वह नहीं हो सकता। वह तो हमेशा कोट-पतलून पहनता था।

 

यह आदमी तो शेरवानी पाजामे में है। वह नहीं हो सकता। इस आदमी का क़द जरा लंबा है। लेकिन हाथ उस जैसे हैं। नर्म, नाजुक, लंबी-लंबी कोमल उंगलियां। किसी कागज के टुकड़े पर कुछ लिख रहा है। नहीं, वह नहीं हो सकता, इसके हाथ में तो हिंदी का अख़बार है। उसे हिंदी नहीं आती थी। उसने तो उर्दू पढ़ी थी। मालती की नÊारें एकदम फ़र्श पर गड़ गईं। कर्मचारी से निबटकर वह फिर उसकी ओर झांक रहा था। मालती को याद आया, कैसे एक शाम यूं ही उसके बालों की एक लट उसके मुंह पर पड़ी रही थी और उसने पहली बार बालों समेत उसके होंठो को चूम लिया था। बालों का दीवाना। फिर उसकी मुलाक़ात इसकी सहेली मिन्नी से हुई। एक नजर में उसका दीवाना हो गया। मेमने की तरह उसके पीछे-पीछे फिरने लगा। गंवार। आदमी की कोई गै़रत भी होती है। आंख की कोई शर्म भी होती है। शायद मिन्नी के बाल ही उसे पसंद आए थे। कितना भारी जूड़ा उसका बनता था। यूं उसका रंग तो सांवला था।

 

अब कैसे इसकी ओर झांक रहा है। गोरी चिट्टी मालती की बांहें। स्लीवलैस लाउज पहनकर मालती को लगता जैसे वह नंगीसी हो। ये फैशन सांस नहीं लेने देते। आगा ढके तो पीछा खाली छोड़ दे। पीछा ढके तो आगा अनढका। ये आजकल की लड़कियां। क्यों, आजकल की लड़की तो मालती भी है। उसका क्या बिगड़ा है? मालती सोचती, अभी , अभी भी उसके लिए कोई नहर खोद सकता है, कोई कान छिदवा सकता है। औरत का कभी कुछ नहीं बिगड़ता, यदि वह खुद हार न मान ले जिंदगी से। लेकिन अगर वह है तो आगे बढ़कर इसका हाथ क्यों नहीं पकड़ लेता, जैसे वह कभी किया करता था। घंटों इसकी उंगलियों के साथ खेलता रहता। जितनी देर इनके यहां रहता, मालती का हाथ उसके हाथ में होता। मालती को खीझ आने लगी। अगर वही है तो आगे बढ़कर क्यों नहीं कहता - हॅलो मालती, मेरी जान! मालती के कानों में कई बरस पहले सुने उसके बोल गूंज रहे थे। फिर मालती बेचैन होने लगी। अगर वह है तो आगे क्यों नहीं बढ़ रहा। इसके पति के आने का समय हो रहा था। किसी क्षण वह आ सकता है। मालती सिर से पांव तक कांप गई। यह न सोच रहा हो कि गाड़ी में सफ़र करते हुए मिलेगा। गाड़ी में तो उसका पति जा रहा था। वह तो बस गाड़ी पर चढ़ाने आई थी।

 

कितनी महीन साड़ी आज शाम उसने पहन रखी थी। बेशक गर्मी थी लेकिन इतना भी क्या! जितना वह अपने आप को लपेटलपेट कर रखती, उतना ही उसे महसूस होता जैसे वह अनढकी हो। आज उसने ह्रश्वयाजी रंग की साड़ी पहनी हुई है। ह्रश्वयाजी रंग उसका प्रिय रंग था। फिर मालती का दिल कहता, वह नहीं हो सकता। वह होता तो कभी का उसके पास आ चुका होता। ह्रश्वयाजी रंग तो उस पर जादू कर देता था। वह नहीं हो सकता। वह नहीं हो सकता। वह होता तो कभी का आकर उससे बातें कर रहा होता। बातों का शौक़ीन। यूं झिझकने वाली, यूं शरमाने वाली वह आसामी नहीं। वह नहीं हो सकता। मालती को यक़ीन होता जा रहा था।

 

ज्यूं-ज्यूं गाड़ी के आने का समय हो रहा था, ह्रश्वलेटफॉर्म पर गहमागहमी बढ़ रही थी। खोमचे वालों की आवाजो ऊंची हो रही थीं। कुली दौड़ रहे थे। यात्रियों की चाल में तेजी आ गई थी। लोग एक दूसरे से लिपट-लिपट कर मिल रहे थे। मालती ने नजरें उठाकर देखा। इस ओर अब उसकी पीठ थी। मालती देखती रह गई। दूर बेंच के पास कोई खड़ी थी। भारी जूड़ा, रंग इतना साफ़ नहीं। वह एकटक उसकी ओर देख रहा था। दो मिनट, चार मिनट, दस मिनट। कैसे अपलक उसकी ओर देख रहा था। मालती को जैसे भूल ही गया हो। एक बार भी तो उसने इसे पलटकर नहीं देखा। वही है। मालती को विश्वास हो गया। वही है।

 

फिर मालती का पति आ गया। गाड़ी के आने में पांच मिनट बाक़ी थे। मालती के पति के साथ उसका मुंशी था। मालती का जी चाहा कि मुंशी जी को भेजकर पुछवाए कि क्या उसका नाम मधुसूदन है। मधुसूदन - रावलपिंडी वाला? लेकिन फिर मालती के दिल ने कहा - काहे को? उसे यक़ीन था कि वही है। मालती की ओर पीठ किए दूर बेंच के पास खड़ी, नई आई सवारी की ओर एकटक

 
 
 
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