एक फांसी की त्रासदी दोनों तरफ़ दर्द का रिश्ता
जाहिदा हिना
| Apr 15, 2012, 12:29PM IST

भुट्टो की फांसी की बात करते हुए बेसा़ख्ता शहीद भगत सिंह की फांसी याद आ जाती है। ये वो फांसियां हैं जिन्होंने हमारे उपमहाद्वीप के लोगों के दिलों को हिलाकर रख दिया था। भगत सिंह को ब्रिटिश राज ने फांसी की सजा सुनाई जबकि भुट्टो को उनके अपने लोगों के हाथों फांसी दी गई और आज तक ज्यूडिशियल मर्डर (न्यायिक हत्या) के नाम से याद की जाती है।
भुट्टो साहब को फांसी की सजा सुनाई गई तो उसका अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारी विरोध हुआ। बहुत-सी आलमी श़िख्सयतों और संस्थानों ने फांसी की सजा को ख़त्म करने की अपील की। आलमी इदारों में संयुक्त राष्ट्र, कैनेडियन पार्लियामेंट और एमनेस्टी इंटरनेशनल सबसे ऊपर रहे, जबकि लीबिया के सदर क़ज़ाफ़ी, शाम (सीरिया) के हाफ़िज अलअसद, ईरान के शाह, तुर्की के सदर और वजीरेआजाम, सूडान के सदर नमीरी, संयुक्त अरब अमीरात के सदर शेख़ ज़ैद, रूमानिया के सदर, तंजनिया के न्येरेर, यूनान के वजीरे आजम, दक्षिणी यमन के सदर, सऊदी अरब के शाह ख़ालिद, फिलिस्तीनी रहनुमा यासिर अराफ़ात, बुजुर्ग रहनुमा आचार्य कृपलानी, श्रीलंका की पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती भंडारनायके इनके अलावा कुवैत, बहरीन और क़तर की हुकूमतों ने भी रहम की अपील की। लेकिन उस वक़्त के डिक्टेटर जनरल जिया उल हक़ के कान पर जूं तक नहीं रेंगी और उसने भुट्टो को फांसी के फंदे तक पहुंचाकर ही दम लिया।
वो वक्त जो पाकिस्तान के करोड़ों लोगों पर एक काली लंबी अंधेरी रात बनकर गुÊारा, उस व़क्त हिंदुस्तान के साहित्यकार और पत्रकार भी पाकिस्तान पर गुÊारने वाली यह दर्दनाक कहानी लिख रहे थे। उस जमाने में दिल्ली से उर्दू की एक शानदार पत्रिका ‘शऊर’ छपती थी, जिसके एडिटर उर्दू के मशहूर अदीब और शायर बलराज मेनरा थे । उन्होंने ‘शऊर’ का छठा शुमारा भुट्टो की फांसी को समर्पित कर दिया। इस ख़ास अंक के लिए
हिंदुस्तान के एक मशहूर शायर और अदीब शमीम हनफ़ी ने एक ख़ास दस्तावेज़ तैयार किया जिसे ‘ज़ुंदां में रात हो गई’ के नाम से बलराज मेनरा ने छापा। इस दस्तावेज़ मे हिंदुस्तानी अखबारों की कतरनें, पाकिस्तानी शायरों की नज़्में, एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्टे और भुट्टो की किताब ‘अगर मुझे क़त्ल कर दिया गया’ की क्लिपिंग्स शामिल थीं। उस वक्त भारत के एक प्रमुख अंग्रेजी अखबार ने लिखा कि ‘अख़बार
हाथो-हाथ बिक गए, लोग सड़कों के किनारे खड़े रह गए थे, पान की दुकानों पर भीड़ लगी थी, पनवाड़ियों ने अपने हाथ रोक लिए थे, टैक्सी वालों ने कहीं आने जाने से इंकार कर दिया था। उस शाम से पहले वाली शाम को बेमौसम की बारिश हुई थी। लोगों को यक़ीन नहीं आया। जयप्रकाश नारायण की मौत की खबर झूठी निकली थी, हो सकता है यह भी झूठ निकले। फिर रेडियो से ऐलान हुआ तब लोगों को यक़ीन आया।
हजारों लोगों का जुलूस पाकिस्तानी दूतावास के सामने जा पहुंचा। नारे, शोर-शराबे, हंगामा। दूतावास के कारकून पथराई आंखों से यह मंÊार देख रहे थे और चुप थे। ‘अलजमीयत’ दिल्ली और ‘ब्लिट्Êा’ मुंबई और दूसरे हिंदुस्तानी अखबारों में अप्रैल 1979 की तारीखों में भुट्टो की Êिांदगी और फांसी से जुड़ी खबरें और विश्लेषण छपते रहे। एक हिंदुस्तानी अख़बार ने लिखा कि दुनिया के अहमतरीन नीतिकारों में से एक आम मुजरिमों की तरह मौत के घाट उतार दिया गया। दूसरे ने भुट्टो के दफ़न को ‘मुफ़लिस का दफ़न’ लिखा। और एक प्रमुख अंग्रेजी अखबार में 5 अप्रेल 1979 को छपा : ‘उनकी बीवी और बेटी को जनाÊो में शिरकत की इजाÊात नहीं मिली। चचाÊाद भाई को हवाइअड्डे पर रोक लिया गया। पहले तो उनके साथी यह खबर सुनकर पत्थर की तरह हो गए, फिर वो लियाक़त पार्क में जमा हुए। औरतें अपना सीना कूट रही थीं और बेज़ार रो रही थीं पुलिस ने लाठी चार्ज करके भीड़ को बिखेर दिया।’ भुट्टो की फांसी पर सारे पाकिस्तान में प्रदर्शन हुए और प्रदर्शनकारियों पर जो गुÊारी उसकी रिपोर्ट एमनेस्टी इंटरनेशनल ने छापी। ये सिलसिला 1978 में शुरू हुआ और 1981 के शुरू में इसमें तेÊाी आ गई। इन शिकायतों का निशाना फ़ौज भी है और पुलिस भी। - दस क़ैदी जिनमें से तीन सियासी क़ैदी थे टार्चर के नतीजे में 1980 और अगस्त1981
में मार दिए गए। अब ऐसे क़ैदियों में छात्र भी हैं और सियासी जमातों के कारकुन और ट्रेड यूनियनिस्ट, पत्रकार, वकील भी, जिनमें औरतें भी हैं; - क़ैदियों को छत से उल्टा लटका दिया जाता है घंटों उन्हें इसी हाल
में पीटा जाता है;
-तलवों, घुटनों, टखनों और सिर पर लगातार चोटें लगाई जाती हैं;
-बिजली के शॉक लगातार दिए जाते हैं;
-जलती हुई सिगरेटों से कै़दियों को जगह जगह दाग़ा जाता है;
-कै़दियों को लकड़ी के पंजों पर लिटा दिया जाता है फिर उनके पैरों पर
भारी रोलर चलाए जाते हैं;
-क़ैदियों के बाल खींचे जाते हैं;
-देर-देर तक क़ैदियों के कानों में पुरशोर, ख़ौफ़नाक आवाÊों उंडेली
जाती हैं;
-क़ैदियों को मौत की धमकी दी जाती है उन्हें ख़ौफ़ दिलाया जाता है
कि उनके रिश्तेदारों या घरवालों को सजा दी जाएगी;
पांच-पांच दिन तक क़ैदियों को सोने नहीं दिया जाता और छत्तीस-छत्तीस घंटों तक उन्हें
भूखा रखा जाता है।
भुट्टो की नाजायज सज़ा-ए-मौत के बारे में टिह्रश्वपणी करते हुए एक ग़ैरमुल्की दानिश्वर ने क हा था कि मैदाने जंग के बाद इंसानियत के ख़िलाफ़ संगीनतरीन जुर्म का सबसे ज्यादा उल्लंघन क़ानूनी अदालतों ने किया है। शमीम हनफ़ी एक हिंदुस्तानी अदीब और दानिश्वर हैं, जिन्होंने ‘ज़ुंदां में रात हो गई है’ लिखी। उन्होंने जनरल जिया उल हक़ के पाकिस्तान में Êामीर के कै़दियों का नक़्शा खींचते हुए लिखा था :
‘रात के अंधेरे में दरवाजो पर दस्तक होती है, फ़ौजी कारिंदे आते हैं और लोगों को पकड़ कर ले जाते हैं। उनकी सजा क़ैद तन्हाई या फिर कोड़े या फिर तकलीफ़ें दी जाती हैं। उनमें कुछ चुपचाप मर जाते हैं और कुछ अपाहिज हो जाते हैं। बदन पर जलती हुई सिगरेटों से दाग़ने की वजह से जा़ख्म, उन्हें छत से उल्टा लटका दिया जाता है, पैरों.. तलवों पर लगातार चोटें लगाई जाती हैं। बिजली के झटके दिए जाते हैं। नाख़ून खींच लिए जाते हैं। वो किसी भी अदालत में अपनी सफाई पेश नहीं कर सकते। जेलखाने भरे पड़े हैं, बहुत-सी हवेलियां और घर जेल में बदल दिए गए हैं। टॉर्चर केंपों में अब गुंजाइश नहीं बची है। फिर भी लोग आए दिन सड़कों पर निकलते हैं और मार खाते हैं।’ इन लाइनों को पढ़ते हुए और उस ज़माने के अख़बारों पर नÊार डालिए तो अंदाज होता है कि जम्हूरियत में Êिांदगी गुजरने वाले हिंदुस्तानियों ने डिक्टेटरशिप के ज़ुल्म सहने वाले
पाकिस्तानियों के ग़म में किस तरह शिरकत की थी। दर्द का यह रिश्ता हमारे बीच हमेशा मौजूद रहा है और यही रिश्ता दोनों मुल्कों के अवाम को एक दूसरे से जोड़ता है। जब भी हमारे मुल्कों के बीच तनाव पैदा हुआ तो उस वक़्त दर्द का यही रिश्ता था जिसने इस तनाव को अपनी इंतहा तक नहीं पहुंचने दिया। इस रिश्ते की हमें जी जान से हिफ़ाजत करनी ही चाहिए।
ई-1, जुनैद, राशिद मिन्हास रोड, गुलशन-ए-इक़बाल,
ब्लॉक-6, कराची-75300 (पाकिस्तान)







