विज्ञापन
 
 
 
 

पर कटी उड़ान

 
Source: दिनेश भट्ट   |   Last Updated 23:27(07/08/11)
 
 
 
 
वह जून की उबलती हुई गर्मी का दिन था। मनीष तेजी से घर की ओर लौट रहा था। गर्माते आसमान में भी उसे हवा की खुनक, चिड़ियों का संगीत और फूलों की महक का अहसास हो रहा था। घर पहुंचने की उत्कंठा से उसमें ऊर्जा का इतना आवेग लग रहा था जैसे आसमान को छू लेगा। वह बहुत खुश था।

इस अपार खुशी की वजह यह थी कि इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिले के लिए दी गई परीक्षा में वह अच्छे अंकों से सफल हुआ था। अब उसे इसी शहर में नहीं, इंदौर-भोपाल में पढ़ना था और इंजीनियर बनकर दिल्ली-मुंबई-बेंगलुरू जैसे किसी महानगर में किसी बड़ी कंपनी में नौकरी करनी था।

उसे लगा घर जाने से पहले विवेक और रीतेश को यह खुशखबरी देनी चाहिए। दोनों शक्ति नगर की एक गली में रूम लेकर रहते हैं।

कमरे में उनका तीसरा रूम पार्टनर मिला। उसने बताया कि वे पाटनी कॉम्पलेक्स की शॉप नंबर चौदह में आधार इंवेस्टमेंट में नौकरी कर रहे हैं।

मनीष का माथा ठनका। यह कैरियर बनाने का समय है। ये भला कौन-सी नौकर करने लगे। अब तो इनसे जरूर मिलना पड़ेगा।

आधार इंवेस्टमेंट के ऑफिस में घुसते ही मनीष को एसी की ठंडक मिली। बाहर अंगारे बरस रहे थे। वह वेटिंग कुर्सी पर बैठ गया और प्यून को विवेक-रीतेश को बुलाने लिए कहा।
एकदम आधुनिक केबिन से निकलकर रीतेश आया था। उसने स्काय ब्लू शर्ट पर कत्थई धारीदार टाई लगा रखी थी जो काली पतलून पर शानदार लग रही थी। काले-जूते शीशे की तरह चमक रहे थे। सत्रह-अठारह साल के रीतेश का रंग सांवला था और नक्श भी खास अच्छे नहीं थे मगर उसकी आंखों में अजब बेबाकी नजर आ रही थी।

मनीष के चेहरे पर व्यंगात्मक हंसी उभरी - साला ये गंवई तो बिल्कुल अफसर लग रहा है।

रीतेश के कान में मोबाइल डटा हुआ था और वह बात करने में मशगूल था। उसी अंदाज में वह मनीष के पास आया, हाथ मिलाया और बाजू वाली कुर्सी पर बैठ गया। एक मिनट कहकर उसने मनीष से मोहलत मांगी। जेब से एक कागज निकाला। उसमें लिखे बहुत सारे टेलीफोन नंबरों में से एक डायल करना शुरू किया।

बीच-बीच में उसके झल्लाने के तरीके से लग रहा था कि आठ-दस डायल में उसे तवज्जो नहीं मिली थी। एक कॉल में हैलो की आवाज उभरी तो उसने स्पीकर ऑन कर बोलना शुरू किया।

‘हैलो, मनोज श्रीवास्तव जी बोल रहे हैं..?’

‘हां, बोल रहा हूं।’

‘सर, मैं मोबाइल फोन कंपनी से बोल रहा हूं। सर, एक योजना के तहत आपका रेंडमली चयन हुआ है। आप एक लाख का इनाम जीत रहे हैं। आपको कल सुबह दस-बजे पाटनी कॉम्पलेक्स की शॉप नंबर चौदह में अपनी पत्नी के साथ आना है। यहां आपको सब कुछ समझा दिया जाएगा। आप आ रहे हैं न?’

‘हां.. हां, क्यों नहीं। जरूर आएंगे। श्रीमती को भी लाऊंगा। एक लाख का इनाम है।’
‘हां, भाभी जी को अवश्य लाएं, उनके बिना बात नहीं बनेगी। और हां, साथ में राशन कार्ड, आइडेंटिटी कार्ड और एक फोटोग्राफ भी जरूर लाएं।’

‘ठीक, हम कल आ रहे हैं।’

मोबाइल बंद होते ही मनीष ने अपनी जिज्ञासा उड़ेल दी, ‘पढ़ाई-लिखाई छोड़कर ये क्या इनाम-विनाम देते फिर रहे हो?’

‘अरे पगले, उसे कोई इनाम नहीं दे रहे हम। उनको यहां तक लाने का यह तरीका है।’
‘यहां बुलाकर क्या उनकी पूजा करोगे?’

‘तुझे देखना है यहां क्या करते हैं? तो चल आ मेरे साथ।’

जिस केबिन में वे दाखिल हुए वहां गोलमेज मीटिंग चल रही थी। लगभग आठ-दस अधेड़ जोड़े बैठे थे। कमरे में मद्धिम रौशनी थी। अंधेरे और रौशनी का इतना सुंदर समझौता मनीष ने पहली बार देखा था।

गोलमेज के बीचो-बीच व्हाइट शर्ट पर कत्थई धारीदार टाई लगाए विवेक किसी अन्य अफसर के साथ जोड़ियों को कुछ समझा रहा था। सोलह बरस की एक खूबसूरत लड़की, जिसने नीले पेंसिल जींस पर गुलाबी चमकता टॉप पहन रखा था, सभी को कोल्ड ड्रिंक्स और चिप्स सर्व कर रही थी।

रीतेश ने मनीष को पीछे एक कुर्सी पर बैठाया। चुपचाप सब कुछ सुनने का इशारा करके मोबाइल कान से लगाए बाहर निकल गया।

चश्मे को नाक के नीचे-ऊपर करते हुए अफसर सभी जोड़ियों को विभिन्न कंपनियों के बीमा प्लान समझा रहे थे। सभी जोड़े उनके समझाने के मोहजाल में उलझे एक लाख का इनाम भूल चुके थे।

वे महिलाओं की तरफ विशेष मुखातिब थे - ‘भाभीजी देखिए घर का बजट आप ही देखती हैं। बच्चों के भविष्य की जवाबदारी भी आपके ऊपर है। यदि आप बिना फॉर्म भरे यहां से निकल गईं तो भाई साहब इस बीमे को टाल देंगे।’

जाल बिछ रहे थे। मछलियां फंस रही थीं। जो जोड़ा मान जाता विवेक उनका बीमा फॉर्म भर देता। बीमे की पहली किस्त के लिए महिलाओं के साथ लड़कों को तत्काल भेजा जाता। उनके पतियों को वहीं बैठाकर रखा जाता।

कुछ जोड़े बीमा कर रहे थे। कुछ इनाम को लेकर नाराज होकर वापस जा रहे थ्ेा।
मनीष ठीक से समझ नहीं पाया यहां क्या चल रहा है। जब वह विवेक और रीतेश के साथ बाहर आया तो उन्होंने बताया कि हम दिन भर में पचास फोन करते हैं, जिनमें आठ-दस लोग आने को तैयार हो जाते हैं। उनमें से चार-पांच बीमा करा लेते हैं। हमें दो हजार महीने की पगार मिलती है, साथ ही आधा कमीशन भी।

मनीष ने फटकार लगाई। ‘सालो, तुमने इंजीनियरिंग का प्री-टेस्ट नहीं दिया और अब कमीशनखोरी के लिए यहां लोगों को झांसा देते फिर रहे हो। देखो, मेरा रिजल्ट। मैंने टेस्ट निकाल लिया है। अब मैं इंजीनियर बनने वाला हूं। यही खुशखबरी देना आया था।’
‘देख भाई, तेरे पिताजी समर्थ हैं तुझे इंजीनियरिंग पढ़ाने में। हम तो खुद कुछ कमाएंगे तभी आगे पढ़ पाएंगे।’

‘सो तो है। मैं जहां चाहूंगा मेरे पापा एडमिशन करा देंगे।’ मनीष ने मुस्कान के साथ उन पर उपेक्षा भरी नजर डाली। उसने सोचा, इनकी दुनिया सिकुड़कर इस छोटे शहर में समा गई है। लेकिन वह बाहर की उस दुनिया में जाना चाहता है जिसके फैलाव की कोई इंतिहा नहीं है। उसकी उड़ान लंबी है।

उसने घर का रुख किया।

अपने सपने के साथ वह घर में दाखिल हुआ।

पिताजी सोफे में धंसे कूलर की ठंडी हवा में अखबार पढ़ रहे थे। उनके अखबार को उलटने-पलटने के ढंग से लग रहा था जैसे अखबार में कुछ खास नहीं है। चेहरे पर अखबार के पढ़े जाने का अभिजात्य भाव भरा था।

मां शायद काफी देर बाद रसोई से निकली थीं और पलंग पर अधलेटी थीं। वे खस्ताहाल और थकी लग रही थीं। मनीष के आने की भनक उन्हें नहीं हुई क्योंकि उनका पूरा ध्यान उस वक्त टेलीविजन पर चल रहे किसी सीरियल पर था।

मनीष को यह ठीक लगा कि वह परीक्षा परिणाम पिताजी की बजाय पहले मां को दिखाए। उसने मां के पैर छुए और अपनी खुशी उड़ेल दी। मां की आंखों में आशा और प्रसन्नता की चमक फैल गई। उन्होंने टीवी रिमोट की म्यूट बटन दबाई और पिता की तरफ मुखातिब होकर कहा, ‘देखो जी, मनीष का इंजीनियरिंग कॉलेज के लिए सेलेक्शन हो गया है।’

अखबार को सेंटर टेबल पर पटकते हुए पिताजी ने पहले कड़ी निगाहों से मां की तरफ देखा फिर रूखी प्रतिक्रिया देते हुए मनीष से कहा, ‘मैंने तुम्हें लाख बार कहा कोई और रास्ता चुनो। अब मेरे पास इतना रुपया नहीं है कि इंजीनियरिंग कॉलेजों में झोंक सकूं।’
मां-बेटे दोनों सकते में थे।

क्षण भर के लिए मनीष का जोश ठंडा पड़ गया लेकिन उसने हिम्मत जुटाकर कहा, ‘पापा, आपने भैया को भी तो इंजीनियरिंग पढ़ाया है फिर मुझे क्यों मना कर रहे हैं?’
पिताजी उबल पड़े, ‘भैया को पढ़ाया तो क्या मिला मुझे? सात लाख खर्च कर उसे इंजीनियर बनाया। क्या कर रहा है वह, सात हजार रुपल्ली की लेक्चररशिप।’

तभी मां बीच में बोल उठीं, ‘सुनो जी, उसे अच्छी नौकरी मिल जाएगी आप नाराज क्यों होते हैं। उसने कई अच्छी कंपनियों में आवेदन कर रखा है।’

‘खाक मिल जाएगी नौकरी। याद है कि नहीं बेंगलुरू में न जाने किसे अस्सी हजार दे रखा है, आज तक न नौकरी मिली न रुपया।’

पिता के इस तर्क के बावजूद मां अड़ी रहीं। बोली, ‘मनीष बड़े से पढ़ने में तेज है। उसकी जिंदगी से खिलवाड़ क्यों कर रहे हो?’

पिता ने मां को पास बैठाया और कहा, ‘देखो छाया, मैं अपने जीवन संघर्ष में पसीने, मेहनत, भूख, अपमान, दुर्घटनाओं और मुसीबतों की विकट धार को चीरकर निकल आया। कभी हारने या टूटने का गम नहीं रहा। लेकिन अब कर्ज के दु:ख तले नहीं दबना चाहता।

मनीष को इंजीनियरिंग में भिजवाकर मैं फिर वही एजुकेशन लोन, पर्सनल लोन, बैंक की किस्तें, घर खचरें में कटौतियां और दूसरों के सामने हाथ फैलाने के झंझावात में नहीं पड़ना चाहता। मेरे जैसे छोटी नौकरी वाले, ईमानदार और जिम्मेदारियों से भरे आदमी के लिए यह बड़ी बात है।’

इस छोटे-से प्रसंग ने वातावरण में तनाव भर दिया था। छाया अपने पति के चेहरे को अपलक देख रही थी।

मनीष को लग रहा था उसके मां-बाप का चेहरा किन्हीं अजनबियों के चेहरों में तब्दील हो रहा है।

थोड़ी देर पहले मनीष के चेहरे पर जीवन के प्रति गहरी शिद्दत का जो रंग था वह अब गायब हो चुका था। रिजल्ट को हाथ में दबाए वह धीरे-धीरे ड्रांइग रूम से निकलकर अपने कमरे की सीढ़ियां चढ़ने लगा। कमरे में घुसते ही उसे लगा, क्या अब वह भी रीतेश और विवेक की तरह..!

कमरे के वातावरण में एक मनहूस खामोशी छा गई जो धीरे-धीरे उसके ही बोझ से गहरी हो रही थी।
 
 
 
अगली खबर
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
आपके विचार

 
 
कोड :
6 + 9

 
 
विज्ञापन
 

बड़ी खबरें

 
 
 
 
 
 
 
 
 

रोचक खबरें

 
 
 
 
 
 
 
 
 

बॉलीवुड

 
 
 
 
 
 
 
 
 

जीवन मंत्र

 
 
 
 
 
 
 
 
 

क्रिकेट

 
 
 
 
 
 
 
 
 

बिज़नेस

 
 
 
 
 
 
 
 
 

जोक्स

 
 
 
 
 
 
 
 
 

पसंदीदा खबरें

 
 
 
 
 
 
 
 
 

फोटोगैलरी

Most Viewed

ट्विटर पर जिस्म -2
रेड हॉट
Just Added

'राउडी राठौर'
Unveiling Victoria's latest collection
 
 
 
विज्ञापन
 
 
| Email  Print Comment
| Email  Print Comment