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साइबर से सड़क तक अन्ना हजारे के आंदोलन ने क्या-क्या बदला और वह कितना टिकेगा?

 
Source: संदीप शर्मा   |   Last Updated 00:24(29/08/11)
 
 
 
 
क्या केवल वोट देना ही लोकतंत्र है?

न्ना आंदोलन को जिस तरह संसद की संप्रभुता के मुकाबले खड़ा करने की कोशिश की गई, उसने लोकतंत्र को लेकर नए सवालों को जन्म दिया है। इसे नई लोकतांत्रिक चेतना का उदय भी कहा जा सकता है। क्या लोकतंत्र में नागरिकों की भूमिका क्या पांच सालों में एक बार चुनाव में वोट डालने के बाद खत्म हो जाती है? क्या दो चुनावों के बीच की अवधि में अपनी और अपने राष्ट्र की नियति तय करने में नागरिकों की राय का कोई महत्व नहीं रह जाता? एक बार जनता के वोट से जनप्रतिनिधि चुना जाना क्या अगले पांच सालों तक संसद या विधानसभा में मनमाने फैसले लेने का लाइसेंस है? अगर ऐसा है तो फिर इस परिभाषा का क्या अर्थ है कि लोकतंत्र जनता के लिए जनता के द्वारा जनता का शासन है?

दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश होने पर हमारा गर्व स्वाभाविक है। लेकिन अन्ना हजारे की यह बात नागरिकों के कानों में हमेशा गूंजेगी कि हमने जिन्हें सेवक बनाकर भेजा वही मालिक बन बैठे। लेकिन सवाल यह है कि अगर चुनाव के अलावा भी लोकतंत्र में नागरिकों की भूमिका है, तो इसे सुनिश्चित करने के लिए क्या व्यवस्थाएं की जानी चाहिए और की जा सकती हैं। बिल्कुल हो सकता है कि आने वाले वर्षो में व्यवस्था में सुधारों पर काम करने वाले आला दिमाग ऐसी व्यवस्थाओं की पेशकश करें।

एक नई जागरूकता रिश्वत न दो न लो

जन लोकपाल बनाने के लिए अन्ना हजारे के आंदोलन ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जैसी जागरूकता पैदा की है, वह आने वाले सालों में नए रंग दिखला सकती है। इस आंदोलन की सबसे बड़ी सफलता यह है कि चारों तरफ फैलते भ्रष्टाचार से त्रस्त नागरिकों ने यह मान लिया था कि देश को भीतर से खोखला करती इस बुराई से निजात पाने का कोई तरीका नहीं है और यह ऐसी बुराई है जिसके साथ रहना सीखना ही होगा। लेकिन अप्रैल में अन्ना हजारे जिस तरह लोकपाल बनाने के लिए पहली बार जंतर मंतर पर अनशन पर बैठे, उसने लोगों के भीतर पसरती इस निराशा को तोड़ दिया। अगस्त के आंदोलन में वही उम्मीद ज्यादा व्यापक उभार के रूप में सामने आई और बड़े पैमाने पर लोगों के अन्ना के आंदोलन से जुड़ने का कारण भी बनी।

रिश्वत की बहुव्यापी संस्कृति के खिलाफ छोटे-मोटे प्रतिरोध की घटनाओं पर कोई ध्यान नहीं देता था। लेकिन इस आंदोलन के नतीजतन ऐसी अनगिनत छोटी-बड़ी कहानियां सामने आने लगी हैं और प्रेरणा का काम कर रही हैं। आने वाले दिनों में ऐसे लोगों की गिनती बढ़ेगी जो रिश्वत देने से इनकार करेंगे। सरकारों के दमन और अहंकार के बावजूद यह जागरूकता भ्रष्टाचार विरोधी लड़ाई को नए पड़ाव तक ले जा सकती है।

राजनीति से फासला

पहली बार देश में इतना बड़ा गैर-राजनीतिक आंदोलन हुआ है। प्रारंभ में जेपी आंदोलन भी गैर-राजनीतिक था और भ्रष्टाचार के खिलाफ युवाओं के आक्रोश का नतीजा था। बाद में उसका स्वरूप राजनीतिक होता गया। इमरजेंसी और उसके खत्म होने के बाद चुनाव लड़ने के आपद्धर्म के चलते उसकी परिणति सत्ता की राजनीति में हुई। अन्ना हजारे का आंदोलन आजादी के बाद पहला ऐसा आंदोलन है, जो जनमानस में इतने गहरे प्रभाव के बावजूद गैर-राजनीतिक रहा।

तीन दशकों में पहला बड़ा जनांदोलन हुआ है और वह भी गैर-राजनीतिक, तो यह संभवत: हमारी राजनीति के लगातार सत्ताभोगी और जनविमुख होते जाने का ही नतीजा है। गैर-राजनीतिक भी सिर्फ इसी अर्थ में है कि स्थापित राजनीतिक दलों के साथ या सहारे नहीं है और न ही सत्ता से किसी राजनीतिक दल को बेदखल करना चाहता है।

अन्यथा इस आंदोलन की मांग और आग्रह नितांत राजनीतिक हैं। यही कारण है कि राजनीति की दीवारों से लगातार टकराते हुए इस आंदोलन के लिए गैर-राजनीतिक बना रहना आसान नहीं होगा। लेकिन अगर यह अपना गैर-राजनीतिक स्वरूप कायम रखता है और सत्ता और राजनीति पर दबाव बनाकर सचमुच व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई लड़ता है, तो यह आने वाले समय में प्रयोग देखने लायक होगा।

एक नैतिक आवाज

भ्रष्टाचार के तो कई घोषित-अघोषित प्रतीक देश में थे, लेकिन भ्रष्टाचार विरोध का कोई प्रतीक देश में नहीं था। अब 74 वर्ष का एक बुजुर्ग देश में भ्रष्टाचार-विरोध का प्रतीक बनकर उभरा है। अन्ना की गिरफ्तारी के जवाब में रोष से भरे लोग खासकर नौजवान जब सड़कों पर उतर आए, उससे पहले किसी को अंदाज नहीं था कि उनके खिलाफ अपशब्दों के प्रयोग की इतनी तीखी प्रतिक्रिया होगी। आंदोलन से जुड़े कई लोगों ने अपने प्रेरित होने की वजह बताते हुए कहा है कि अगर इस उम्र में एक बुजुर्ग देश को भ्रष्टाचार से मुक्त करने के लिए आगे आ सकता है तो हम क्यों नहीं।

इंडिया अगेंस्ट करप्शन के प्रचार वाक्य ‘मैं अन्ना हूं’ ने देखते-देखते महाराष्ट्र के इस समाज सेवी को एक राष्ट्रीय आंदोलन का प्रतीक बना दिया। अनशन के दौरान उनके संबोधनों को जितने गौर से सुना जाता था, उसकी बड़ी वजह उनके शब्दों की नैतिक ऊंचाई थी। अनशन के मूल में त्याग की भावना है। इसने अन्ना को युवाओं, महिलाओं, बच्चों से गहरे भावनात्मक रूप से जोड़ा है। यही कारण है कि आने वाले दिनों में आंदोलन जो भी शक्ल ग्रहण करे, लेकिन देश की नैतिक आवाज और प्रेरणा अन्ना बने रहेंगे।

व्यवस्था में सुधार के लिए युवा ऊर्जा

अन्ना आंदोलन में शामिल युवा वह है जिसे आर्थिक सुधारों के बाद के भारत में निजी और भौतिक प्रगति में डूबा पीढ़ी माना जाता है, जो सात समुंदर पार जाकर बसने को लालायित है। इन्हीं युवाओं को जब सिंगापुर, लंदन से आकर आंदोलन में शामिल होते हुए देखा गया। यह आज का वह नौजवान है जो अपने देश पर गर्व करना चाहता है और भ्रष्ट देश होने की बदनामी इस गर्व में बाधक बनती है।

अन्ना आंदोलन के रूप में पहली राजनीति दीक्षा ने इन्हीं युवाओं की बदौलत गहरी पॉजिटिव ऊर्जा का संचार किया है। इस नई ऊर्जा और चेतना के साथ यह युवा अब व्यवस्था में सुधार के दूसरे सवालों पर भी गौर करेगा और वैचारिक बहसों में भागीदारी करेगा। इसकी गूंज आने वाले कई सालों तक सुनाई देगी।

एक प्रतीक का पुनराविष्कार

महात्मा गांधी और स्वतंत्रता आंदोलन के कम से कम एक प्रतीक को इस आंदोलन ने आश्चर्यजनक रूप से पुनर्जीवित कर दिया है। वह है गांधी टोपी, जो इस आंदोलन में देखते ही देखते अन्ना टोपी बन गई। आश्चर्यजनक यह इसलिए है कि शहरी भारत के जींसधारी नौजवानों ने आम तौर पर देहात का पहनावा माने जाने वाली टोपी को इतने उत्साह से अपनाया।

जब वे एक फैशन समारोह में मॉडलों और फिल्म तारिकाओं के सिर पर देखी गई, तो किसी फैशन डिजाइनर की कल्पना की बदौलत नहीं, बल्कि एक सामाजिक-राष्ट्रीय आंदोलन के प्रतीक की तौर पर। जेपी आंदोलन ने अपने लिए ऐसा कोई प्रतीक खोजने और रचने का कोई उद्यम नहीं किया था। लेकिन अन्ना टोपी अपने साथ अहिंसक और अनुशासित रहने का अहसास और जिम्मेदारी भी लेकर आई। यह प्रतीक आने वाले दिनों में ऐसे रचनात्मक प्रयोगों के और भी रास्ते खोल देता है।

एक नई राजनीतिक चेतना

जिन लोगों का जन्म 1980 के दशक में या उसके बाद हुआ है और जिनकी वजह से आज भारत को युवाओं का देश कहा जाता है, उन्होंने अन्ना हजारे के आंदोलन के रूप में जीवन का पहला बड़ा आंदोलन देखा है। इन युवाओं ने जनक्रांति के बारे में केवल इतिहास की किताबों में पढ़ा था। इन्हें इंटरनेट, मॉल्स, सोशल नेटवर्किग तक सीमित माना जाता रहा है। 1947 से पहले स्वतंत्रता आंदोलन ने एकाधिक पीढ़ियों को राष्ट्रीय मूल्यों और विचारों से ओतप्रोत किया था। उस पीढ़ी के अब कम ही लोग बचे हैं। 1970 के दशक में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में छात्र आंदोलन ने उस वक्त के युवाओं को राजनीतिक संस्कार दिए।

अन्ना के आंदोलन की अवधि अभी कम है, लेकिन कुछ वैसा ही अनुभव पिछले दो सप्ताह में आज के युवाओं ने किया है। जिस तरह आजादी का लड़ाई और जेपी आंदोलन अपने-अपने समय के युवाओं के लिए महत्वपूर्ण और पारिभाषिक अनुभव रहे जो बाद के सारे जीवन में उनकी थाती बने, वैसे ही अन्ना हजारे का आंदोलन आने वाले कई सालों तक आज की युवा पीढ़ी के मन में रहेगा। गैर-राजनीतिक आंदोलन होते हुए भी इसने अपने साथ जुड़े युवाओं को राजनीतिक सत्ता से टकराने का पहला बहुमूल्य अनुभव दिया है।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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