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दफ्तर

 
Source: रामनारायण शुक्ल   |   Last Updated 00:10(03/07/11)
 
 
 
 
रात उसने बहुत गंभीरता से कल सुबह दफ्तर जाने की बात सोची थी। दो दिन और अधिक हो गए थे। उसने सात दिन की छुट्टी ली थी क्योंकि इतने ही दिनों की छुट्टी उसे वेतन के साथ मिल सकती थी। लेकिन दो दिन और अधिक हो गए थे और कल नहीं जाने से तीसरे दिन की शुरुआत हो जाएगी।

दिसंबर के आखिर के दिन थे और काफी ठंडक। रात ढाई बजे के करीब उसकी नींद टूट गई थी और बहुत देर तक लेटे हुए वह यही सोचता रहा था कि क्या करे। सामने टेबुल पर एक बंगला उपन्यास पड़ा हुआ था जिसका अनुवाद वह उन दिनों कर रहा था।

किताब बहुत रद्दी थी, लिजलिजी भावुकता से भरी हुई और उसका अनुवाद करते हुए उसे बहुत कष्ट होता था। लेकिन वह प्रकाशक से इसके लिए पैसे ले चुका था। प्रकाशक बंगला का एक अक्षर तक नहीं जानता था। चूंकि इस उपन्यास के आधार पर हिंदी में एक सफल फिल्म बन चुकी थी इसलिए वह इसका अनुवाद करा रहा था।

और दिसंबर की उस रात ढाई बजे के करीब उसने बहुत हिम्मत की। वह अपनी लिखने वाली मेज के करीब आया और सामने रखी कुर्सी पर बैठ गया। यह कुर्सी उसने एक अनाथालय से खरीदी थी जहां अनाथ बच्चे लकड़ी का काम सीखते और बनाते थे। जब वह बहुत छोटा था तब उसे सड़कों पर बेकार घूमने वाले बच्चों पर बहुत दया आती थी और वह सोचता था कि वह बड़ा होकर जरूर इनके लिए कुछ करेगा।

यह तब की बात है जब वह बहुत छोटा था। अब वह ऐसी बातें नहीं सोचता। सोचने के लिए और भी बहुत सारी बातें हैं।

अनुवाद बहुत देर तक नहीं चला और वह फिर बिस्तर में लौट आया। बत्ती अभी भी जल रही थी। बिस्तर के पास ही उसकी किताबों की आलमारी थी जिसमें दोस्तोवस्की की कई किताबें रखी थीं। इनमें से हर एक को वह कई-कई बार पढ़ चुका था। उसने सामने रखी ‘ब्रदर्स करमाजोव’ उठा ली। करीब आधे घंटे तक वह बीच-बीच से कई सफे पढ़ता रहा, फिर उसे नींद आ गई।

सुबह उठा तो कमरा प्रकाश से भरा हुआ था। धूप कमरे में कभी नहीं आती थी लेकिन काफी दिन-चढ़ आने पर वह प्रकाश से भर जाता था। और प्रकाश से अपने कमरे का भर जाना उसे बहुत अच्छा लगता था।
आज प्रकाश से उसे डर लगा। प्रकाश देखकर लगा शायद दफ्तर जाने का समय निकल चुका है और रात ढाई बजे गंभीरता से किया गया निर्णय पूरा नहीं किया जा सकेगा।

लेकिन कई सुबहें ऐसी होती हैं जो अपने साथ प्रकाश जल्द लाती हैं, उसने सोचा। हो सकता है अभी उतना समय न हुआ हो जितना वह सोच रहा है। दूर लिखने की मेज पर उसकी रिस्टवाच रखी थी। अलसाये कदमों से वह घड़ी देखने के लिए उठकर वहां गया।
घड़ी चार बजे बंद हो गई थी।

कुछ वर्ष पहले तक उसके पास घड़ी नहीं थी। कलकत्ते में वह एक बड़े परिवार के साथ था जिसमें कुछ लोगों के पास घड़ी थी। इलाहाबाद वह अकेले आया था और अकेले ही रह रहा था। शुरू-शुरू में जब उसके पास घड़ी नहीं थी, नींद टूटने पर वह सड़क पर आ जाता था और तब तक खड़ा रहता था जब तक पास से कोई ऐसा व्यक्ति न गुजरता जिसके पास घड़ी हो।

काफी देर बाद जब उसे लगा कि अब निश्चय ही ऑफिस का समय निकल गया होगा तो उसकी उठने की तबीयत हुई।

बाहर आने पर यह जानकर उसे खुशी हुई कि ग्यारह बज रहे थे और ऑफिस जाने की दुनिया से उसे मुक्ति मिल गई है।

तभी उसका ध्यान अखबार की ओर गया। सुबह-सुबह ही अखबार वाला उसे खिड़की से फेंक जाता था। बहुत कम ऐसा होता था कि वह सुबह अखबार पढ़ ले। अक्सर अखबार वह रात को ही पढ़ता था और वह भी दो-तीन दिन के एक साथ।

अखबार में कुछ भी नहीं था। जब शुरू-शुरू में वह इलाहाबाद आया था तब कलकत्ते का अखबार ही पढ़ा करता था। जैसे-जैसे दिन बीतते गए कलकत्ते का अखबार उसके लिए पुराना पड़ता गया।

एक लंबा सपाट जीवन पीछे छूट गया है। कभी-कभी उसे ऐसा लगता है जैसे वह अपने घर से बहुत दूर चला आया है और लौटने का किराया उसके पास नहीं है।

किराए की बात सोचते हुए अचानक उसे भूख का अहसास हुआ। लेकिन भूख एक ऐसी चीज थी जिसका समाधान इस कमरे में नहीं हो सकता था। खाना क्या वह तो कभी चाय भी नहीं बनाता था। और न ही खाने की कोई चीज कमरे में रखता था।

कमरे से निकलना ही पड़ेगा। आदमी आखिर कितनी देर तक एक कमरे में रह सकता है। बाहर कुछ भी नहीं होता, फिर भी धूप, हवा और अपने जैसे बहुत से लोग होते हैं।


कॉफी हाउस में भीड़ अधिक नहीं थी। कुछ परिचित चेहरे भी दिखे लेकिन ऐसा कोई नहीं था जिसके साथ वह बैठता हो। उसके मन में आया कि एक बार वह ‘परिवार कक्ष’ में भी देख ले। यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली एक-दो लड़कियों से उसका परिचय था और कभी-कभी वे वहां बैठी मिल जाती थीं।

वहां कोई भी नहीं था। एक अपरिचित लड़की थी जो परिचित होने का आभास-सा देती थी। शायद कहीं देखा हो। कलकत्ते में..
लड़की के चेहरे पर एक परिचित-सी मुस्कान थी जो जान-पहचान होने का भ्रम पैदा करती थी। वह असमंजस में खड़ा रहा।

असमंजस में बहुत देर तक खड़ा नहीं रहा जा सकता। लड़की ने एक बार उड़ती नजरों से देखकर चेहरा घुमा लिया था। निश्चय ही वह किसी की प्रतीक्षा कर रही थी लेकिन उसकी नहीं। शायद कहीं कोई उसकी प्रतीक्षा नहीं कर रहा।

बाहर आया तो काफी धूप थी। दिसंबर का महीना होने के बावजूद उसे धूप अच्छी नहीं लगी। बराबर अंधेरे से ही चिढ़ नहीं होती, कभी-कभी प्रकाश से भी होती है, उसने सोचा और उसे अपना अंधेरा कमरा याद आया।

थोड़ी दूर चलकर वह अपने परिचित पान वाले के यहां आया। वहां रेडियो बज रहा था।

पान वाले ने अपनी दुकान के सामने काठ की दो बेंचें डाल रखी थीं। वह उन्हीं में से एक पर जैसे थककर बैठ गया।

उसके दफ्तर की बिल्डिंग वहां से दिखाई देती थी। दफ्तर की बिल्डिंग की ओर देखकर उसे लगा जैसे पिछले कई दिनों से दफ्तर बराबर उसके साथ-साथ चल रहा है। सारा समय दफ्तर का बोझ उसके दिमाग में था। उसका दिमाग ही जैसे दफ्तर का हो गया हो और वह अपने लिए कुछ भी न सोच पा रहा हो।

उसे याद आया पहले वह बहुत सारी बातें सोचता रहता था लेकिन अब उसके दिमाग में कोई बात नहीं आती। उसकी दृष्टि भी बहुत दूर तक नहीं जाती। दफ्तर जैसे किसी ऊंची व मोटी दीवाल की तरह बराबर उसकी आंखों के सामने रहता है।

कही पे निगाहें, कहीं पे निशाना..

उसका सोचने का क्रम टूट गया। पान वाले को शायद यह गाना पसंद था और उसने आवाज और तेज कर दी थी।

उसने पान खाया और एक पैकेट चारमीनार ली।

दफ्तर की परिचित सीढ़ियां उसे कहीं ज्यादा परिचित लगीं।

दफ्तर का दरवाजा पार करते ही सामने दीवाल-घड़ी थी। वह सवा तीन बजा रही थी।

दफ्तर चार कमरों में था। उसके कमरे में उसके अलावा तीन और लोग बैठते थे। लोगों का फीकी मुस्कान के साथ अभिवादन करता हुआ वह अपनी सीट पर जाकर बैठ गया।

टेबुल पर धूल जमी हुई थी और सब कुछ बहुत अव्यवस्थित हो गया था। उसे देखकर एक चपरासी टेबुल साफ करने के ख्याल से आया। उसने हाथ के इशारे से उसे मना करते हुए कहा, ‘नहीं, मैं बैठने नहीं आया। वैसे ही चला आया था। बस जा ही रहा हूं।’

वह धीरे-धीरे चलता हुआ मैनेजर के कमरे में आया। वे चश्मा टेबुल पर रखकर कुछ सोच रहे थे। उसे देखकर चौंक गए।

इसके पहले कि वे कुछ पूछते या कहते उसने कहा, ‘मैं ऐसे ही चला आया था। आपको यह बताने के लिए कि मैं कल से दफ्तर आऊंगा..’
 
 
 
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