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विलंब

 
Source: आकांक्षा पारे   |   Last Updated 00:10(22/09/11)
 
 
 
 
शाम गहराती हुई पहाड़ों पर उतर रही थी। ठंडक और अंधेरा एक-दूसरे से होड़ कर रहे थे। उसने खेलते हुए बच्चों के बीच से मैत्रेयी को बुलाया और चल पड़ा। आज उसे मैत्रेयी की बातें सुनने से ज्यादा अतीत याद करना अच्छा लग रहा था। खूब सारे दोस्त और शालिनी।

वही शालिनी जिस पर पूरे मोहल्ले के लड़के जान देते थे और वह किसी पर जान देती थी तो सिर्फ उसे। चलते-चलते वह हांफने लगा तो एक पत्थर पर बैठ गया। मैत्रेयी ने कसकर उसके हाथ थाम लिए। दिलासा भरी दो नन्ही हथेलियां उसके कमजोर हाथों को थामे हुई थीं।

सुबह भाई का प्यार से उसे दुलारना, शाम बरसों बाद शालिनी से अचानक मुलाकात और अब मैत्रेयी का स्नेह बड़ी देर तक उसके होंठो को नमकीन स्वाद देता रहा। उसका मन हुआ वह फिर वही जिंदगी जिए जैसी छह महीने पहले जिया करता था। बेफिक्र और बिंदास। अंधेरा बढ़ने लगा था। उसने अपनी सारी ताकत समेटी और उठ खड़ा हुआ। घर अब भी बहुत दूर था।

लिहाफ में लिपटे हुए उसने सीटी स्कैन शीट का रुख टेबल लैंप की रोशनी की ओर किया। काले रंग के उस प्लास्टिक से लगने वाले टुकड़े पर उसे कुछ भी समझ नहीं आया। बस अंदाज से उसने वहां नजरें टिका दीं जहां डॉक्टर उसे बड़े बेर के आकार की गुठली दिखाते आए थे।

ऑपरेशन से गुठली निकाली जा सकती थी, लेकिन ऑपरेशन की सफलता की गारंटी नहीं थी। फिर भी मां और भाई चाहते थे कि ऑपरेशन जरूर कराया जाना चाहिए। लेकिन ठीक होने के एक प्रतिशत जुए में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी।

लंबी कशमकश के बाद उसने फैसला ले लिया कि वह मौत को जिंदगी के एक-एक दिन का हिसाब देगा। हमेशा बने रहने वाले दर्द की वजह से उसने जब नौकरी छोड़ी तो भाई उसे और मां को यहां अपने पास अल्मोड़ा ले आए।

भाई छुट्टी लेकर बार-बार नहीं आ सकते थे। उसने कैलेंडर पर नजर डाली, उसके पास बमुश्किल पांच महीने थे या आठ या फिर दस..। इससे ज्यादा नहीं। उसका दिल लगा रहे भाई इसकी हर संभव कोशिश करते थे। लोकिन उसका मन था कि न अपना शहर भूला पाता था न शहर के लोग।

उसने सोचा कितना अजीब होता है। हम जहां होते हैं, वहां से ढेरों शिकायत होती हैं और जब वहां नहीं होते तो सपनों में उस जगह को याद करते हैं। वह एक अनजान शहर में मरने को तैयार नहीं था। पर..। उसने बत्ती बुझाई और सोने की कोशिश में पलकें मूंद लीं।

सुबह बहुत हिम्मत के बाद उसने भाई को बताया कि वह ऑपरेशन कराना नहीं चाहता, न ही वह यहां रहेगा। वह जल्द से जल्द इंदौर लौट जाना चाहता है। उस शहर में जहां कुछ लोग उसे पहचानते हैं। पहले वह किसी से भागना चाहता था इसलिए यहां चला आया था। लेकिन जब वह वजह ही यहां आ गई हो तो फिर यहां रहने से क्या फायदा?

उसे पता था भाई उसके फैसले पर आसानी से मुहर नहीं लगाएंगे। वह भाई से बहस करने के लिए तैयार था। आशा के विपरीत भाई सिर्फ ‘सोचते हैं’ कहकर निकल गए थे। वह शाम का इंतजार कर रहा था जब भाई से दोबारा इस विषय पर बात की जा सके। सब तर्को का एक ही जवाब उसने सोच रखा था।

बस जिंदगी के दिन ही तो गिनने हैं। चाहे यहां गिने जाएं या इंदौर में। क्या फर्क पड़ता है। अगर फिर भी वह न माने तो कह देगा, यहां रहने से उसकी जिंदगी के दिन बढ़ तो नहीं जाएंगे। अपने न होने की कल्पना से ही उसे अजीब अहसास हुआ।

एक दार्शनिक की तरह उसने सोचा, जो आया है वह जाएगा भी। आज इस विचार से वह डरा नहीं, बस गले में कांटे चुभते महसूस हुए। बहुत देर बाद उसने जाना यदि रुलाई रोकी जाए तो गले में ऐसी चुभन होती है। उसका मन हुआ बुक्का फाड़ कर रो ले।

क्या पुरुष नहीं रो सकते? उसके मन ने खुद से प्रश्न किया। जवाब में दो बूंदे गालों पर लुढ़क कर बह गईं। रोज जिंदगी का एक दिन कम हो जाना और मौत का ऐसा बेबस इंतजार करने की मजबूरी के खयाल से ही वह बिफर पड़ा। उसने तकिए पर दो-चार मुक्के जड़े और सामने पड़ी किताब को तहस-नहस कर दिया।

नाश्ते की टेबल पर लंबी बहस के बाद तय हुआ कि वह अलमोड़ा छोड़कर कहीं नहीं जा रहा है। उसे अच्छी तरह याद है भाई से इतनी तेज आवाज में दूसरी बार उसने बहस की थी। पहली बार उस दिन जिस दिन शालिनी की सगाई की रस्म हो रही थी।

भाई के बार-बार पूछने पर उसे कहना ही पड़ा, ‘शालिनी यहां रहती है।’ उसे बुरा लगा कि उसने भाई को फिर दुखी कर दिया है। वह उठने लगा तो भाई पूछ बैठे, ‘तुम कहां मिल लिए उससे?’
‘बगीचे में’ उसने शब्दों को जबर्दस्ती निकाला।

‘तुम वहां क्या करने गए थे?’

‘जी मैं मैत्रेयी के साथ रोज वहां जाता हूं।’ डॉक्टर ने उसे ज्यादा चलने से मना किया है। वह भाई से छुपकर रोज इतनी दूर पैदल चलकर चला जाता है। भाई बोले कुछ नहीं, बस नाश्ता अधूरा छोड़कर उठ गए। माफी मांगने के इंतजार में शाम उसने कमरे में ही बिताई। लेकिन बोझिल पलकें कब मुंद गईं पता ही नहीं चला।

आंख खुली तो देखा भाई बरामदे में बैठे अखबार पढ़ रहे थे। वह उसे देखकर ऐसे मुस्कराए जैसे कुछ हुआ ही न हो। उसके मन से बोझ उतर गया। उसे लगा उसका मन कांच की तरह साफ हो गया है। बहुत दिन बाद उसने शेव करने के लिए सामान निकाला। शीशे में अपना चेहरा देखकर वह एक बार तो बुरी तरह चौंक गया। वह खुद को पहचान ही नहीं सका।

शालिनी के यहां वे लोग किराएदार थे। लेकिन घनिष्ठता ऐसी कि किसी को पता ही न चले कि दो परिवार हैं। इसलिए शालिनी के बार-बार आने को सहज ही लिया जाता। एक ही छत पर पढ़ना, गप्पें मारना, लड़ना और बात बंद कर देना। उन दिनों उसकी यही दिनचर्या हुआ करती थी।

ये नजदीकियां बढ़ती गईं और शालिनी उससे प्यार कर बैठी। वह उससे प्यार करती रही और वह अपनी आदत के मुताबिक टाइम पास। उसके मन में शालिनी के लिए कुछ नहीं यह बात तब भी सिर्फ भाई जानते थे। भाई तीन साल बड़े थे लेकिन उसके सबसे अच्छे दोस्त।

उन्होंने कई बार समझाया था कि शालिनी से कम घुला-मिला करे। लेकिन उस वक्त वह उस मन का क्या करता जो मोहल्ले के लड़कों पर दादागिरी और शालिनी के किस्सों से रौब जमाने को आतुर था। शालिनी के पत्रों को जोर-जोर से दोस्तों के बीच में पढ़ना और फिर मुहल्ले की सबसे खूबसूरत लड़की को हथियाने के किस्से बयान करने के बीच उसे पता ही नहीं चला शालिनी कब गंभीर हो गई।

उसे तब भी कोई फर्क नहीं पड़ा जब मां ने बताया कि शालिनी की सगाई तय हो गई है। उस वक्त बस थोड़ा आश्चर्य जरूर हुआ कि शालिनी ने उसे यह बात क्यों नहीं बताई। पूरे दिन काम में उसका मन क्यों नहीं लगा यह सोचकर भी वह नहीं जान पाया।

एक अजीब बेचैनी उसे घेरे रही। शाम जब वह घर पहुंचा तो शालिनी फौरन उसके पास चली आई। बिना लाग-लपेट उसने बहुत सपाट कह दिया कि वह उसके बिना नहीं जी सकती और उसे सगाई रोकने के लिए कुछ करना ही पड़ेगा।

उसे आश्चर्य हुआ कि शालिनी जैसी कम बोलने वाली लड़की इतनी हिम्मत कर सकती है। एक क्षण के लिए जैसे उसकी सोचने-समझने की शक्तिखत्म हो गई। वह सिर्फ इतना ही कह सका, ‘मैं तुमसे प्यार नहीं करता।’ बदले में शालिनी ने सिर्फ गुस्से से उसे घूरा और चली गई।

बहुत दिनों बाद उसे पता चला कि शालिनी ने भाई को यह बात बताई थी। तभी भाई ने उससे कहा था कि वह शालिनी से शादी करना चाहे तो वे शालिनी के पिताजी को इस बात के लिए राजी कर लेंगे। उसे खुद पर आश्चर्य होता है कि उस दिन वह ऐसा पत्थर दिल कैसे हो गया था।

शादी के ठीक एक दिन पहले शालिनी उससे मिलने आई थी। जाते हुए पनीली आंखों से वह सिर्फ इतना कह गई थी, ‘जो दूसरों का दिल दुखाते हैं वो खुद भी कभी चैन से नहीं बैठ पाते भूषण।’ उसे आज भी याद है भाई ने कसकर शालिनी के हाथ पकड़कर कहा था कि वह भूषण को माफ कर दे। शालिनी की आंखें देखकर उसे एक बार लगा कि वह हिम्मत कर कह ही दे कि वह भी उसे प्यार करता है। मगर उसके हाथों में फीका ही सही लेकिन किसी और के नाम की मेहंदी का रंग था।

कुछ दिन बाद भाई अलमोड़ा चले गए और शालिनी ससुराल। उसे पहली बार महसूस हुआ कि वह बहुत अकेला रह गया है। शालिनी मायके आती तो उसका मन करता वह उससे मिले। लेकिन वह हिम्मत नहीं जुटा पाता। अहं उसे माफी नहीं मांगने देता था। इन्हीं दिनों भाई की शादी तय हो गई।

मां शादी में आई तमाम लड़कियों को उसे दिखाने की कोशिश में लगी रही। उसकी नजरें थीं कि उसे किसी का चेहरा बांध ही नहीं पा रहा था। मां की जबर्दस्ती से वह किसी फैसले पर पहुंचता उससे पहले मौत ने अपने हक में फैसला ले लिया।

उसकी जिंदगी के चंद दिन बचे हैं यह सुनकर मां बहुत खामोश हो गई थीं। मां की हालत देख कर भाई दोनों को अपने साथ ले गए थे। मां जाने से पहले शालिनी के घर मिलने गईं तो उसने मां से सिर्फ एक वचन मांगा था, उसकी बीमारी के बारे में किसी को कुछ न बताया जाए।

अब इस अनजान अलमोड़ा में वह था और शालिनी की याद थी। मां रोज सुबह पूजा का प्रसाद खिलाती जैसे दवाई से ज्यादा ठाकुर जी का भोग चमत्कार दिखाएगा। कोई भी उसका खयाल रखता तो उसे लगता वह दिन जल्दी आए जब किसी को उसके लिए कुछ न करना पड़े।

और कल शाम अचानक शालिनी से मिलने के बाद उसकी यह इच्छा और जोर पकड़ रही थी। उसने तय किया कि जीवन की अंतिम घड़ी में वह आज शालिनी को जरूर बता देगा कि उसे भी वह अच्छी लगती थी। वह बोलने के लिए बहुत देर तक शब्दों को मुंह में चबाता रहा।

उन्हें खूबसूरती से पिरोकर वह कोई वाक्य बनाता उससे पहले ही शालिनी बोल पड़ी, ‘बड़ी सुंदर बिटिया है तुम्हारी। क्या मां पर गई है?’ उसने जवाब देने के लिए सिर उठाया तो शालिनी का सूना माथा और खाली मांग देखकर आंखें प्रश्नवाचक हो गईं।

शालिनी ने ही उसे बताया कि छह महीने पहले एक सड़क दुर्घटना में उसके पति नहीं रहे। उसकी एक सहेली यहां के बोडिर्ग में पढ़ाती है, इसलिए वह यहां चली आई। वह भूल ही गया कि उसे यह बताना है कि मैत्रेयी उसकी नहीं भाई की बेटी है। वह भूल ही गया कि उसे बता दे उसकी शादी नहीं हुई।

वह फैसला ही नहीं कर पाया कि आखिरी वक्त में शालिनी की सहानुभूति ले या नहीं? उसके मन में अजीब-सा विचार कौंधा, क्या मौत उसे बख्श नहीं सकती? यदि ऐसा हो सके तो वह शालिनी के माथे पर फिर से सिंदूर की बिंदी झिलमिला देगा।

अब तक उसे शालिनी से बिछड़ने का अहसास होता था। पहली बार उसे लगा उसने शालिनी को खो दिया है। हमेशा के लिए। उसे लगा फैसला लेने में उसने हमेशा देर की है। शालिनी को कुछ भी बताने के लिए अब सच में बहुत देर हो चुकी थी। ..बहुत देर।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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