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वर्षो सूखा रहा मेरा जवार

 
Source: रोहित पांडेय   |   Last Updated 23:36(12/07/11)
 
 
 
 
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वर्षो सूखा रहा मेरा जवार
सूख कर कांटा हो गया जवान पेड़
जीवनदायनी नदियां
खुद वष्रो सूखी रहीं।

बीच में किसी साल
कुछ छींटे पड़ गए थे
नरमा गया था पेड़
तब भी मेरी छत
अछूत थी तेरे लिए

रे बदरा!
काहे रूठे हो इतना?
इस बार तो तुम
कृपालु हो गए हो
मूसलाधार बरस रहे हो
नदी नाले उफान पर हैं
समा नहीं पा रहे हैं तुमको

मेरे घोसले के आगे-पीछे
दाएं-बाएं सब भीग के गलगल है मेरा आंगन
फिर छोड़ दिया तुमने
मेरे आंगन में भी हैं
गौरेया के बच्चे
वे चहचहाने के बजाए
प्यास से चिल्लाते हैं।

ओ रे बदरा,
अब आए हो तुम
बरस लो जीभर के
लेकिन एक बात कहूं,
आत्मा की प्यास
जिस पानी से बुझती है
वो तुम्हारे पास नहीं है
वो तो किन्हीं पलकों की कोर
पर बहता है

उसको
कौन जतन से
लाओगे तुम
तुम्हारे बस का नहीं है
रे बदरा..
 
 
 
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