देखिए जी, कोर्ट में आज मेरी पेशी है। जज विरोधियों के साथ मिला हुआ है। उसे तो बहाना चाहिए मुझे बेदखल करने का। जमानती मुक़दमा है, सही व़क्त पर न पहुंचा तो इकतरफ़ा फ़ैसला सुना देगा। मेरा घर हाथ से निकल जाएगा। पूरा परिवार सड़क पर आ जाएगा। जमानत देने वाले पर आफ़त की बिजली गिरेगी सो अलग। प्लीज आप ही बताएं मैं क्या करूं?’
उसकी बात सुन कर बीड़ी फूंक रहे ट्रक ड्राइवर ने उसकी तरफ़ पीठ कर ली, जैसे किसी भिखमंगे को टालने के लिए लोग अकसर करते हैं। आसपास खड़े दूसरे लोग जो दूर से ही इसे तमाशा समझ कर देख रहे थे, उन्होंने भी मुंह मोड़ लिया।
इस डर से कि कहीं यह पागल बुड्ढा उनके पास ही न आ धमके और मग़ज चाटने लगे। बेवक़ूफ़ इतना भी नहीं जानता कि मामला जनता का है, इस पर किसी का बस नहीं, निपटेगी तो सिर्फ़ पुलिस या सेना ही निपटेगी।
इसी समय एक बुढ़िया जिसने चार पांच साल की बच्ची को अपनी उंगली पकड़ा रखी थी, उसी पागल से पूछने लगी, ‘‘बे वीर, ए टरेफक जाम कदों खुल्ले गा? मेरी तां नू हस्पताल विच है, ओस पास तां कोई वी नहीं। रब्ब जाने बेचारी नाल की बीत रही होवेगी।’
‘पता नहीं, बहन जी । कहते हैं कि आगे गोली चल गई। पुलिस ने दो डाकुओं को मार डाला। अब गांव वाले सड़क रोके खड़े हैं कि चोरों के भलेखे साधु मार दिए। भला कोई पूछे कि हमारा इसमें क्या दोष? बेचारे यात्रियों को क्योंे रोक लिया गया है इस घने जंगल में?’ बूढ़े ने निराश आवाज में जवाब दिया।
इसी समय नारेबाजी और हो हुल्लड़ के बीच कहीं आगे काले धुएं के गुबार उठने लगे। पता नहीं कि जाम लगाने वालों ने मोटी मोटी लकड़ियां सड़क पर रख कर आग लगा दी है। औरतें हाथों में मिट्टी के तेल से भरी बाल्टियां लिए खड़ी हैं ताकि जो भी गाड़ी भीड़ की तरफ़ बढ़े, उसे आग के हवाले कर दें।
सुन सुन कर सबकी रूह कांप रही थी। जितने मुंह उतनी बातें। कोई कुछ कह रहा था और कोई कुछ, पर वास्तविकता को जानने के लिए आगे बढ़ने की किसी में हिम्मत नहीं थी। एक तबका ऐसा भी था जिसके लिए यह सब मनोरंजन का वसीला बन गया था।
रंगीन शीशों वाली बड़ी-बड़ी कारों में बैठी इस तबके की चर्बीली औरतें खाने-पीने में मशगूल थीं। डिग्गी में रखा ख़ुशबूदार गर्म-गर्म खाना बड़ी-बड़ी सीटों पर खुल गया था और इन औरतों के गुब्बारों की तरह फूले नर और मादा बच्चे ऐसे गड़मस्ती कर रहे थे जैसे किसी दुर्लभ पिकनिक स्पॉट पर रोमांच से भरी पिकनिक मना रहे हों।
पेड़ के नीचे एक पढ़ी-लिखी मां अपनी नंगी टांगों वाली दो बेटियों को लिए खड़ी थी, इस अंदाÊा में जैसे जंगली भैंसों के रेवड़ से बचने के लिए पेड़ की आड़ ले कर खड़ी हो। लड़कियां नयन नक्श से जुड़वां लग रही थीं और ‘आई लव यू’ की भाषा में एक दूसरी के निकट मुंह लाकर बात करती थीं। ट्रकों के कुछ दाढ़ी मूछों वाले ड्राइवर एक जगह इकट्ठे होकर इस तरह से इन तीनों औरतों को देख रहे थे, जैसे भेड़ों के रेवड़ को भूखे भेड़िये देखते हैं। मां से इनका देखना बरदाश्त नहीं हो रहा था।
वह मन ही मन पहले इदस देश को और फिर देश की व्यवस्था को लड़कियों वाली भाषा में ही गालियां बक रही थी। काश! ये बेटियां किसी न किसी तरह से अमेरिका या आस्ट्रेलिया में ब्याही जाएं और उसका भी इस जंगली वातावरण से पिंड छूटे- रह-रह कर आशा की यह सर्चलाईट उसके दिमाग़ में कौंधती थी जिससे ब्यूटीपार्लर में सजवाए गए चेहरे पर रौनक भी आ जाती थी। लेकिन इस व़क्त तो उसके सामने रंग-बिरंगी चिड़ियों पर बाज की तरह आ झपटी इस मुसीबत से छुटकारा पाने की समस्या थी।
अचानक अगली बस से उतर कर दो कुर्ता सलवार वाली डाडी पंजाबन औरतें भी इसी पेड़ की छाया में आ खड़ी हुई। उनको देखते ही ड्राइवरों ने पेड़ की तरफ़ पीठ कर ली और बग़ल में ट्रक में लदी ऊंची घघरियों वाली मजदूरिनों की तरफ़ देखने लगे। मजदूरिनें भी इनकी मरोड़ा खाई मूंछों को देख-देख कर आपस में हंसी मÊाक़ करने लगीं। इनके मजदूर एक जगह झुंड बनाकर बीड़ियां फूंकने में मशगूल थे और यह तय कर रहे थे कि नए ठेकेदार से एडवांस लेने की बात कौन करेगा।
बूढ़ा आदमी आगे बढ़कर अब इन मजदूरों के सामने अपना दुखड़ा रोने लगा। मÊादूर उसकी बातें सुन कर गरदनें हिला रहे थे। उनके चेहरे आश्वस्त थे, इस ख़्याल के साथ कि चाहे कुछ भी हो, उनकी मÊादूरी तो आज भी लग रही है। ठेकेदार के साथ वे इसी शर्त के साथ जाने के लिए तैयार हुए थे और अपने कुछ पैसे पहले ठेकेदार के पास छोड़ कर। इसी समय एक छनकते हुए स्कूटर वाला मनचला सा लड़ाक बूढ़े के पास आकर रुक गया, ‘आइए बाबा जी, आप मेरे साथ आएं।’
‘कहां?’ बूढ़े ने परखती नजरों से देखा।
‘यहां तो आज की तारीख़ में यह सड़क जाम खुलने वाला नहीं है। चलिए, हम चन्नो के रास्ते चलते हैं।’
‘ओ जीते रहो पुत्तर, भगवान तुझे लंबी उम्र दे।’
बूढ़ा हाथ के झोले को संभाल कर खट से स्कूटर की अधफटी सीट पर बैठ गया और आंखें बंद करके भगवान को धन्यवाद देने लगा।
स्कूटर चल पड़ा तो दूसरे लोग भी उस बूढ़े की क़िस्मत को मन ही मन सराहने लगे। ‘सिर्फ़ तीस चालीस किलोमीटर का ही गेड़ है जी, ठीक व़क्त पर पहुंच जाएगा,’ एक ने कहा।
‘तो फिर ये बस वाले भी उसी रास्ते क्यों नहीं चले जाते?’ दूसरे समझदार आदमी ने सुझाया।
‘वह रास्ता बस का नहीं है जी, सिर्फ साइकिल या स्कूटर ही जा सकते हैं,’ जवाब देने वाले ने सवाल करने वाले के चेहरे पर आई चमक को बुझा दिया।
‘दो नदियां पड़ती हैं जी रास्ते में। जब तक उन पर पुल नहीं बन जाता, बसों और कारों का उस रास्ते पर आना-जाना लगभग नामुमकिन है,’ एक बूढ़े ने अपनी जानकारी बघारी।
‘गौरमिंट पुल क्यों नहीं बनाती जी?’ पहले वाले ने बूढ़े के समाने दूसरा सवाल रखा।
‘उस इलाक़े का कोई एमएलए मंत्री नहीं बना जी। बनता तो पुल भी बन जाता,’ बूढ़े ने जैसे टीचर के रूप में जवाब दिया।
मंत्री का नाम आया तो बहस राजनीति पर शुरू हो गई। बहुत जल्द गर्म भी हो गई। अपने-अपने तर्क और अपनी-अपनी चुनौतियां। साथ-साथ अभद्रता से भरे हुए शब्द और औकात से परे की शर्ते भी। लेकिन इस बहस में यह कहीं नहीं था कि जिस समस्या से सब यात्री दो चार हैं, उसका हल क्या है। बहस में उलझे सब लोग भी शायद यही समझ रहे थे कि इस बारे में सोचना उनका काम नहीं है, पुलिस का है या फिर सेना का।
इधर स्कूटर वाला लड़का और वह मुक़दमे में फंसा बूढ़ा आदमी अभी सिर्फ़ आधा किलोमीटर भी नहीं चले होंगे कि तेज हॉर्न बजाता हुआ घूमती हुई लाल बत्तियों वाला सीनियर राज्यमंत्री का क़ाफ़िला आ धमका।
आगे पीछे मशीनगनों से लैस बुलटप्रूफ़ जीपें और बीच में सरकारी झंडों वाली क़ीमती सफ़ेद गाड़ियां। जीपों में हथियारबंद अंगरक्षकों की टुकड़ियां और गाड़ियों में साथ चलने वाले पसंदीदा एहलकारों की टोलियां। इसके अलावा डॉक्टर और नर्सो से भरी बड़े अस्पताल की एक एम्बुलेंस कार भी।
जाम का बाधा देखते ही अंगरक्षक जीपों से धड़-धड़ कूद कर नीचे उतर आए और रास्ता साफ़ करवाने के लिए क़ाफ़िले के आगे आगे मार्च करने लगे। जो भी सामने पड़ गया उसकी शामत और जिसने भी थोड़ी चूं चकड़ की उसकी मरम्मत।
कई बसें और कारें तीसरी लाईन बनाए खड़ी थीं, उन्हें अपनी अस्मत बचाने के लिए सड़क के नीचे उतरना पड़ा खेतों की फ़सलों और ऊबड़खाबड़ गड्ढों में। क़ाफ़िला गया था जो मानो पशुओं के रेवड़ के कारण थोड़ा धीमा पड़ गया था और सभी बधाओं और अड़चनों को लांघता हुआ अब धीरे-धीरे आगे सरक रहा था।
स्कूटर वाले लड़के ने भी इस क़ाफ़िले के पीछे-पीछे चलने में ही अपनी भलाई समझी। उसे मुड़ा देख कुछ दूसरे स्कूटर और मोटरसाइकिल वाले भी साथ लग लिए। बूढ़ा ख़ुश था कि दयार की लकड़ी के साथ अब लोहा भी तर जाएगा। वह ठीक व़क्त पर कचहरी पहुंच सकेगा और जज द्वारा इकतरफ़ा किए जाने वाले फ़ैसले की मुसीबत से साफ़ बच जाएगा।
पर दस बारह मिनट चलते के बाद ही क़ाफ़िला एक झट के के साथ रुक गया। सामने जनता थी, जनसमूह की अनियंत्रित भीड़ जो नेता को सामने पा कर और भी ज्यादा उत्तेजित हो उठी थी।
जो औरतें सड़क के नीचे खड़ी मर्दो की कारगुजारियां देख रही थीं, अचानक वे भी उत्तेजित हो उठी थीं और एक हाथ में बरतन लटकाए और दूसरे से छाती पीटती हुईं सड़क के बीच आ गई थीं। अंगरक्षकों के डराने का इन पर कोई असर नहीं हो रहा था, औरतों से निपटने के लिए उनके साथ महिला अंगरक्षक नहीं थीं।
समस्या को विकट देख आखिर जाम लगाने वाली भीड़ के नेता को पूरी तलाशी ले कर मंत्री की कार के पास लाया गया। नेता ने साफ़ तौर पर मांग रखी कि जिसने इस गांव की मासूम लड़की का अपहरण किया है, मुख्यमंत्री के उस बेटे और उसके जलील साथियों को हमारे हवाले किया जाए और लड़की को भी फ़ौरन उसके घर वालों को सौंपा जाए।’
मंत्री ने कहा, ‘पहले हमें राजधानी तो पहुंचने दो, आप लोगों की इच्छा पूरी कर दी जाएगी।’
नेता ने जवाब दिया, ‘नहीं, पहले लड़की और मुख्यमंत्री के बेटे को हमें सौंपा जाए और इसी जगह पर, अभी।’
मंत्री ने उसे समझाना चाहा, ‘यह तो मुख्यमंत्री का मामला है, भाई। इसका फ़ैसला तो आदरणीय मुख्यमंत्री साहब ही कर सकते हैं, मैं नहीं।’
नेता ने नई शर्त रखी, ‘ तो फिर ठीक है, आप यहां पर मुख्यमंत्री को बुला दें।’
मंत्री थोड़ा उत्तेजित हो उठा, ‘क्या बकवास करते हैं, आप! मैं मुख्यमंत्री को यहां कैसे बुला सकता हूं?’
मंत्री की उत्तेजना को देख नेता भी उत्तेजित हो उठा, ‘बकवास नहीं कर रहा, सच बयान कर रहा हूं। जब तक मुख्यमंत्री यहां पर नहीं आता, तब तक आप भी यहां से नहीं जा सकते। यह जनता का फै़सला है।’
मंत्री का हाथ उस पिद्दी नेता की हालत पर अफ़सोस जाहिर करने या फिर कुछ सोचने के लिए माथे की सलवटों पर गया तो अंगरक्षकों के बड़े अफ़सर ने इस चिंता का हाथ समझा। पलक झपकते ही उसने भीड़ के नेता की गरदन मजबूत पंजे में जकड़ ली और घसीटता हुआ अपनी जीप की तरफ़ ले चला।
भीड़ में से कुछ लोगों ने उसे बचाने की कोशिश की तो अफ़सर ने दूसरे हाथ से पिस्तौल से हवा में तीन चार गोलियां दाग दीं। गोलियां दगते ही भयंकर ख़तरा जान दूसरे अंगरक्षकों ने भी हवा में कुछ फायर कर दिए और भीड़ की तरफ़ हथियारों के मुंह तान कर चौकस खड़े हो गए।
स्थिति की भयावहता को देख भीड़ हट गई। जनसमूह के बीच से काफ़िले के लिए एक तंग रास्ता बन गया और क़ाफ़िला भीड़ के नेता को अपने साथ ले कर उसी तरह तेज हॉर्न बजाता, लाल बत्तियां घुमाता राजधानी की तरफ निकल गया।
पिस्तौलों, मशीनगनों और ब्रेनगनों के आंखों से ओझल होते ही भीड़ ने फिर पूरी सड़क पर क़ब्जा कर लिया। स्कूटरों, मोटरसाइकलों और कुछ कारों पर पीछे आ रहे लोगों को भीड़ ने मंत्री का ही भाईबंद समझा और जब भीड़ होशोहवास खो कर अपने मन का गुस्सा उन्हीं पर उतारने लगी। पलक झपकते ही जनता जनता से भिड़ गई, देखते ही देखते चाहे छोटे पैमाने पर ही सही बिल्कुल वैसा ही भयावना और वहशी दृश्य उपस्थित हो गया जो देश के बंटवारे के समय हुआ था।
थप्पड़, घूंसे और लाठियां। आग के शोलों से आकाश की तरफ़ जाते जहरीले धुएं के गुबार। दर्दीली चिंघाड़ें, हाहाकार और चीत्कारें। इसके बीच ही हुंकारें, अभद्र शब्दावलियां और नारे। जिसे जिस तरफ जगह मिली जान बचाने के लिए भागमभाग लग रहा था, जैसे आदमी आदम युग में पहुंच गया है, जहां के भयानक जंगल में सिर्फ शैतान का राज है, इंसान की संवेदना और दिमाग़ी सोच समझ का जहां नामोनिशान भी नहीं है..
बूढ़े को लाद कर ले जा रहा स्कूटर भी इस शैतानी करिश्मे की आड़ में आ गया। बूढ़ा चीखता ही रह गया, ‘सुनो भ्रावो, सुनो!’ सुनने वालों में से किसी ने उसके सिर पर एक बड़ा सा पत्थर दे मारा और वह लहूलुहान हो कर वहीं ढेर हो गया।
मंत्री के मोबाइल फोन पर मिले आर्डर को पा कर जब तक राजधानी की पुलिस घटनास्थल पर पहुंची, तब तक एक छोटा नागासाकी और हिरोशिमा वहां पूरी तरह से बरबाद हो चुका था। स्कूटर चलाने वाला जवान लड़का एक तरफ मरणासन्न अवस्था में पड़ा कराह रहा था और उसके पास ही बूढ़े की लाश के खून पर मक्खियां भिनभिना रही थीं।