कितने खुशबू भरे दिन थे वे
Source: अतुल चतुर्वेदी | Last Updated 23:35(28/08/11)
कविता
कितने खुशबू भरे दिन थे वे
पुराने अदरक को छूते हुए उसने कहा-
खुशबू कहां बची है?
बची नहीं है वो माटी के सौंधेपन में
रिश्तों की ऊष्मिल गंध में भी कहां बची है
पहले कितना असरदार होता था छौंक
पांचवे मकान तक पता चलता था पकवान का
पूरे मोहल्ले में बंटता था नवान्न
सुख-दुख, हंसी, दर्द सब गांव-गांव बंटते थे
भीगकर भारी हो जाता था धनिया
धान की ताड़ी पी सब झूम-झूम थिरकते थे
सच, कितनी खुशबू बिखरी थी पहले
बोलो तो भीग जाती थी छाती
हंसो तो महीनों खुशनुमा रहता था मन
बसो तो जाने नहीं देती थीं मनुहारें
कितने खुशबू भरे दिन थे वे
वे लोग थे या जीवित किंवदंती
वो समय था या खूबसूरत सपना
वो बस्ती थी या सुरभित उपवन
जहां हर तरफ सद्भावनाओं के सुमन थे
हर छाया में था आशीर्वाद
हर कुएं में था करुणा का जल
एक प्रार्थना
पहचान सकें हम दर्द दूसरों का
सुन सकें विलाप अजन्मे शिशु का
ढूंढ सकें कारण बदहाली के
बदल सकें दुनिया कमजोरों की
लगा सकें माथे पे पसीना उनका
चल सकें दो कदम सच के साथ
न झुकें वंदना में अभिजनों की
न जुड़ें कतार में सुविधाओं की
बो सकें फसल हौसलों की
काट सकें प्रलोभनों की खरपतवार
कांपें नहीं स्वर विरोध में
निभा सकें और बेहतर भूमिका
बहता रहे संगीत सदा मुक्ति का
ऐसा जन्म प्रभो !
हमें बार-बार देना