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कविता

 
Source: मदन मोहन ‘दानिश’   |   Last Updated 01:09(21/08/11)
 
 
 
 
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ग़ज़ल - 1

ख़ुदी को दान करके देखते हैं
सफ़र आसान करके देखते हैं

अभी तक फ़ायदे में उसको रक्खा
ज़रा नुक़सान करके देखते हैं

परखना है ख़ुद अपने आप को भी
कोई एहसान करके देखते हैं।

इधर माहौल कुछ अच्छा हुआ है
कोई ऐलान करके देखते हैं

जिस उलझन को कभी बिसरा दिया था
उसी का ध्यान करके देखते हैं

नज़र में रौनक़ें भी चुभने लगी हैं
फ़ज़ा वीरान करके देखते हैं

मनाने से नहीं मानेगा ‘दानिश’
उसे हैरान करके देखते हैं

ग़ज़ल - 2

कभी मायूस मत होना किसी बीमार के आगे,
भला लाचार क्या होना किसी लाचार के आगे

मुहब्बत करने वाले जाने क्या तरकीब करते हैं,
वगरना लोग तो बुझ जाते हैं इनकार के आगे

बिकाऊ कर दिया दुनिया ने जिसको होशियारी से,
बिछी जाती है ये दुनिया उसी बाज़ार के आगे

तुम्हे मौजें बताएंगी किसी दिन राज़ दरिया का,
कई मझधार होते हैं वहां मझधार के आगे

किसी ठहरे हुए लम्हे की क़ीमत व़क्त से पूछो,
उसी से टूट कर लम्हा रहा ऱफ्तार के आगे

डराता है किसी मंज़िल पे आकर ये तजस्सुस भी,
न जाने कौन सा मंज़र हो किस दीवार के आगे

मगर ये बात समझाएं तो समझाएं किसे ‘दानिश’
कोई भी शय बड़ी होती नहीं किरदार के आगे
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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